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मंगलवार, 18 जुलाई 2023

मंगल की महादशा में विभिन्न ग्रहों की अंतर दशाओं के दुष्प्रभावों का शिव पूजा/ अनुष्ठान से निवारण।

 

मंगल

मंगल की महादशा में विभिन्न ग्रहों की अंतर 

दशाओं के दुष्प्रभावों का शिव पूजा/ अनुष्ठान 

से निवारण।

◆मंगल की महादशा में, मंगल की अन्तर्दशा में 

रुद्र-जप तथा वृषभदान करना चाहिये।

◆राहु की अन्तर्दशा होने पर नाग का दान, ब्राह्मण 

भोजन तथा मृत्युंजय मन्त्र जप कराने से आयु एवं 

आरोग्य की प्राप्ति होती है।

नागदानं प्रकुर्वीत देवब्राह्मणभोजनम् ।
मृत्युंजयजपं कुर्यादायुरारोग्यमादिशेत् ॥


मंगल में बृहस्पति की खराब अन्तर्दशा होने पर
शिवसहस्रनामावली का जप करना चाहिये।

'तद्दोष-परिहारार्थं शिवसाहस्त्रकं जपेत् ।'

इसी प्रकार शनि की दोषयुक्त अन्तर्दशा में मृत्युंजय 

मन्त्र के जप का विधान है।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र

 श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र


इस स्तोत्र का केवल एक पाठ शतरुद्री के तीन पाठों के समान फल देने वाला कहा गया है।


पार्वत्युवाच

शरीरार्धमहं शम्भोर्येन प्राप्स्यामि केशव ।

तदिदानीं समाचक्ष्व स्तोत्रं शीघ्रफलप्रदम् ॥


नारायण उवाच

अस्ति गुह्यतमं गौरि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।

शम्भोरहं प्रवक्ष्यामि पठतां शीघ्रकामदम् ॥


विनियोग – 

'ॐ अस्य श्रीशिवाष्टोत्तरशतदिव्यनामामृत-स्तोत्रमालामन्त्रस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनयोगः ।'


शिवसंकल्प इति हृदयम् । 

पुरुषसूक्तमिति शिरः ।

उत्तरनारायणेति शिखा ॥ 

अप्रतिरथेति कवचम् ।

विभ्राडिति नेत्रम् । 

शतरुद्रियमित्यस्त्रम् । 

आत्मानं रुद्ररूपं ध्यायेत् । 


(इन सूक्तों का पाठ करते हुए न्यास करे।)


ध्यान-

धवलवपुषमिन्दोर्मण्डले संनिविष्टं 

भुजगवलयहारं भस्मदिग्धाङ्गमीशम् ।

चारुचन्द्रार्धमौलिं हरिणपरशुपाणिं

हृदयकमलमध्ये संततं चिन्तयामि ॥

'चन्द्रमण्डल में श्री शिवजी विराजमान हैं, उनका गौर शरीर है, सर्प का ही कंगन तथा सर्प का ही हार पहने हुए हैं तथा शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं, उनके हाथों में मृगी मुद्रा एवं परशु है और अर्धचन्द्र सिर पर विराजमान है। मैं उन भगवान् शंकर का हृदय में निरंतर चिन्तन करता हूँ।'


शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः ।

वामदेवो विरूपाक्षः कपर्दी नीललोहितः ॥

शंकरः शूलपाणिश्च खट्वाङ्गी विष्णुवल्लभः ।

शिपिविष्टोऽम्बिकानाथः श्रीकण्ठो भक्तवत्सलः॥

भवः शर्वस्त्रिलोकेश: शितिकण्ठः शिवाप्रियः ।

उग्रः कपालिः कामारिरन्धका सुरसूदनः ॥

गङ्गाधरो ललाटाक्षः कालकालः कृपानिधिः ।

भीमः परशुहस्तश्च मृगपाणिर्जटाधरः ॥

कैलासवासी कवची कठोरस्त्रिपुरान्तकः ।

वृषाङ्को वृषभारूढो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

सामप्रियः स्वरमयस्त्रयीमूर्तिरनीश्वरः ।

सर्वज्ञः परमात्मा च सोमसूर्याग्निलोचनः ॥

हविर्यज्ञमयः सोमः पञ्चवक्त्रः सदाशिवः ।

विश्वेश्वरो वीरभद्रो गणनाथः प्रजापतिः ॥

हिरण्यरेता दुर्धर्षो गिरीशो गिरिशोऽनघः |

भुजङ्गभूषणो भर्गो गिरिधन्वा गिरिप्रियः ॥

कृत्तिवासा पुरारातिर्भगवान् प्रमथाधिपः ।

मृत्युंजयः सूक्ष्मतनुर्जगद्व्यापी जगद्गुरुः ॥

व्योमकेशो महासेनजनकश्चारुविक्रमः ।

रुद्रो भूतपतिः स्थाणुरहिर्बुध्न्यो दिगम्बरः ॥

अष्टमूर्तिरनेकात्मा सात्त्विकः शुद्धविग्रहः ।

शाश्वतः खण्डपरशुरजपाशविमोचकः ॥

मृडः पशुपतिर्देवो महादेवोऽव्ययः प्रभुः ।

पूषदन्तभिदव्यग्रो दक्षाध्वरहरो हरः ॥

भगनेत्रभिदव्यक्तः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ।

अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारकः परमेश्वरः ॥

एतदष्टोत्तरशतनाम्नामाम्नायेन सम्मितम् ।

विष्णुना कथितं पूर्वं पार्वत्या इष्टसिद्धये ॥

शंकरस्य प्रिया गौरी जपित्वा त्रैकालमन्वहम् ।

नोदिता पद्मनाभेन वर्षमेकं प्रयत्नतः ॥

अवाप सा शरीरार्धं प्रसादाच्छूलधारिणः ।

यस्त्रिसंध्यं पठेच्छम्भोर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥

शतरुद्रित्रिरावृत्त्या यत्फलं प्राप्यते नरैः ।

तत्फलं प्राप्नुयादेतदेकवृत्त्या जपन्नरः ॥

बिल्वपत्रैः प्रशस्तैर्वा पुष्पैश्च तुलसीदलैः ।

तिलाक्षतैर्यजेद् यस्तु जीवन्मुक्तो न संशयः ॥

नाम्नामेषां पशुपतेरेकमेवापवर्गदम् ।

अन्येषां चावशिष्टानां फलं वक्तुं न शक्यते ॥


।।इति श्री शिवरहस्ये गौरीनारायण संवादे शिवाष्टोत्तरशत दिव्यनामामृत स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।


इस प्रकार १०८ नाम, जो वेद के तुल्य हैं, श्री विष्णु ने पहले इष्ट-सिद्धि-हेतु माता पार्वती को बताये थे । शंकरप्रिया भगवती गौरी ने भगवान् पद्मनाभ की प्रेरणा से एक वर्ष तक प्रतिदिन त्रिकाल इस का जप किया। महादेव की कृपा से उन्होंने उनका शरीरार्ध प्राप्त किया। शतरुद्री के तीन बार पाठ करने से जो फल मनुष्य को प्राप्त होता है, वह फल इस स्तोत्र मात्र एक बार के पाठ करने से प्राप्त हो जाता है। 

बेलपत्र, फूल, तुलसीदल से, तिल तथा अक्षत से जो महादेव का यजन करते हैं, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं । भगवान् शंकर के इन शतनामों में से केवल एक नाम ही मोक्ष देनेववाला है तो शतनाम का महत्त्व (फल) वर्णन ही नही किया जा सकता है।


शनिवार, 15 जुलाई 2023

शनि प्रदोष व्रत पूर्ण शास्त्रोक्त विधान

 


                शनि प्रदोष 


यदा त्रयोदशी कृष्णा सोमवारेण संयुता ।

यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ॥

तदातीव फलं प्राप्तं धनपुत्रादिकं लभेत् ।

                                           "हेमाद्रि"


हेमाद्रि के अनुसार अगर त्रयोदशी तिथी कृष्ण पक्ष में सोमवार के दिन हो अथवा शुक्लपक्ष के मंद अर्थात शनिवार को हो, तो इस दिन किये गए व्रत पूजा आदि से धन सम्पदा और संतान सुख (कुलवृद्धि) की प्राप्ति होती है।


यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ।

आरब्धव्यं व्रतं तत्र संतानफलसिद्धये ॥

                                        "मदनरत्न"


मदनरत्न में भी वर्णित है कि शुक्लपक्ष में शनिवार को पढ़ने वाला प्रदोष व्रत संतान सुख की प्राप्ति कराता है।


प्रदोषव्रत को अलग अलग दिन में आने से इसका महत्व और अधिक हो जाता है केवल प्रदोष व्रत करके भी ग्रह जनित पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। 

प्रदोष काल मे शिव परिवार( महादेव, अम्बिका, षडानन, गणपति, नंदी और कीर्तिमुख) का पूजन करें, मिट्टी के अभाव में हल्दी/रोली से बनाकर यथाशक्ति पंच/दश/षोडशोपचार पूजा करें, उसके बाद किसी तालाब या क्यारी में इनका विसर्जन कर दें।


शिवालय में इस दिन 108 घी के दीपक लगाए, प्रयास करें मिट्टी के दिये हों अन्यथा आटे से दिए बनाकर, शिवलिंग के समक्ष दिए लगाए, परिक्रमा करें।


सौभाग्वती स्त्रियाँ गौरी जी को श्रृंगार चढ़ाकर किसी भी सौभाग्यवती स्त्री (पुजारी परिवार/मान पक्ष) को दे सकती हैं।


शनि साढ़ेसाती से प्रभावित व्यक्ति भी कल पूजा करें, शिवालय में शनि ग्रहजनित पीड़ा के निवारण के लिए दीपदान करें, कुंडली में कुपित (अगर योगकारक नही है) शनि के लिए कल शनि ग्रह की कारक सामग्री का दान करें। क्योंकि शनिवार व त्रयोदशी के साथ साथ अनुराधा नक्षत्र भी है।

मंगल - सावन में करें ग्रहों के अनुसार ज्योतिष उपाय



    सावन में करें ग्रहों के अनुसार उपाय


                       ~मङ्गल~


वैदिक ज्योतिष में मंगल को सेनापति की संज्ञा दी गयी अर्थात आक्रामकता, वीरता, कर्म को वरीयता, ये जितना सृदृण रक्षक है उतना ही प्रबल मारक भी, शरीर मे रक्त का कारक विशेषकर लाल रक्त कणिकाओं की मात्रा का निर्धारण करने वाला। 


जल्दबाजी, बहुत ज्यादा भावनात्मक, मंगल को भुमि पुत्र अर्थात "भौम" भी कहा जाता है, अगर किसी भी स्थिति में कुंडली मे बली है तो माता से विशेष भावनात्मक लगाव होता ही है।


ज्योतिष में विशेषकर मेडिकल एस्ट्रोलॉजी में जातक को सर्जरी की आवश्यकता, माइनर या मेजर सर्जरी का होना, रक्तविकार, चोट लगना, कर्ज़/ऋण भी मंगल के प्रभाव से देखा जाता है, जमीन से संबंधित लाभ और विवाद आदि में मंगल का विशेष प्रभाव देखा जाता है।


मंगल भाई व मित्र व उनके साथ आपके संबंधों, उनसे होने वाले लाभ-हानि आदि को भी दिखता है।


सावन में कैसे करें मंगल के उपाय-


मंगलवार का व्रत करें, नारसिंह स्तोत्र, मङ्गल कवच, हनुमान चालीसा का अनुष्ठानात्मक प्रयोग करें।


अगर ऋण से पीड़ित हैं तो ऋणमोचक मंगल/ नारसिंह स्तोत्र का पाठ करें।


अगर बार बार चोट लग रही है, गाड़ी और शरीर में स्क्रेच लगते ही रहते हैं तो भी मंगल का उपाय करें, मंगल व्रत, हनुमान साधना करें।


ऐसे लोग विशेषकर यात्रा में निकलते समय हनुमानद्वादशनाम का पाठ करके ही निकलें।


जमीन संबंधित मामलों में लाभ और हानि का कारक भी मंगल ही है, ऐसे में अगर आपको नाकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है जमीनी विवाद, बार बार जमीन आदि से जुड़े कामों में अड़चन, भाइयों और मित्रों की तरफ से तनाव व भय आदि दे रहा है तो मंगल और तृतीय/चतुर्थ भाव से सम्बंधित उपाय करें।


अगर लाभकारी होकर आपको जमीन, कंस्ट्रक्शन, माइनिंग या किसी भी तरह से मिट्टी से जुड़े लाभ मिल रहे हैं तो इसे व्रत उपाय आदि से और बली करें।


इमोशन्स पर कंट्रोल बहुत जरूरी है ऐसे लोग प्रायः भावनात्मक रूप से या तो बहुत कठोर अथवा बहूत कमज़ोर होते हैं, कठोर नारियल के अंदर नरम गिरी की तरह, तो जो इन्हें समझ लेता है उन्हें पता होता है कि इनसे कैसे काम निकलना है, तो मेडिटेशन करें, स्वयं  खुद फोकस और स्वयं ही कंट्रोल करें।


इस श्रावण भर शिवालय में प्रतिदिन तांबे के बने दिए पर घी का दीपक लगाए।


रक्त चंदन को अपने हाथों से घिसकर महाद्रव का श्रृंगार करें।


तांबे के लोटे में गुड़, रक्तचंदन मिलाकर महादेव का अभिषेक करें।


रक्तचंदन से बेलपत्र पर लिख कर  "ॐ साम्बसदाशिवाय नमः"  मंत्र के साथ महादेव का 27/108/1008 यथासम्भव संख्या में अर्चन करें।


मसूर की दाल/ मलका से महादेब का अर्चन करें।


अगर मंगल नाकारात्मक है व हाई ब्लड प्रेशर आदि दे रहा है तो मसूर की दाल का खाने में बिल्कुल प्रयोग न करें।


अगर शुभ भावों का स्वामी नहीं है मंगल तो मंगल की दान समाग्री आदि का ब्राह्मण/ क्षत्रिय को दान करें,  शुभ भाव का स्वामी होने पर ये समाग्री किसी को दान न देकर केवल शिवलिंग पर अर्पित कर दें।


मंगलवार और मंगल के नक्षत्रों 


मृगशिरा

चित्रा

धनिष्ठा,  


में ये उपाय अवश्य करें।


कुंडली मे अच्छा मंगल पुलिस, आर्मी पैरा फोर्सेस में भी स्थिति अनुसार व्यक्ति को कार्यरत होने का अवसर देता है, इन संस्थानों में हायर पोस्ट पर अधिकतर मंगल से विशेष रूप से प्रभावित व्यक्ति कार्यरत देखे जाते हैं, तो अगर आप आर्मी, पैरा फोर्सेस, या IPS/ज्यूडिशियल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो अपनी कुंडली को प्रबल करें। क्योंकि ग्रहों में सेनापति मंगल ही है।


वैसे तो हर कुंडली अलग है और हर कुंडली पर करने वाले उपाय भी अलग अलग ही होते हैं पर यहां मैने कुछ ऐसे उपाय दिए हैं जोकि लगभग सभी कर सकते हैं, तो इस सावन इन उपायों से लाभ उठायें।



गुरुवार, 13 जुलाई 2023

चंद्रमा- सावन में करें ग्रह अनुसार ज्योतिष उपाय

 

                   ~चंद्रमा~

व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति ही उसकी कुंडली बन जाती है जैसे कि फ़ोटो खींच लिया हो और एडिट करना सम्भव नही है। इसे ही "लग्न" कुंडली कहते हैं।

लग्न के समय ग्रहों की इस स्थिति से ही जीवन भर आपको किस ग्रह की ऊर्जा कैसे प्रभावित करेगी का निर्धारिण होता है। साथ साथ दशाएँ, गोचर इत्यादि चलते हैं पर लग्न कुंडली का रोल सबसे महत्वपूर्ण है।


पृथ्वी से अरबों खरबों दूर ये ग्रह अपनी ऊर्जा से पृथ्वी/व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जैसे हमारे सबसे निकट का ग्रह चंद्रमा जोकि जलतत्व का कारक है पृथ्वी और शरीर के जलतत्व पर पूर्ण प्रभाव रखता है। 

पूर्णिमा में उछाल मारता समुद्र का जल इसकी ऊर्जा के प्रभाव को दिखाता है वहीं अमावस्या में ऊर्जा का स्तर कम होने पर वही समुद्र शांत होकर पीछे चला जाता है। जिसे ज्वार-भाटा कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊर्जा के प्रभाव होते हैं जिन्हें यहां समझाना संभव नहीं।

 चंद्रमा की ये ऊर्जा, इस समय शरीर को (अगर खराब है) water retention, बैचेनी, बहुत प्यास लगने विशेषकर रात में, नींद न आना आदि लक्षण दिखाती है।


तो इस सावन कैसे करें कुंडली मे चंद्र ग्रह के उपाय-


◆सोमवार का व्रत रखें।

◆शाम को शिवालय में कच्चे गाय के दूध से।महादेव का अभिषेक करिए, पतली धारा जोकि दूध बर्तन में रहे तक न टूटे।

◆अगर चांदी के बर्तन से दूध या जल से अभिषेक करें तो और भी शुभ है

◆ जल में गंगाजल व शुद्ध मिश्री मिलाएं।

◆सफेद फूलों जैसे अपराजिता, सफेद गुड़हल आदि से और "नमः शिवाय" कहते हुए 27/108 यथाशक्ति  बेलपत्रों से अर्चन करें।

◆ज्योतिष में चंद्रमा चराचर जगत की माता कहा गया है, प्रेम और समर्पण के साथ पूजा करिए, माँ की तरह चंद्रमा भी आपकी हर तरह से रक्षा करेंगे।

◆माँ व माँ समान स्त्रियों का सम्मान करें।कटुवाणी अपशब्द न बोलें।

◆अगर शुभ भावों का स्वामी है तो दान आदि न करें, अन्यथा चंद्रमा के गुण वाली सामग्री का दान भी करें।

◆ रोगों की स्थिति में चंद्रशेखराष्टक और चंद्रमा के मंत्रों का पाठ/जप करें।

◆पूर्णिमा का उपवास करें, और इस दिन चंद्र को अर्घ्य भी दें।

बुधवार, 12 जुलाई 2023

सूर्य - सावन में ग्रहों के अनुसार उपाय

 Astrology & Remedies


     


               सूर्य ग्रह


सावन में आप अपने ज्योतिषाचार्य के बताए जिस भी ग्रह का उपचार करना चाहते हैं तो उसे शिवमन्दिर में करें, महादेव का उस ग्रह की कारक सामाग्री से अर्चन करें। 


उग्र व नकारात्मक भावों का स्वामी है तो दान भी करें।


शुभ भावों का स्वामी होकर कमज़ोर है तो उसका जप, स्तोत्र पाठ आदि करें।


जैसे लग्नेश अगर कमज़ोर है तो जातक की प्रतिरोधक क्षमता में कमी, निर्णय लेने को क्षमता में कमी,बातों में प्रभावशीलता की कमी, लीडरशिप की क्षमता में कमी, आत्मविश्वास में कमी आदि देता है देखा जाए तो अगर लग्नेश बली है तो कुण्डली की बांकी कमियों को काफी मात्रा में सम्हाल लेता है।


तो लग्नेश को बली करें, इस से जुड़े ग्रह का दान कभी न करें। 


जैसे सूर्य लग्नेश है तो तांबा, गेहूँ, आदि सूर्य से जुड़ी कारक सामाग्री का भी भी दान न करें। कभी कभी जब लग्नेश किसी कारण वश कुछ अप्रत्याशित परिणाम दे भी रहा है तो उसकी कारक सामग्री से शिवालय में लिंगार्चन कराएं।


जैसे सूर्य के लिए जपा के फ़ूल, सफेद मंदार के फूलों से शतार्चन या सहस्रार्चन करें। तांबे के लोटे से शिवलिंग का अभिषेक करें।


विशेषकर किसी मंदिर में शिवलिंग पर कलश नही है तो आप वहां तांबे के कलश की व्यवस्था कर सकते हैं।


विषेशकर रविवार और सूर्य के नक्षत्रों में दिए गए उपाय करने की कोशिश करें। 


कृतिका

उत्तरा फाल्गुनी

उत्तराषाढा


साथ ही सूर्य को अर्घ्य दें और सूर्याष्टकम और सूर्य के अन्य स्तोत्र आदि का पाठ करें।


गेहूँ के आटे का दिया, शुद्ध घी से शिवालय में सूर्योदय पर जलायें।


यग्योपवीत धारण करते हैं तो त्रिकाल नही तो यथा शक्ति सन्ध्या आदि करें।


बाँकी ग्रहों चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु आदि पर क्रमशः प्रदीन लिखती रहूँगी ताकि आप इसका लाभ ले सकें और इस सावन महादेब की आराधना के साथ साथ अपने ग्रहों के शुभ प्रभाव प्राप्त करने का भी प्रयास करें।

रविवार, 9 जुलाई 2023

सोमवार व्रत क्यों/कैसे करें-

 


     सोमवार व्रत क्यों/कैसे करें-


भगवान शिव श्रावण के सोमवार के बारे में कहते हैं- 


“मत्स्वरूपो यतो वारस्ततः सोम इति स्मृतः। 

प्रदाता सर्वराज्यस्य श्रेष्ठश्चैव ततो हि सः। 

समस्तराज्यफलदो वृतकर्तुर्यतो हि सः।।”


अर्थात सोमवार मेरा ही स्वरूप है, अतः इसे सोम कहा गया है। इसीलिये यह समस्त राज्य का प्रदाता तथा श्रेष्ठ है। व्रत करने वाले को यह सम्पूर्ण राज्य का फल देने वाला है। भगवान शिव यह भी आदेश देते हैं कि श्रावण में 


“सोमे मत्पूजा नक्तभोजनं” 


अर्थात सोमवार को मेरी पूजा और नक्तभोजन करना चाहिए। पूर्वकाल में सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने ही इस मंगलकारी सोमवार व्रत को किया था।


“कृष्णे नाचरितं पूर्वं सोमवारव्रतं शुभम्”

स्कंदपुराण के अनुसार सूत जी कहते हैं-


स्कंदपुराण के अनुसार सूत जी कहते हैं-


शिवपूजा सदा लोके हेतुः स्वर्गापवर्गयोः ।। 

सोमवारे विशेषेण प्रदोषादिगुणान्विते ।।

केवलेनापि ये कुर्युः सोमवारे शिवार्चनम् ।। 

न तेषां विद्यते किंचिदिहामुत्र च दुर्लभम् ।।

उपोषितः शुचिर्भूत्वा सोमवारे जितेंद्रियः ।। 

वैदिकैर्लौकिकैर्वापि विधिवत्पूजयेच्छिवम् ।।

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा कन्या वापि सभर्त्तृका।। 

विभर्तृका वा संपूज्य लभते वरमीप्सितम्।।

                                     3.3.8.10


प्रदोष आदि गुणों से युक्त सोमवार के दिन शिव पूजा का विशेष महात्म्य है। जो केवल सोमवार को भी भगवान शंकर की पूजा करते हैं, उनके लिए इहलोक और परलोक में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं। सोमवार को उपवास करके पवित्र हो इंद्रियों को वश में रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मंत्रों से विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान शिव की पूजा करके मनोवांछित वर पाता है।


शिवपुराण, कोटि रुद्रसंहिता के अनुसार-


निशि यत्नेन कर्तव्यं भोजनं सोमवासरे । 

उभयोः पक्षयोर्विष्णो सर्वस्मिञ्छिव तत्परैः ।।


दोनों पक्षों में प्रत्येक सोमवार को प्रयत्नपूर्वक केवल रात में ही भोजन करना चाहिए। शिव के व्रत में तत्पर रहने वाले लोगों के लिए यह अनिवार्य नियम है।


अष्टमी सोमवारे च कृष्णपक्षे चतुर्दशी।। 

शिवतुष्टिकरं चैतन्नात्र कार्या विचारणा।।


सोमवार की अष्टमी तथा कृष्णपक्ष चतुर्दशी इन दो तिथियों को व्रत रखा जाए तो वह भगवान शिव को संतुष्ट करने वाला होता है, इसमें अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है।


"सोमवारे प्रधानः स्यात्सायंकालः प्रकीर्तितः"


स्कन्दपुराण के अनुसार  मुख्य रूप से सोमवार को सांयकाल में पूजा की जानी चाहिए। सोमवार को चंद्र उदय के समय की गई महादेव की पूजा बहुत ही शुभ और कल्याणकारी है।


सोमवार, 3 जुलाई 2023

मंगला गौरी स्तोत्रं

 मंगला गौरी स्तोत्रं


रक्ष-रक्ष जगन्माते देवि मङ्गल चण्डिके।

हारिके विपदार्राशे हर्षमंगल कारिके ।।

हर्षमंगल दक्षे च हर्षमंगल दायिके ।

शुभेमंगल दक्षे च शुभेमंगल चंडिके।।

मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगल मंगले ।

सता मंगल दे देवि सर्वेषां मंगलालये ||

पूज्ये मंगलवारे च मंगलाभिष्ट देवते।

पूज्ये मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम्।।

मंगला धिस्ठात देवि मंगलाञ्च मंगले |

संसार मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम्।।

देव्याश्च मंगलंस्तोत्रं यः श्रृणोति समाहितः ।

प्रति मंगलवारे च पूज्ये मंगल सुख-प्रदे ।।

तन्मंगलं भवेतस्य न भवेन्तद्-मंगलम्।

वर्धते पुत्र-पौत्रश्च मंगलञ्च दिने - दिने ।।

मामरक्ष रक्ष-रक्ष ॐ मंगल मंगले ।

।। इति मंगलागौरी स्तोत्रं सम्पूर्ण ।।

कन्या के शीघ्र विवाह के लिए करें सावन में ये उपाय


कन्या के शीघ्र विवाह के लिए करें सावन में ये उपाय

श्रावण मास के मंगलवार को मंगलागौरी व्रत का विधान किया जाता है इस व्रत को नवविवाहित स्त्रियां 5 वर्ष के लिए करने का संकल्प लेती हैं। यह व्रत अखंड सौभाग्यदायक और सुख संतान की प्राप्ति करने वाला कहा गया है।

वे कन्याएं जिनकी कुंडली मे सप्तम भाव से सम्बंधित दोष आदि कहे जाते हैं, विवाह होने में देरी हो रही हो, विवाह सुख में बाधा जैसे दोष कुंडली मे देखे गए हों तो ऐसे में भी कन्याओं के द्वारा विवाह संबंधी दोष के निवारण के लिए "मंगलागौरी" व्रत किया जाता है।

इस व्रत को पांच,नौ, ग्यारह वर्ष तक करने का संकल्प लें, और सावन के प्रत्येक मंगलवार को विधिवत माता गौरी की पूजा करें। 16 दीपक, 16 फल, 16 श्रृंगार, सप्तमेवे और सप्तधान्य की 16-16 ढेरियों को रख, देवी गौरी का विभिन्न सामग्री से 16-16 बार अर्चन करें। व्रत की समाप्ति के दिन सोलह सौभाग्वती स्त्रियों को बुलाकर भोजन कराएं, यथाशक्ति दक्षिणा व सौभाग्य सामाग्री देकर आशीर्वाद लें।


माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति


जय जय गिरिराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गाता॥
देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथ जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही के॥
कीन्हेऊं प्रगट न कारन तेहिं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मुरति मुसुकानि॥
सादर सियं प्रसादु सर धरेऊ।
बोली गौरी हरषु हियं भरेऊ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सूचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु
सहज सुंदर सांवरो।
करुना निधान सुजान सीलु
सनेहु जानत रावरो॥

एही भांती गौरी असीस सुनी
सिय सहित हियं हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि
मुदित मन मंदिर चली॥

जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी।।
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
भव भव विभव पराभव कारिनि।
बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।

[दोहा]
पतिदेवता सुतीय महुँ,
मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि,
सहस सारदा सेष।।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी।
बरदायिनी पुरारि पिआरी।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
मोर मनोरथु जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।।
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ।
बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
नारद बचन सदा सुचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।

[छंद]
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु,
सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु,
सनेहु जानत रावरो।।
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय,
सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि,
मुदित मन मंदिर चली।।

[सोरठा]
जानि गौरि अनुकूल सिय,
हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल,
बाम अंग फरकन लगे।।


कुंडली मे विवाह बाधा के उपाय

सावन के पहले दिन रामचरितमानस के मासिक पारायण का संकल्प लें।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥

चौपाई से सम्पुटित का पाठ करें, नित्य 1-2 घंटे एक निश्चित समय पर पाठ करें, पंडित जी बुलाने से वो पाठ विधिवत शुरू कर देंगे, और पाठ पूर्ण होने पर विधिवत समापन भी कर देंगे। 

कन्या के विवाह में आने वाली बाधाओं के निवारण के लिए ये विधान मेरे अनुभव में अवश्य फल देने वाला देखा गया है।


उक्त मंत्र की कम से कम 5 मालाएँ प्रतिदिन करें


ऊपर अयोध्याकांड से सीता जी द्वारा गौरी पूजा की वंदना दी गयी है सुबह शाम इसका भी पाठ करें।


सुख सौभाग्य की देवी, शिवप्रिय "गौरी" माता आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगी।



रविवार, 2 जुलाई 2023

श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं

 श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं 


प्रथमं तु महादेवं द्वितीयं तु महेश्वरम् । 

तृतीयं शङ्करं प्रोक्तं चतुर्थं वृषभध्वजम् ॥ १॥


 पञ्चमं कृत्तिवासं च षष्ठं कामाङ्गनाशनम् ।

 सप्तमं देवदेवेशं श्रीकण्ठं चाष्टमं तथा ॥ २॥


 नवमं तु हरं देवं दशमं पार्वतीपतिम् ।

 रुद्रमेकादशं प्रोक्तं द्वादशं शिवमुच्यते ॥ ३॥


फलश्रुति

एतद्वादशनामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

 गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च भ्रूणहा गुरुतल्पगः ॥ ४॥

 स्त्रीबालघातकश्चैव सुरापो वृषलीपतिः ।

सर्वं नाशयते पापं शिवलोकं स गच्छति ॥ ५॥

 शुद्धस्फटिकसङ्काशं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ।

 इन्दुमण्डलमध्यस्थं वन्दे देवं सदाशिवम् ॥ ६॥ 


॥ इति श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


गुरुवार, 29 जून 2023

शिव मानस-पूजा

 

शिव मानस-पूजा ॐ साम्बसदाशिवाय नमः ~श्रावण/सावन विशेष~ शास्त्रों में मानस पूजा को बहुत महत्व दिया गया है बाह्य पूजा में पूजन सामाग्री आदि के लिए व्यक्ति भले ही भौगोलिक या आर्थिक निर्भरता रखे, पर मानसिक पूजा में हम हर उस सर्वश्रेष्ठ वस्तु, सामाग्री, पत्र, पुष्प, फल आदि का अर्चन अभिषेक करते है जो अप्राप्य/अप्राप्त या केवल कहे सुने गए हैं। मनकल्पित एक फूल करोड़ों फ़ूलों के समान है। अपने मन मे महादेव अम्बिका सुन्दर स्वरूप का ध्यान करके, आँखे बंद किये किये ही कल्पना करिए कि आप गौमुख से प्राप्त जल से अभिषेक कर रहे हैं, सुन्दर नील कमलों से भगवान का अर्चन कर रहे हैं। स्वर्ण पात्रों का प्रयोग कर रत्नजड़ित आसन में भगवान को आसन दे रहे हैं मतलब कल्पना का कोई अंत नहीं.... आप अपने आराध्य का मनचाहा पूजन करने के लिए स्वतंत्र हैं। ये मेरे मन की कल्पना मात्र नादि बल्कि शास्त्रों में वर्णित विधी है जिसे "शिव मानस पूजा" कहा गया है। इसकी एक संक्षिप्त विधि भी पुराणों में वर्णित है। १- ॐ "लं" पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि । (प्रभो ! मैं पृथिवीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ।) २-ॐ "हं" आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि । (प्रभो ! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ।) ३-ॐ "यं" वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि । (प्रभो ! मैं वायुदेवके रूपमें धूप आपको प्रदान करता हूँ।) ४-ॐ "रं" वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि । (प्रभो ! मैं अग्निदेवके रूपमें दीपक आपको प्रदान करता हूँ।) ५-ॐ "वं" अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि । (प्रभो ! मैं अमृतके समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ।) ६-ॐ "सौं" सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि । (प्रभो ! मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।) इन मन्त्रोंसे भावनापूर्वक मानस-पूजा की जा सकती है। मानस-पूजासे चित्त एकाग्र और सरस हो जाता है, इससे बाह्य पूजामें भी रस मिलने लगता है। यद्यपि इसका प्रचार कम है, तथापि शास्त्रोक्त ओर अत्यंत प्रभावी होने के कारण इसे अवश्य अपनाना चाहिये। मानसिक पूजा स्तोत्र श्रीमन शंकराचार्य जी की एक और अनुपम कृति है यहाँ अर्थ सहित उस स्तोत्र को दे रही हूँ अर्थ समझ कर, भाव पूर्ण पाठ करेंगे तो मनोवांछित फल प्राप्त होगा इसमें कोई संशय नही है। ये मैं अपने अनुभव से भी कह रही हूँ वो लोग जो बाहर विदेशों में दिया जलाने या विधि पूर्वक पूजा करने में असमर्थ होकर भी,अभाव में ही भावपूर्ण मानस पूजा कर,वे अनेकों अनुष्ठान से अधिक जल्दी फल प्राप्त कर लेते हैं।
 
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श्रावण शनिवार व्रत

 श्रावण शनिवार व्रत सावन के सोमवार का व्रत रखने के विषय मे सभी जानते हैं। सावन के मंगलवार को "मंगलागौरी व्रत" भी संभवतः आपने सुना हो। पर क्या आप जानते हैं "स्कंदपुराण" के अनुसार सावन के शनिवार को भगवान नरसिम्हा स्वामी, हनुमान जी और शनि देव के लिए विशेष पूजन किया जाता है। "श्रावणे मासि देवानां त्रयानां पूजनं शनौ। नृसिंहस्य शनैश्चव्य अञ्जनीनन्दनस्य च।।" श्रावण मास में शनिवार के दिन नृसिंह भगवान, शनिदेव तथा अंजनीपुत्र हनुमान इन तीनों देवताओं का पूजन करना चाहिए। श्री नारसिंह भगवान का लक्ष्मी माता सहित पूजन करना चाहिए, इस दिन लाल नीले पुष्पों से उनका पूजन कर गुड़ सौंठ का भोग लगाएं। इसके प्रभाव से व्यक्ति सभी भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेता है, और शत्रुओं से पीड़ा का भय भी समाप्त होता है। ◆आंजनेय हनुमान को पीपल/मंदार/तुलसी के पत्तों सुन्दर माला, अपराजिता, जपा, गुलाब, नीले मंदार के फूल से सुसज्जित कर, विधि पूर्वक उनका पूजन किया जाए। श्री राम रक्षा स्तोत्र, हनुमान चालीसा, हनुमद् द्वादशनाम इत्यादि का पाठ करें। स्कंदपुराण के अनुसार कहा गया है कि- “शनिवारे श्रावणे च अभिषेकं समाचरेत, रुद्रमंत्रेण तैलेन हनुमत्प्रीणनाय च। तैलमिश्रितसिन्दूरलेपमं तस्य समर्पयेत” श्रावण के शनिवार को रुद्रमंत्र के द्वारा तेल से हनुमान जी का अभिषेक करना चाहिए। तेल में मिश्रित सिन्दूर का लेप(चोला) उन्हें समर्पित करना चाहिए। श्रावणे मंदवारे तु एवमाराध्य वायुजं। वज्रतुल्यशरीरः स्यादरोगो बलवान्नरः।। वेगवान्कार्यकरणे बुद्धिवैभवभूषितः। शत्रु: संक्षयमाप्नोति मित्रवृद्धि: प्रजायते।। वीर्यवान्कीर्तिमांश्चैव प्रसादादंञ्जनीजने।” इस प्रकार श्रावण में शनिवार के दिन वायुपुत्र हनुमानजी की आराधना करके मनुष्य वज्रतुल्य शरीर वाला, निरोग और बलवान हो जाता है। अंजनीपुत्र की कृपा से वह कार्य करने में वेगवान, तथा बुद्धि वैभव से युक्त हो जाता है, उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, मित्रों की वृद्धि होती है और वह शक्तिवान तथा कीर्तिमान हो जाता है। ◆शिवपुराण के अनुसार- अपमृत्युहरे मंदे रुद्राद्रींश्च यजेद्बुधः  ॥  तिलहोमेन दानेन तिलान्नेन च भोजयेत् ॥ शनैश्चर अल्पमृत्यु का निवारण करने वाले है, इस दिन बुद्धिमान पुरुष रुद्र आदि की पूजा करे। तिल के होम से, दान से देवताओं को संतुष्ट करके ब्राह्मणों को तिलमिश्रित अन्न भोजन कराएं। तेल, लोहा, काला तिल, काला उडद, काला कंबल, दान करना चाहिए। शनिदेव की प्रसन्नता के लिए शारीरिक रूप से अक्षमव्यक्ति की सेवा/सहायता करें, तिल के तेल से शनि का अभिषेक कराना चाहिए। उनके पूजन मे तिल तथा उड़द का प्रयोग करें। उसके बाद शनि का ध्यान करें: शनैश्चरः कृष्णवर्णो मन्दः काश्यपगोत्रजः।  सौराष्ट्रदेशसम्भूतः सूर्यपुत्रो वरप्रदः। दण्डाकृतिर्मण्डले स्यादिन्द्रनीलसमद्युतिः। बाणबाणासनधरः शूलधृग्गृध्रवाहनः। यमाधिदैवतश्चैव ब्रह्मप्रत्यधिदैवतः। कस्तूर्यगुरुगन्ध: स्यात्तथा गुग्गुलुधूपकः। कृसरान्नप्रियश्चैव विधिरस्य प्रकीर्तितः। शनिश्चर कृष्ण वर्ण वाले हैं, मन्द गति वाले हैं,  कश्यप गोत्र वाले हैं, सौराष्ट्र देश में उत्पन्न हुए हैं, सूर्य के पुत्र हैं, वर प्रदान करने वाले हैं,  दण्ड के समान आकार वाले मंडल में स्थित हैं, इंद्रनीलमणितुल्य कांतिवाले हैं, हाथों में धनुष बाण त्रिशूल धारण किए हुए हैं, गीध पर अरुण हैं, यम इनके अधिदेवता हैं, ब्रह्मा इन के प्रत्यधिदेवता हैं, ये कस्तूरी–अगुरु का गंध तथा गूगल की धूप ग्रहण करते हैं, इन्हें खिचड़ी प्रिय है, इस प्रकार ध्यान की विधि कहीं गई है । पूजा के लिए लौहमयी सुंदर प्रतिमा लेकर, पूजा में कृष्ण वस्तु (काली वस्तु) का दान करना चाहिये।ब्राह्मण को काले रंग के दो वस्त्र देने चाहिए और काले बछड़े सहित काली गौ प्रदान करनी चाहिए। शनि स्तुति - यः पुनर्नष्टराज्याय नीलाय परितोषितः। ददौ निजं महाराज्यं स मे सौरिः प्रसीदतु।। शनिं नीलाञ्जनप्रख्यं मन्दचेष्टाप्रसारिणम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तन्नमामि शनैश्चरं।। नमस्ते कोणसंस्थाय पिङ्गलाय नमोऽस्तु ते। प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च।। आराधना से संतुष्ट होकर जिन्होंने नष्ट राज्य वाले नील को उनका महान राज्य पुनः प्रदान कर दिया, वे शनिदेव मुझ पर प्रसन्न हों। नील अंजन के समान वर्ण वाले, मंदगति से चलने वाले और छाया देवी तथा सूर्य से उत्पन्न होने वाले उस शनिश्चर को मैं नमस्कार करता हूँ। मंडल के कोण में स्थित आपको नमस्कार करता है,  पिंगल नाम वाले आप शनि को नमस्कार है। हे देवेश ! मुझ दीन तथा शरणागत पर कृपा कीजिए।। इस प्रकार स्तुति के द्वारा प्रार्थना करके बार-बार प्रणाम करना चाहिये। इस प्रकार श्रावण शनिवार को भगवान नारसिंह, हनुमान जी व शनिदेव का पूजन व व्रत कर सकते हैं। जयतु सनातन🚩  

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शिवार्चन, बिल्वपत्र और श्रावण मास

 शिवार्चन, बिल्वपत्र और श्रावण मास

          श्रावण/सावन विशेष

बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम

यः पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥

बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति । 

स सर्वतीर्थस्नातःस्यात्स एव भुवि पावनः॥


बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।


बिल्वपत्र तोड़ने का मंत्र-


अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेवप्रियः सदा ।

गृह्णामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात् ॥

(आचारेन्दु)


अमृत से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है। भगवान शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष में तुम्हारे पत्र तोड़ता हूं।


बिल्वपत्र तोड़नेका निषिद्ध काल–चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावास्या तिथियों को, संक्रान्ति के समय और सोमवार को बिल्वपत्र न तोड़े',


अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे। 

बिल्वपत्रं न च छिन्द्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत् ॥

                                                 (लिङ्गपुराण)


किंतु बिल्वपत्र शंकर जी को बहुत प्रिय है, अतः निषिद्ध समयमें पहले दिन का रखा बिल्वपत्र चढ़ाना चाहिये । 


अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुनः पुनः । शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित् ॥ 

(स्कन्दपुराण, आचारेन्दु,)


शास्त्र कथित  है कि यदि नूतन बिल्वपत्र न मिल सके तो चढ़ाये हुए बिल्वपत्र को ही धोकर बार-बार प्रयोग करते रहें।

जो फूल, पत्ते और जल बासी हो गये हों, उन्हें देवताओं पर न चढ़ाये। किंतु तुलसीदल और गङ्गाजल बासी नहीं होते। तीर्थों का जल भी बासी नहीं होता। 


वर्ज्य पर्युषितं पुष्पं वर्ज्यं पर्युषितं जलम् । 

न वर्ज्य तुलसीपत्रं न वर्ज्य जाह्नवीजलम् ॥ (बृहन्नारदीय)

न पर्युषितदोषोऽस्ति तीर्थतोयस्य चैव हि। (स्मृतिसारावली)


वस्त्र,यज्ञोपवीत और आभूषण में भी निर्माल्य का दोष नहीं आता। माली के घरमें रखे हुए फूलोंमें बासी दोष नहीं आता।


न निर्माल्यं भवेद् वस्त्रं स्वर्णरत्नादिभूषणम्। 

न पर्युषितदोषोऽस्ति मालाकारगृहेषु च। (आचारेन्दु०)


मणि,रत्न, सुवर्ण, वस्त्र आदिसे बनाये गये फूल बासी नहीं होते। इन्हें प्रोक्षण कर चढ़ाना चाहिये।

नारद जी ने 'मानस' (मनके द्वारा भावित) फूल को सबसे श्रेष्ठ फूल माना है। उन्होंने देवराज इन्द्र को बतलाया है कि हजारों-करोड़ों बाह्य फूलोंको चढ़ाकर जो फल प्राप्त किया जाता है, वह केवल एक मानस-फूल चढ़ानेसे प्राप्त हो जाता है। इससे मानस-पुष्प ही उत्तमं पुष्प है। बाह्य पुष्प तो निर्माल्य ही होते हैं। मानस पुष्प में बासी आदि कोई दोष नहीं होता। इसलिये पूजा करते समय मन से गढ़कर फूल चढ़ाने का अद्भुत आनन्द अवश्य प्राप्त करना चाहिये।


(★मानसपूजा पर मैने एक पोस्ट लिखा है उसे पढ़ें, आदि शंकराचार्यकृत स्तोत्र के साथ)


सामान्यतया निषिद्ध फूल यहाँ उन निषेधों को दिया जा रहा है जो सामान्यत: सब पूजा में सब फूलों पर लागू होते हैं। भगवान पर चढ़ाया हुआ फूल 'निर्माल्य' कहलाता है, सूँघा हुआ या अङ्ग में लगाया हुआ फूल इसी कोटि में आता है। इन्हें न चढ़ाये। भौंरे/मधुमक्खी के सूँघने से फूल दूषित नहीं होता। जो फूल अपवित्र बर्तन में रख दिया गया हो, अपवित्र स्थान में उत्पन्न हो, आग से झुलस गया हो, कीड़ों से विद्ध/काटा हो, सुन्दर न हो, जिसकी पंखुड़ियाँ बिखर गयी हों, जो पृथ्वी पर गिर पड़ा हो, जो पूर्णतः खिला न हो,जिसमें अप्रिय गंध आती हो, निर्गन्ध हो या उम्र गन्धवाला हो, ऐसे पुष्पों को नहीं चढ़ाना चाहिये। जो फूल बायें हाथ, पहनने वाले अधोवस्त्र, आक और अरण्ड के पत्ते में रखकर लाये गये हों, वे फूल त्याज्य है। कलियों को चढ़ाना मना है,किंतु यह निषेध कमल पर लागू नहीं है। फूलको जल में डुबाकर धोना मना है। केवल जल से इसका प्रोक्षण/छिड़क कर देना चाहिये ।

बिल्व पत्र अर्पित करते समय इन मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए:


त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।

त्रि जन्मपापसंहारं,विल्वपत्र शिवार्पणम्


भावार्थ: तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं। 


दर्शनं बिल्वपत्रस्य स्पर्शनम्‌ पापनाशनम्‌ ।

अघोर पाप संहारं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्‌ ॥


अखण्डै बिल्वपत्रैश्च पूजये शिव शंकरम्‌ ।

कोटिकन्या महादानं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्‌ ॥


शिव को बिल्व-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।इसलिए सावन भर प्रतिदिन 108 बिल्वपत्र की व्यवस्था कीजिए शिवार्चन के लिए। बांकी आप चढ़ाए हुए बिल्वपत्रों को धोकर पुनः प्रयोग के लिए रख ही सकते हैं।