शिवार्चन, बिल्वपत्र और श्रावण मास
श्रावण/सावन विशेष
बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम
यः पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥
बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति ।
स सर्वतीर्थस्नातःस्यात्स एव भुवि पावनः॥
बिल्व
के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता
है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता
है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।
बिल्वपत्र तोड़ने का मंत्र-
अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेवप्रियः सदा ।
गृह्णामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात् ॥
(आचारेन्दु)
अमृत
से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है। भगवान
शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष में तुम्हारे पत्र तोड़ता हूं।
बिल्वपत्र
तोड़नेका निषिद्ध काल–चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावास्या
तिथियों को, संक्रान्ति के समय और सोमवार को बिल्वपत्र न तोड़े',
अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे।
बिल्वपत्रं न च छिन्द्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत् ॥
(लिङ्गपुराण)
किंतु बिल्वपत्र शंकर जी को बहुत प्रिय है, अतः निषिद्ध समयमें पहले दिन का रखा बिल्वपत्र चढ़ाना चाहिये ।
अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुनः पुनः । शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित् ॥
(स्कन्दपुराण, आचारेन्दु,)
शास्त्र कथित है कि यदि नूतन बिल्वपत्र न मिल सके तो चढ़ाये हुए बिल्वपत्र को ही धोकर बार-बार प्रयोग करते रहें।
जो
फूल, पत्ते और जल बासी हो गये हों, उन्हें देवताओं पर न चढ़ाये। किंतु
तुलसीदल और गङ्गाजल बासी नहीं होते। तीर्थों का जल भी बासी नहीं होता।
वर्ज्य पर्युषितं पुष्पं वर्ज्यं पर्युषितं जलम् ।
न वर्ज्य तुलसीपत्रं न वर्ज्य जाह्नवीजलम् ॥ (बृहन्नारदीय)
न पर्युषितदोषोऽस्ति तीर्थतोयस्य चैव हि। (स्मृतिसारावली)
वस्त्र,यज्ञोपवीत और आभूषण में भी निर्माल्य का दोष नहीं आता। माली के घरमें रखे हुए फूलोंमें बासी दोष नहीं आता।
न निर्माल्यं भवेद् वस्त्रं स्वर्णरत्नादिभूषणम्।
न पर्युषितदोषोऽस्ति मालाकारगृहेषु च। (आचारेन्दु०)
मणि,रत्न, सुवर्ण, वस्त्र आदिसे बनाये गये फूल बासी नहीं होते। इन्हें प्रोक्षण कर चढ़ाना चाहिये।
नारद
जी ने 'मानस' (मनके द्वारा भावित) फूल को सबसे श्रेष्ठ फूल माना है।
उन्होंने देवराज इन्द्र को बतलाया है कि हजारों-करोड़ों बाह्य फूलोंको
चढ़ाकर जो फल प्राप्त किया जाता है, वह केवल एक मानस-फूल चढ़ानेसे प्राप्त
हो जाता है। इससे मानस-पुष्प ही उत्तमं पुष्प है। बाह्य पुष्प तो निर्माल्य
ही होते हैं। मानस पुष्प में बासी आदि कोई दोष नहीं होता। इसलिये पूजा
करते समय मन से गढ़कर फूल चढ़ाने का अद्भुत आनन्द अवश्य प्राप्त करना
चाहिये।
(★मानसपूजा पर मैने एक पोस्ट लिखा है उसे पढ़ें, आदि शंकराचार्यकृत स्तोत्र के साथ)
सामान्यतया
निषिद्ध फूल यहाँ उन निषेधों को दिया जा रहा है जो सामान्यत: सब पूजा में
सब फूलों पर लागू होते हैं। भगवान पर चढ़ाया हुआ फूल 'निर्माल्य' कहलाता
है, सूँघा हुआ या अङ्ग में लगाया हुआ फूल इसी कोटि में आता है। इन्हें न
चढ़ाये। भौंरे/मधुमक्खी के सूँघने से फूल दूषित नहीं होता। जो फूल अपवित्र
बर्तन में रख दिया गया हो, अपवित्र स्थान में उत्पन्न हो, आग से झुलस गया
हो, कीड़ों से विद्ध/काटा हो, सुन्दर न हो, जिसकी पंखुड़ियाँ बिखर गयी हों,
जो पृथ्वी पर गिर पड़ा हो, जो पूर्णतः खिला न हो,जिसमें अप्रिय गंध आती
हो, निर्गन्ध हो या उम्र गन्धवाला हो, ऐसे पुष्पों को नहीं चढ़ाना चाहिये।
जो फूल बायें हाथ, पहनने वाले अधोवस्त्र, आक और अरण्ड के पत्ते में रखकर
लाये गये हों, वे फूल त्याज्य है। कलियों को चढ़ाना मना है,किंतु यह निषेध
कमल पर लागू नहीं है। फूलको जल में डुबाकर धोना मना है। केवल जल से इसका
प्रोक्षण/छिड़क कर देना चाहिये ।
बिल्व पत्र अर्पित करते समय इन मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए:
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।
त्रि जन्मपापसंहारं,विल्वपत्र शिवार्पणम्
भावार्थ:
तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को
संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं।
दर्शनं बिल्वपत्रस्य स्पर्शनम् पापनाशनम् ।
अघोर पाप संहारं बिल्व पत्रं शिवार्पणम् ॥
अखण्डै बिल्वपत्रैश्च पूजये शिव शंकरम् ।
कोटिकन्या महादानं बिल्व पत्रं शिवार्पणम् ॥
शिव
को बिल्व-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।इसलिए सावन भर
प्रतिदिन 108 बिल्वपत्र की व्यवस्था कीजिए शिवार्चन के लिए। बांकी आप चढ़ाए
हुए बिल्वपत्रों को धोकर पुनः प्रयोग के लिए रख ही सकते हैं।