मंगलवार, 18 जुलाई 2023

मंगल की महादशा में विभिन्न ग्रहों की अंतर दशाओं के दुष्प्रभावों का शिव पूजा/ अनुष्ठान से निवारण।

 

मंगल

मंगल की महादशा में विभिन्न ग्रहों की अंतर 

दशाओं के दुष्प्रभावों का शिव पूजा/ अनुष्ठान 

से निवारण।

◆मंगल की महादशा में, मंगल की अन्तर्दशा में 

रुद्र-जप तथा वृषभदान करना चाहिये।

◆राहु की अन्तर्दशा होने पर नाग का दान, ब्राह्मण 

भोजन तथा मृत्युंजय मन्त्र जप कराने से आयु एवं 

आरोग्य की प्राप्ति होती है।

नागदानं प्रकुर्वीत देवब्राह्मणभोजनम् ।
मृत्युंजयजपं कुर्यादायुरारोग्यमादिशेत् ॥


मंगल में बृहस्पति की खराब अन्तर्दशा होने पर
शिवसहस्रनामावली का जप करना चाहिये।

'तद्दोष-परिहारार्थं शिवसाहस्त्रकं जपेत् ।'

इसी प्रकार शनि की दोषयुक्त अन्तर्दशा में मृत्युंजय 

मन्त्र के जप का विधान है।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

सोमवती अमावस्या- पितृदोष व कालसर्प दोष से सम्बंधित उपाय करें

 


               सोमवती अमावस्या 

पितृदोष व कालसर्प दोष से सम्बंधित उपाय करें


सोमवती अमावस्या को सूर्यग्रहण के समान फलदायी कहा गया है, इस दिन किया गया स्नान, दान, जप, तर्पण आदि अनंत गुणा फल देता है।


अमावास्या तु सोमेन सप्तमी भानुना सह।

चतुर्थी भूमिपुत्रेण सोमपुत्रेण चाष्टमी।।

चतस्रस्तिथयो स्त्वेताः सूर्यग्रहण सन्निभाः।

स्नानं दानं तथा श्राद्धं सर्वं तत्राक्षयं भवेत्।।


सोमवारी अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी एवं बुधवारी अष्टमी तिथीयां सूर्यग्रहण के समान फल देने वाली कही गयी हैं। इन तिथियों में किया गया स्नान, दान, जप, तर्पण आदि अनंतकोटि फलदायी कहा गया है।

इस दिन पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान करना विशेष शुभ कहा गया है।


वे जो पितृदोष से पीड़ित है आज पीपल 108 परिक्रमा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र के साथ करें, अर्घ्य जनेऊ अर्पित करें।


वे जो पितृ कर्म के कर्तव्य में बंधे हैं प्रत्येक अमावस्या को अवश्य  तर्पण आदि नियमों का पालन करें, आज तो परम पुण्यकारी सोमवती अमावस्या है आप स्वयं नही कर पा रहें है तो ब्राह्मण को बुलाकर विधि विधान से कर्तव्य का निर्वहन करें। याद रहे देव पूजा भाव प्रधान है पर पितृसत्ता के निमित्त किया जाने वाला कारक नियमपूर्वक व विधि विधान से किया जाना चाहिये। केवल इस कार्य से आप देखेंगे कि आप की बहुत सारी समस्याओं का स्वतः ही समाधान हो जाएगा। समय के साथ साथ अंतर महसूस होगा आपको।


आज सौभाग्वती स्त्रियों के द्वारा तुलसी/पीपल की परिक्रमा कर सौभाग्यकारक शिव-पार्वती पूजा का विधान भी किया जाता है। जिसमे 108 परिक्रमा किन्ही 108 वस्तुओं फल, मेवे, सौभाग्य सामाग्री इत्यादि से पूर्ण कर, पूजा आदि कर, सभी वस्तुएँ सौभाग्यशाली स्त्री/ ब्राह्मणी को दे दी जाती हैं।


श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र

 श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र


इस स्तोत्र का केवल एक पाठ शतरुद्री के तीन पाठों के समान फल देने वाला कहा गया है।


पार्वत्युवाच

शरीरार्धमहं शम्भोर्येन प्राप्स्यामि केशव ।

तदिदानीं समाचक्ष्व स्तोत्रं शीघ्रफलप्रदम् ॥


नारायण उवाच

अस्ति गुह्यतमं गौरि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।

शम्भोरहं प्रवक्ष्यामि पठतां शीघ्रकामदम् ॥


विनियोग – 

'ॐ अस्य श्रीशिवाष्टोत्तरशतदिव्यनामामृत-स्तोत्रमालामन्त्रस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनयोगः ।'


शिवसंकल्प इति हृदयम् । 

पुरुषसूक्तमिति शिरः ।

उत्तरनारायणेति शिखा ॥ 

अप्रतिरथेति कवचम् ।

विभ्राडिति नेत्रम् । 

शतरुद्रियमित्यस्त्रम् । 

आत्मानं रुद्ररूपं ध्यायेत् । 


(इन सूक्तों का पाठ करते हुए न्यास करे।)


ध्यान-

धवलवपुषमिन्दोर्मण्डले संनिविष्टं 

भुजगवलयहारं भस्मदिग्धाङ्गमीशम् ।

चारुचन्द्रार्धमौलिं हरिणपरशुपाणिं

हृदयकमलमध्ये संततं चिन्तयामि ॥

'चन्द्रमण्डल में श्री शिवजी विराजमान हैं, उनका गौर शरीर है, सर्प का ही कंगन तथा सर्प का ही हार पहने हुए हैं तथा शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं, उनके हाथों में मृगी मुद्रा एवं परशु है और अर्धचन्द्र सिर पर विराजमान है। मैं उन भगवान् शंकर का हृदय में निरंतर चिन्तन करता हूँ।'


शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः ।

वामदेवो विरूपाक्षः कपर्दी नीललोहितः ॥

शंकरः शूलपाणिश्च खट्वाङ्गी विष्णुवल्लभः ।

शिपिविष्टोऽम्बिकानाथः श्रीकण्ठो भक्तवत्सलः॥

भवः शर्वस्त्रिलोकेश: शितिकण्ठः शिवाप्रियः ।

उग्रः कपालिः कामारिरन्धका सुरसूदनः ॥

गङ्गाधरो ललाटाक्षः कालकालः कृपानिधिः ।

भीमः परशुहस्तश्च मृगपाणिर्जटाधरः ॥

कैलासवासी कवची कठोरस्त्रिपुरान्तकः ।

वृषाङ्को वृषभारूढो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

सामप्रियः स्वरमयस्त्रयीमूर्तिरनीश्वरः ।

सर्वज्ञः परमात्मा च सोमसूर्याग्निलोचनः ॥

हविर्यज्ञमयः सोमः पञ्चवक्त्रः सदाशिवः ।

विश्वेश्वरो वीरभद्रो गणनाथः प्रजापतिः ॥

हिरण्यरेता दुर्धर्षो गिरीशो गिरिशोऽनघः |

भुजङ्गभूषणो भर्गो गिरिधन्वा गिरिप्रियः ॥

कृत्तिवासा पुरारातिर्भगवान् प्रमथाधिपः ।

मृत्युंजयः सूक्ष्मतनुर्जगद्व्यापी जगद्गुरुः ॥

व्योमकेशो महासेनजनकश्चारुविक्रमः ।

रुद्रो भूतपतिः स्थाणुरहिर्बुध्न्यो दिगम्बरः ॥

अष्टमूर्तिरनेकात्मा सात्त्विकः शुद्धविग्रहः ।

शाश्वतः खण्डपरशुरजपाशविमोचकः ॥

मृडः पशुपतिर्देवो महादेवोऽव्ययः प्रभुः ।

पूषदन्तभिदव्यग्रो दक्षाध्वरहरो हरः ॥

भगनेत्रभिदव्यक्तः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ।

अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारकः परमेश्वरः ॥

एतदष्टोत्तरशतनाम्नामाम्नायेन सम्मितम् ।

विष्णुना कथितं पूर्वं पार्वत्या इष्टसिद्धये ॥

शंकरस्य प्रिया गौरी जपित्वा त्रैकालमन्वहम् ।

नोदिता पद्मनाभेन वर्षमेकं प्रयत्नतः ॥

अवाप सा शरीरार्धं प्रसादाच्छूलधारिणः ।

यस्त्रिसंध्यं पठेच्छम्भोर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥

शतरुद्रित्रिरावृत्त्या यत्फलं प्राप्यते नरैः ।

तत्फलं प्राप्नुयादेतदेकवृत्त्या जपन्नरः ॥

बिल्वपत्रैः प्रशस्तैर्वा पुष्पैश्च तुलसीदलैः ।

तिलाक्षतैर्यजेद् यस्तु जीवन्मुक्तो न संशयः ॥

नाम्नामेषां पशुपतेरेकमेवापवर्गदम् ।

अन्येषां चावशिष्टानां फलं वक्तुं न शक्यते ॥


।।इति श्री शिवरहस्ये गौरीनारायण संवादे शिवाष्टोत्तरशत दिव्यनामामृत स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।


इस प्रकार १०८ नाम, जो वेद के तुल्य हैं, श्री विष्णु ने पहले इष्ट-सिद्धि-हेतु माता पार्वती को बताये थे । शंकरप्रिया भगवती गौरी ने भगवान् पद्मनाभ की प्रेरणा से एक वर्ष तक प्रतिदिन त्रिकाल इस का जप किया। महादेव की कृपा से उन्होंने उनका शरीरार्ध प्राप्त किया। शतरुद्री के तीन बार पाठ करने से जो फल मनुष्य को प्राप्त होता है, वह फल इस स्तोत्र मात्र एक बार के पाठ करने से प्राप्त हो जाता है। 

बेलपत्र, फूल, तुलसीदल से, तिल तथा अक्षत से जो महादेव का यजन करते हैं, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं । भगवान् शंकर के इन शतनामों में से केवल एक नाम ही मोक्ष देनेववाला है तो शतनाम का महत्त्व (फल) वर्णन ही नही किया जा सकता है।


शनिवार, 15 जुलाई 2023

शनि प्रदोष व्रत पूर्ण शास्त्रोक्त विधान

 


                शनि प्रदोष 


यदा त्रयोदशी कृष्णा सोमवारेण संयुता ।

यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ॥

तदातीव फलं प्राप्तं धनपुत्रादिकं लभेत् ।

                                           "हेमाद्रि"


हेमाद्रि के अनुसार अगर त्रयोदशी तिथी कृष्ण पक्ष में सोमवार के दिन हो अथवा शुक्लपक्ष के मंद अर्थात शनिवार को हो, तो इस दिन किये गए व्रत पूजा आदि से धन सम्पदा और संतान सुख (कुलवृद्धि) की प्राप्ति होती है।


यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ।

आरब्धव्यं व्रतं तत्र संतानफलसिद्धये ॥

                                        "मदनरत्न"


मदनरत्न में भी वर्णित है कि शुक्लपक्ष में शनिवार को पढ़ने वाला प्रदोष व्रत संतान सुख की प्राप्ति कराता है।


प्रदोषव्रत को अलग अलग दिन में आने से इसका महत्व और अधिक हो जाता है केवल प्रदोष व्रत करके भी ग्रह जनित पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। 

प्रदोष काल मे शिव परिवार( महादेव, अम्बिका, षडानन, गणपति, नंदी और कीर्तिमुख) का पूजन करें, मिट्टी के अभाव में हल्दी/रोली से बनाकर यथाशक्ति पंच/दश/षोडशोपचार पूजा करें, उसके बाद किसी तालाब या क्यारी में इनका विसर्जन कर दें।


शिवालय में इस दिन 108 घी के दीपक लगाए, प्रयास करें मिट्टी के दिये हों अन्यथा आटे से दिए बनाकर, शिवलिंग के समक्ष दिए लगाए, परिक्रमा करें।


सौभाग्वती स्त्रियाँ गौरी जी को श्रृंगार चढ़ाकर किसी भी सौभाग्यवती स्त्री (पुजारी परिवार/मान पक्ष) को दे सकती हैं।


शनि साढ़ेसाती से प्रभावित व्यक्ति भी कल पूजा करें, शिवालय में शनि ग्रहजनित पीड़ा के निवारण के लिए दीपदान करें, कुंडली में कुपित (अगर योगकारक नही है) शनि के लिए कल शनि ग्रह की कारक सामग्री का दान करें। क्योंकि शनिवार व त्रयोदशी के साथ साथ अनुराधा नक्षत्र भी है।

मंगल - सावन में करें ग्रहों के अनुसार ज्योतिष उपाय



    सावन में करें ग्रहों के अनुसार उपाय


                       ~मङ्गल~


वैदिक ज्योतिष में मंगल को सेनापति की संज्ञा दी गयी अर्थात आक्रामकता, वीरता, कर्म को वरीयता, ये जितना सृदृण रक्षक है उतना ही प्रबल मारक भी, शरीर मे रक्त का कारक विशेषकर लाल रक्त कणिकाओं की मात्रा का निर्धारण करने वाला। 


जल्दबाजी, बहुत ज्यादा भावनात्मक, मंगल को भुमि पुत्र अर्थात "भौम" भी कहा जाता है, अगर किसी भी स्थिति में कुंडली मे बली है तो माता से विशेष भावनात्मक लगाव होता ही है।


ज्योतिष में विशेषकर मेडिकल एस्ट्रोलॉजी में जातक को सर्जरी की आवश्यकता, माइनर या मेजर सर्जरी का होना, रक्तविकार, चोट लगना, कर्ज़/ऋण भी मंगल के प्रभाव से देखा जाता है, जमीन से संबंधित लाभ और विवाद आदि में मंगल का विशेष प्रभाव देखा जाता है।


मंगल भाई व मित्र व उनके साथ आपके संबंधों, उनसे होने वाले लाभ-हानि आदि को भी दिखता है।


सावन में कैसे करें मंगल के उपाय-


मंगलवार का व्रत करें, नारसिंह स्तोत्र, मङ्गल कवच, हनुमान चालीसा का अनुष्ठानात्मक प्रयोग करें।


अगर ऋण से पीड़ित हैं तो ऋणमोचक मंगल/ नारसिंह स्तोत्र का पाठ करें।


अगर बार बार चोट लग रही है, गाड़ी और शरीर में स्क्रेच लगते ही रहते हैं तो भी मंगल का उपाय करें, मंगल व्रत, हनुमान साधना करें।


ऐसे लोग विशेषकर यात्रा में निकलते समय हनुमानद्वादशनाम का पाठ करके ही निकलें।


जमीन संबंधित मामलों में लाभ और हानि का कारक भी मंगल ही है, ऐसे में अगर आपको नाकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है जमीनी विवाद, बार बार जमीन आदि से जुड़े कामों में अड़चन, भाइयों और मित्रों की तरफ से तनाव व भय आदि दे रहा है तो मंगल और तृतीय/चतुर्थ भाव से सम्बंधित उपाय करें।


अगर लाभकारी होकर आपको जमीन, कंस्ट्रक्शन, माइनिंग या किसी भी तरह से मिट्टी से जुड़े लाभ मिल रहे हैं तो इसे व्रत उपाय आदि से और बली करें।


इमोशन्स पर कंट्रोल बहुत जरूरी है ऐसे लोग प्रायः भावनात्मक रूप से या तो बहुत कठोर अथवा बहूत कमज़ोर होते हैं, कठोर नारियल के अंदर नरम गिरी की तरह, तो जो इन्हें समझ लेता है उन्हें पता होता है कि इनसे कैसे काम निकलना है, तो मेडिटेशन करें, स्वयं  खुद फोकस और स्वयं ही कंट्रोल करें।


इस श्रावण भर शिवालय में प्रतिदिन तांबे के बने दिए पर घी का दीपक लगाए।


रक्त चंदन को अपने हाथों से घिसकर महाद्रव का श्रृंगार करें।


तांबे के लोटे में गुड़, रक्तचंदन मिलाकर महादेव का अभिषेक करें।


रक्तचंदन से बेलपत्र पर लिख कर  "ॐ साम्बसदाशिवाय नमः"  मंत्र के साथ महादेव का 27/108/1008 यथासम्भव संख्या में अर्चन करें।


मसूर की दाल/ मलका से महादेब का अर्चन करें।


अगर मंगल नाकारात्मक है व हाई ब्लड प्रेशर आदि दे रहा है तो मसूर की दाल का खाने में बिल्कुल प्रयोग न करें।


अगर शुभ भावों का स्वामी नहीं है मंगल तो मंगल की दान समाग्री आदि का ब्राह्मण/ क्षत्रिय को दान करें,  शुभ भाव का स्वामी होने पर ये समाग्री किसी को दान न देकर केवल शिवलिंग पर अर्पित कर दें।


मंगलवार और मंगल के नक्षत्रों 


मृगशिरा

चित्रा

धनिष्ठा,  


में ये उपाय अवश्य करें।


कुंडली मे अच्छा मंगल पुलिस, आर्मी पैरा फोर्सेस में भी स्थिति अनुसार व्यक्ति को कार्यरत होने का अवसर देता है, इन संस्थानों में हायर पोस्ट पर अधिकतर मंगल से विशेष रूप से प्रभावित व्यक्ति कार्यरत देखे जाते हैं, तो अगर आप आर्मी, पैरा फोर्सेस, या IPS/ज्यूडिशियल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो अपनी कुंडली को प्रबल करें। क्योंकि ग्रहों में सेनापति मंगल ही है।


वैसे तो हर कुंडली अलग है और हर कुंडली पर करने वाले उपाय भी अलग अलग ही होते हैं पर यहां मैने कुछ ऐसे उपाय दिए हैं जोकि लगभग सभी कर सकते हैं, तो इस सावन इन उपायों से लाभ उठायें।



गुरुवार, 13 जुलाई 2023

चंद्रमा- सावन में करें ग्रह अनुसार ज्योतिष उपाय

 

                   ~चंद्रमा~

व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति ही उसकी कुंडली बन जाती है जैसे कि फ़ोटो खींच लिया हो और एडिट करना सम्भव नही है। इसे ही "लग्न" कुंडली कहते हैं।

लग्न के समय ग्रहों की इस स्थिति से ही जीवन भर आपको किस ग्रह की ऊर्जा कैसे प्रभावित करेगी का निर्धारिण होता है। साथ साथ दशाएँ, गोचर इत्यादि चलते हैं पर लग्न कुंडली का रोल सबसे महत्वपूर्ण है।


पृथ्वी से अरबों खरबों दूर ये ग्रह अपनी ऊर्जा से पृथ्वी/व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जैसे हमारे सबसे निकट का ग्रह चंद्रमा जोकि जलतत्व का कारक है पृथ्वी और शरीर के जलतत्व पर पूर्ण प्रभाव रखता है। 

पूर्णिमा में उछाल मारता समुद्र का जल इसकी ऊर्जा के प्रभाव को दिखाता है वहीं अमावस्या में ऊर्जा का स्तर कम होने पर वही समुद्र शांत होकर पीछे चला जाता है। जिसे ज्वार-भाटा कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊर्जा के प्रभाव होते हैं जिन्हें यहां समझाना संभव नहीं।

 चंद्रमा की ये ऊर्जा, इस समय शरीर को (अगर खराब है) water retention, बैचेनी, बहुत प्यास लगने विशेषकर रात में, नींद न आना आदि लक्षण दिखाती है।


तो इस सावन कैसे करें कुंडली मे चंद्र ग्रह के उपाय-


◆सोमवार का व्रत रखें।

◆शाम को शिवालय में कच्चे गाय के दूध से।महादेव का अभिषेक करिए, पतली धारा जोकि दूध बर्तन में रहे तक न टूटे।

◆अगर चांदी के बर्तन से दूध या जल से अभिषेक करें तो और भी शुभ है

◆ जल में गंगाजल व शुद्ध मिश्री मिलाएं।

◆सफेद फूलों जैसे अपराजिता, सफेद गुड़हल आदि से और "नमः शिवाय" कहते हुए 27/108 यथाशक्ति  बेलपत्रों से अर्चन करें।

◆ज्योतिष में चंद्रमा चराचर जगत की माता कहा गया है, प्रेम और समर्पण के साथ पूजा करिए, माँ की तरह चंद्रमा भी आपकी हर तरह से रक्षा करेंगे।

◆माँ व माँ समान स्त्रियों का सम्मान करें।कटुवाणी अपशब्द न बोलें।

◆अगर शुभ भावों का स्वामी है तो दान आदि न करें, अन्यथा चंद्रमा के गुण वाली सामग्री का दान भी करें।

◆ रोगों की स्थिति में चंद्रशेखराष्टक और चंद्रमा के मंत्रों का पाठ/जप करें।

◆पूर्णिमा का उपवास करें, और इस दिन चंद्र को अर्घ्य भी दें।

बुधवार, 12 जुलाई 2023

सूर्य - सावन में ग्रहों के अनुसार उपाय

 Astrology & Remedies


     


               सूर्य ग्रह


सावन में आप अपने ज्योतिषाचार्य के बताए जिस भी ग्रह का उपचार करना चाहते हैं तो उसे शिवमन्दिर में करें, महादेव का उस ग्रह की कारक सामाग्री से अर्चन करें। 


उग्र व नकारात्मक भावों का स्वामी है तो दान भी करें।


शुभ भावों का स्वामी होकर कमज़ोर है तो उसका जप, स्तोत्र पाठ आदि करें।


जैसे लग्नेश अगर कमज़ोर है तो जातक की प्रतिरोधक क्षमता में कमी, निर्णय लेने को क्षमता में कमी,बातों में प्रभावशीलता की कमी, लीडरशिप की क्षमता में कमी, आत्मविश्वास में कमी आदि देता है देखा जाए तो अगर लग्नेश बली है तो कुण्डली की बांकी कमियों को काफी मात्रा में सम्हाल लेता है।


तो लग्नेश को बली करें, इस से जुड़े ग्रह का दान कभी न करें। 


जैसे सूर्य लग्नेश है तो तांबा, गेहूँ, आदि सूर्य से जुड़ी कारक सामाग्री का भी भी दान न करें। कभी कभी जब लग्नेश किसी कारण वश कुछ अप्रत्याशित परिणाम दे भी रहा है तो उसकी कारक सामग्री से शिवालय में लिंगार्चन कराएं।


जैसे सूर्य के लिए जपा के फ़ूल, सफेद मंदार के फूलों से शतार्चन या सहस्रार्चन करें। तांबे के लोटे से शिवलिंग का अभिषेक करें।


विशेषकर किसी मंदिर में शिवलिंग पर कलश नही है तो आप वहां तांबे के कलश की व्यवस्था कर सकते हैं।


विषेशकर रविवार और सूर्य के नक्षत्रों में दिए गए उपाय करने की कोशिश करें। 


कृतिका

उत्तरा फाल्गुनी

उत्तराषाढा


साथ ही सूर्य को अर्घ्य दें और सूर्याष्टकम और सूर्य के अन्य स्तोत्र आदि का पाठ करें।


गेहूँ के आटे का दिया, शुद्ध घी से शिवालय में सूर्योदय पर जलायें।


यग्योपवीत धारण करते हैं तो त्रिकाल नही तो यथा शक्ति सन्ध्या आदि करें।


बाँकी ग्रहों चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु आदि पर क्रमशः प्रदीन लिखती रहूँगी ताकि आप इसका लाभ ले सकें और इस सावन महादेब की आराधना के साथ साथ अपने ग्रहों के शुभ प्रभाव प्राप्त करने का भी प्रयास करें।

रविवार, 9 जुलाई 2023

सोमवार व्रत क्यों/कैसे करें-

 


     सोमवार व्रत क्यों/कैसे करें-


भगवान शिव श्रावण के सोमवार के बारे में कहते हैं- 


“मत्स्वरूपो यतो वारस्ततः सोम इति स्मृतः। 

प्रदाता सर्वराज्यस्य श्रेष्ठश्चैव ततो हि सः। 

समस्तराज्यफलदो वृतकर्तुर्यतो हि सः।।”


अर्थात सोमवार मेरा ही स्वरूप है, अतः इसे सोम कहा गया है। इसीलिये यह समस्त राज्य का प्रदाता तथा श्रेष्ठ है। व्रत करने वाले को यह सम्पूर्ण राज्य का फल देने वाला है। भगवान शिव यह भी आदेश देते हैं कि श्रावण में 


“सोमे मत्पूजा नक्तभोजनं” 


अर्थात सोमवार को मेरी पूजा और नक्तभोजन करना चाहिए। पूर्वकाल में सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने ही इस मंगलकारी सोमवार व्रत को किया था।


“कृष्णे नाचरितं पूर्वं सोमवारव्रतं शुभम्”

स्कंदपुराण के अनुसार सूत जी कहते हैं-


स्कंदपुराण के अनुसार सूत जी कहते हैं-


शिवपूजा सदा लोके हेतुः स्वर्गापवर्गयोः ।। 

सोमवारे विशेषेण प्रदोषादिगुणान्विते ।।

केवलेनापि ये कुर्युः सोमवारे शिवार्चनम् ।। 

न तेषां विद्यते किंचिदिहामुत्र च दुर्लभम् ।।

उपोषितः शुचिर्भूत्वा सोमवारे जितेंद्रियः ।। 

वैदिकैर्लौकिकैर्वापि विधिवत्पूजयेच्छिवम् ।।

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा कन्या वापि सभर्त्तृका।। 

विभर्तृका वा संपूज्य लभते वरमीप्सितम्।।

                                     3.3.8.10


प्रदोष आदि गुणों से युक्त सोमवार के दिन शिव पूजा का विशेष महात्म्य है। जो केवल सोमवार को भी भगवान शंकर की पूजा करते हैं, उनके लिए इहलोक और परलोक में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं। सोमवार को उपवास करके पवित्र हो इंद्रियों को वश में रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मंत्रों से विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान शिव की पूजा करके मनोवांछित वर पाता है।


शिवपुराण, कोटि रुद्रसंहिता के अनुसार-


निशि यत्नेन कर्तव्यं भोजनं सोमवासरे । 

उभयोः पक्षयोर्विष्णो सर्वस्मिञ्छिव तत्परैः ।।


दोनों पक्षों में प्रत्येक सोमवार को प्रयत्नपूर्वक केवल रात में ही भोजन करना चाहिए। शिव के व्रत में तत्पर रहने वाले लोगों के लिए यह अनिवार्य नियम है।


अष्टमी सोमवारे च कृष्णपक्षे चतुर्दशी।। 

शिवतुष्टिकरं चैतन्नात्र कार्या विचारणा।।


सोमवार की अष्टमी तथा कृष्णपक्ष चतुर्दशी इन दो तिथियों को व्रत रखा जाए तो वह भगवान शिव को संतुष्ट करने वाला होता है, इसमें अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है।


"सोमवारे प्रधानः स्यात्सायंकालः प्रकीर्तितः"


स्कन्दपुराण के अनुसार  मुख्य रूप से सोमवार को सांयकाल में पूजा की जानी चाहिए। सोमवार को चंद्र उदय के समय की गई महादेव की पूजा बहुत ही शुभ और कल्याणकारी है।


शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

शिव ध्यान मंत्र

 शिव ध्यान मंत्र


शङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं 

शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकराल

भूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम्।

काशीशं कलिंकल्मषौघशमनं

कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं

गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम् ॥


शङ्ख और चन्द्रमा की कान्ति के अत्यन्त सुन्दर शरीर वाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्र पहनने वाले, काल के समान (अथवा काले रंग के) भयानक सर्पों का भूषण धारण करने वाले, गङ्गा और चन्द्रमा को प्रेम करने वाले, काशीपति, कलियुग जनित पाप समूह का नाश करने वाले, कल्याण के कल्पवृक्ष, गुणों के निधान और कामदेव को भस्म करने वाले पार्वतीपति वन्दनीय श्री शंकरजी को मैं नमस्कार करता/करती हूँ।

सोमवार, 3 जुलाई 2023

मंगला गौरी स्तोत्रं

 मंगला गौरी स्तोत्रं


रक्ष-रक्ष जगन्माते देवि मङ्गल चण्डिके।

हारिके विपदार्राशे हर्षमंगल कारिके ।।

हर्षमंगल दक्षे च हर्षमंगल दायिके ।

शुभेमंगल दक्षे च शुभेमंगल चंडिके।।

मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगल मंगले ।

सता मंगल दे देवि सर्वेषां मंगलालये ||

पूज्ये मंगलवारे च मंगलाभिष्ट देवते।

पूज्ये मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम्।।

मंगला धिस्ठात देवि मंगलाञ्च मंगले |

संसार मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम्।।

देव्याश्च मंगलंस्तोत्रं यः श्रृणोति समाहितः ।

प्रति मंगलवारे च पूज्ये मंगल सुख-प्रदे ।।

तन्मंगलं भवेतस्य न भवेन्तद्-मंगलम्।

वर्धते पुत्र-पौत्रश्च मंगलञ्च दिने - दिने ।।

मामरक्ष रक्ष-रक्ष ॐ मंगल मंगले ।

।। इति मंगलागौरी स्तोत्रं सम्पूर्ण ।।

कन्या के शीघ्र विवाह के लिए करें सावन में ये उपाय


कन्या के शीघ्र विवाह के लिए करें सावन में ये उपाय

श्रावण मास के मंगलवार को मंगलागौरी व्रत का विधान किया जाता है इस व्रत को नवविवाहित स्त्रियां 5 वर्ष के लिए करने का संकल्प लेती हैं। यह व्रत अखंड सौभाग्यदायक और सुख संतान की प्राप्ति करने वाला कहा गया है।

वे कन्याएं जिनकी कुंडली मे सप्तम भाव से सम्बंधित दोष आदि कहे जाते हैं, विवाह होने में देरी हो रही हो, विवाह सुख में बाधा जैसे दोष कुंडली मे देखे गए हों तो ऐसे में भी कन्याओं के द्वारा विवाह संबंधी दोष के निवारण के लिए "मंगलागौरी" व्रत किया जाता है।

इस व्रत को पांच,नौ, ग्यारह वर्ष तक करने का संकल्प लें, और सावन के प्रत्येक मंगलवार को विधिवत माता गौरी की पूजा करें। 16 दीपक, 16 फल, 16 श्रृंगार, सप्तमेवे और सप्तधान्य की 16-16 ढेरियों को रख, देवी गौरी का विभिन्न सामग्री से 16-16 बार अर्चन करें। व्रत की समाप्ति के दिन सोलह सौभाग्वती स्त्रियों को बुलाकर भोजन कराएं, यथाशक्ति दक्षिणा व सौभाग्य सामाग्री देकर आशीर्वाद लें।


माँ सीता के द्वारा माँ पार्वती स्तुति


जय जय गिरिराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गाता॥
देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथ जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही के॥
कीन्हेऊं प्रगट न कारन तेहिं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मुरति मुसुकानि॥
सादर सियं प्रसादु सर धरेऊ।
बोली गौरी हरषु हियं भरेऊ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सूचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु
सहज सुंदर सांवरो।
करुना निधान सुजान सीलु
सनेहु जानत रावरो॥

एही भांती गौरी असीस सुनी
सिय सहित हियं हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि
मुदित मन मंदिर चली॥

जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी।।
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
भव भव विभव पराभव कारिनि।
बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।

[दोहा]
पतिदेवता सुतीय महुँ,
मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि,
सहस सारदा सेष।।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी।
बरदायिनी पुरारि पिआरी।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
मोर मनोरथु जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबहिं कें।।
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ।
बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
नारद बचन सदा सुचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।

[छंद]
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु,
सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु,
सनेहु जानत रावरो।।
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय,
सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि,
मुदित मन मंदिर चली।।

[सोरठा]
जानि गौरि अनुकूल सिय,
हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल,
बाम अंग फरकन लगे।।


कुंडली मे विवाह बाधा के उपाय

सावन के पहले दिन रामचरितमानस के मासिक पारायण का संकल्प लें।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥

चौपाई से सम्पुटित का पाठ करें, नित्य 1-2 घंटे एक निश्चित समय पर पाठ करें, पंडित जी बुलाने से वो पाठ विधिवत शुरू कर देंगे, और पाठ पूर्ण होने पर विधिवत समापन भी कर देंगे। 

कन्या के विवाह में आने वाली बाधाओं के निवारण के लिए ये विधान मेरे अनुभव में अवश्य फल देने वाला देखा गया है।


उक्त मंत्र की कम से कम 5 मालाएँ प्रतिदिन करें


ऊपर अयोध्याकांड से सीता जी द्वारा गौरी पूजा की वंदना दी गयी है सुबह शाम इसका भी पाठ करें।


सुख सौभाग्य की देवी, शिवप्रिय "गौरी" माता आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगी।



रविवार, 2 जुलाई 2023

श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं

 श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं 


प्रथमं तु महादेवं द्वितीयं तु महेश्वरम् । 

तृतीयं शङ्करं प्रोक्तं चतुर्थं वृषभध्वजम् ॥ १॥


 पञ्चमं कृत्तिवासं च षष्ठं कामाङ्गनाशनम् ।

 सप्तमं देवदेवेशं श्रीकण्ठं चाष्टमं तथा ॥ २॥


 नवमं तु हरं देवं दशमं पार्वतीपतिम् ।

 रुद्रमेकादशं प्रोक्तं द्वादशं शिवमुच्यते ॥ ३॥


फलश्रुति

एतद्वादशनामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

 गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च भ्रूणहा गुरुतल्पगः ॥ ४॥

 स्त्रीबालघातकश्चैव सुरापो वृषलीपतिः ।

सर्वं नाशयते पापं शिवलोकं स गच्छति ॥ ५॥

 शुद्धस्फटिकसङ्काशं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ।

 इन्दुमण्डलमध्यस्थं वन्दे देवं सदाशिवम् ॥ ६॥ 


॥ इति श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


कैसे कार्य करते हैं मंत्र? कैसे और क्यों मंत्रों के जप से आते हैं अन्तर?

 मंत्र-शास्त्र


कैसे कार्य करते हैं मंत्र? कैसे और क्यों मंत्रों के जप से आते हैं अन्तर?


ज्योतिष के साथ साथ एक प्रश्न अक्सर लोगों से सुनती हूँ कि मंत्र आदि कैसे काम करते हैं,? क्यों मंत्र जप से ग्रहों के प्रभाव सकारात्मक हो जाते हैं? क्यों मंत्र जप से रोगादि में लाभ मिलता है।

वास्तव में सनातन धर्म, जो कि मैं अक्सर कहती हूँ! वैज्ञानिक धरातल पर सिद्ध नियमों पर आधारित है। 

 इसको किसी एक विषय पर चर्चा करके नही समझा जा सकता है। जैसे अनेकों शिराओं, धमनियों आदि से ये जटिल शरीर बना है। उसी प्रकार अनेक सिद्धान्तों पर आधारित सनातन सभ्यता है। हमारे ऋषि मुनियों जो कि वास्तव में वैज्ञानिक थे उन्होंने इन नियमों को जनमानस के नित्यनियमों से जोड़ा और नित्यनियमों का पालन ही धर्म (duty) कहलाया।


विषय पर आते हैं भाषा की अर्थसम्मत इकाई वाक्य है। वाक्य से छोटी इकाई उपवाक्य, उपवाक्य से छोटी इकाई पदबंध, पदबंध से छोटी इकाई शब्द, शब्द से छोटी इकाई अक्षर और अक्षर की आधारशिला है वर्ण, अक्षर जिसका क्षरण न हो सके अर्थात अ+क्षर, किसी भी प्रकार से उनको नष्ट नही किया जा सकता। और इस अधिकतम न्यूनता की स्थिति को प्राप्त वर्णो/अक्षरों से ही हमारा शब्द विज्ञान शुरू होता है।


व्यंजन 

क वर्ग- क ख ग घ ङ


च वर्ग- च छ ज झ ञ


ट वर्ग- ट ठ ड (ड) ढ (ढ) ण (द्विगुण व्यंजन ड़ ढ़)


त वर्ग- त थ द ध न


प वर्ग- प फ ब भ म


अंतःस्थ- य र ल व


ऊष्म- श ष स ह ( कुल 33 +2 =35)


संयुक्त व्यंजन की कुल संख्या 4 है जो निम्नानुसार हैं।


क्ष- (क् + ष)

त्र- (त् + र)

ज्ञ- (ज+')

श्र- (श् + र)


वर्णों को स्वर व व्यंजन में बांटा गया है।

वो वर्ण जिनके उच्चारण स्वतंत्र होते हैं वे स्वर कहलाते हैं।इनकी संख्या 13 हैं पर उच्चारण पर उच्चारण की शुद्धता देखें तो ये केवल निम्नलिखित 10 हैं।


अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ


वे वर्ण जिनके उच्चारण में आधी सी मात्रा लगती प्रतीत होती है हश्व कहलाते हैं।


अ इ उ


वे वर्ण जिनके उच्चारण में समय दीर्घ/ ज्यादा लगता है वे दीर्घ वर्ण कहलाते हैं।


आ ई ऊ ए ऐ ओ औ ऑ


वे वर्ण जिनके उच्चारणमे दीर्घ से भी अधिक समय लगता है वे प्लूत कहलाते हैं

जैसा कि आपने कई मंत्रों के बीच मे अक्सर एक S जैसा देखा होगा।


ना S S S द


इसी प्रकार जीभ के प्रयोग के आधार पर अग्र, मध्य और पश्च स्वर हुए।


जीभ के पलटने की स्थिति पर संवर्त, अर्धसन्वर्त, अर्ध निवृत व निवृत कहलाये।


ओष्ठों के प्रयोग से आवृतमुखी(होंठ गोलाकार नही होते हैं)और वृतमुखी (होंठ गोलाकार होते है) कहलाये।


बोलते समय हवा के मुख से निकलने पर मौखिक (अ आ इ)व नाक के द्वारा निकलने पर अनुनासिक (आँ, अँ) कहलाये।


अब व्यंजन की बात करते हैं स्वर की सहायता से बोले जाने वाले शब्द व्यंजन कहलाते हैं।

ये 35 होते हैं

जिन्हें इन व्यंजनों का उच्चारण करते समय मुख के जिस भाग विशेष पर स्पर्श महसूस होता है उस आधार पर व्यंजनों के वर्ग बांटे गए हैं।


कंठ-  क ख ग घ ङ 

(जब बोलते समय कंठ को दबाव स्पर्श होता लगे)


तालू - च छ ज झ 

(जब बोलते समय मुँह के ऊपरी तल का पिछला स्थान स्पर्श हो)


मूर्धा- ट ठ ड ढ 

(जब बोलते समय तालु के आगे की तरफ हवा का स्पर्श अनुभव हो)


दंतव- त थ द ध 

(जब बोलते समय दांतों का प्रयोग अनुभव हो)


ओष्ठ- प फ ब भ 

( इन व्यंजनों के उच्चारण के समय होंठो के प्रयोग अनुभव होते हैं)

इनमे घोष व अघोष, प्राण,अल्पप्राण, महा-प्राण के रूप में व्यंजन को परिभाषित किया गया है। 


उच्चारण के आधार पर भी इन्हें निम्नलिखित भागों में समझाया जाता है।

कंठव्य

तालव्य

मूर्धन्य

वत्सर्य

दंतव्य

दंतोष्ठय

ओष्ठ्य

जिव्हामुलीय

काकल्य


अनुस्वार व विसर्ग महत्वपूर्ण है जो कभी स्वर तो कभी व्यंजन अनुभव होते हैं। परंतु इनका वर्गीकरण न तो स्वर में है ना ही व्यंजन में।


मैं भाषा/शब्द विज्ञान की जानकार नहीं हूं, यहाँ मैंने स्वध्याय से सरल भाषा मे केवल पाठकों के समझने हेतु संक्षेप में वर्णन किया है वैसे व्याकरण और शब्द विज्ञान को समझने के लिए अलग से विस्तृत अध्यन करने की आवश्यकता होगी।

यहाँ इस विवरण को देने का तात्पर्य बस इतना था कि ये वर्णाक्षर के प्रयोग और ध्वनि के साथ साथ इनके प्रयोग में आने वाले मुखांगों का भी वर्गीकरण किया जा सके।

अब एक और लिखना चाहूँगी कि हमारे मुँह के ऊपरी तालू में ही लगभग 84 सूक्ष्म मर्म बिंदु होते हैं जिनमे मंत्रो (वर्णों, स्वर/व्यंजनों  के ये समूह) के द्वारा दाब उत्पन्न होता है और वे  सक्रिय हो जाते हैं। इनसे उत्पन कम्पन्न मष्तिष्क की रासायनिक क्रियाओं में परिवर्तन लाता है जिससे हमारी मानसिक अवस्था,भावनाएं, शारीरिक स्थिती एवं व्यवहार में हम सकारात्मक परिवर्तन अनुभव करने लगते है।

मंत्र अपने आप मे स्वयं एक पूर्ण विज्ञान है यहां पुनः संक्षेप में पाठको के समझने के लिए वर्णन करना सही होगा।

मंत्रो का आधार "बीज मंत्र" हैं। मंत्रो को भी सौम्य, उग्र,शाबर, आदि श्रेणियों में बाँटा गया है। 

चरक संहिता में महर्षि चरक लिखते हैं

यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे

अर्थात ब्रह्मांड का सूक्ष्म स्वरूप या शरीर है जिस प्रकार की प्रक्रिया ब्रह्मांड में होती है वही ब्रह्मण्ड के इस सूक्ष्म स्वरूप में भी अत्यंत सूक्ष्म रूप में स्थान प्राप्त करती है।

 ज्योतिष शास्त्र में भी ब्रह्मांड में विभिन्न ग्रहों के चलायमान होने की प्रक्रिया स्वरूप भेद और परिवर्तन की गणना देखी जाती है। शरीर मे इसकी आवश्यकताओं के आधार पर सकारात्मक परिवर्तन लाने हेतु सम्बंधित विषयों के मंत्रों की सृष्टि की गई। जिनके उच्चारण से और उनमें स्वर व्यंजनों के प्रयोग के माध्यम से  विभिन्न मर्म बिंदुओं को आवश्यकता अनुसार सक्रिय कर के, देह में यथोचित रासायनिक परिवर्तन लाकर उन्हें ब्रह्मांड में होने वाली क्रियाओं की सकारात्मक ऊर्जा से एकाकार किया जा सके।

 इसलिए जब हम आवश्यकता के अनुसार मंत्रों  का प्रयोग कर देवता/ ग्रह की शांति और सकारात्मकता का उपचार करते हैं तब उसके परिणाम दिखाई देते हैं। मंत्रों के प्रयोग से केवल मर्मबिन्दु नहीं बल्कि मुँह होंठो और कभी कभी पूरे शरीर मे एक प्रकार का कम्पन्न ओर ऊर्जा का प्रवाह सा अनुभव होता है। जिसे कि हमारे आभामंडल और शरीर की इलेक्ट्रोमेग्नेटिक ऊर्जा को मंत्र/सम्बंधित ग्रह/ऊर्जा के प्रकार से सामंजस्य बिठाने का संकेत समझा जाना चाहिए।

 हाँ कई बार जब आपका शरीर उस ऊर्जा को अवशोषित करने के योग्य नही होता और आप तीव्र/उग्र मंत्रो को बिना गुरु सानिध्य/ पूर्व अनुभव अथवा शरीर को तैयार किये बिना प्रयोग करते हैं तो जरूर अनचाहे अनुभव होते हैं।

 जोकि मंत्र विज्ञान की विशालता और उसके प्रयोग विधि के महत्व बारे में बताते हैं।



शनिवार, 1 जुलाई 2023

राहु महादशा व गोचर

 🔴Astrology&Remedies🔴


राहु महादशा, अंतर/गोचर उपाय


1- शनिवार (आज) शाम को अलसी के तैल और लाल मौली/कलावे की बत्ती का चौमुखा दीपक, शिवालय में लगाएं।

2- दुर्गा स्तोत्र चालीसा जो भी हो पाठ करें।

3- बेल पत्र, विजया/भाँग पत्र, विष्णुकांता के फूलों से शिवलिंग का अर्चन करें।

4- सरस्वती मंत्र का जप करें।

5 मेडिटेशन करें, सार्वजनिक स्थानों की तो कर नही सकते तो धार्मिक स्थलों में सफाई करें।


राहु का वैदिक स्वरूप बिना धड़ का सिर है, मतलब राहु का प्रभाव सबसे पहले आपकी सोच/मस्तिष्क पर पड़ता है। अगर राहु के कुप्रभाव हैं तो मानसिक उलझन, निर्णय लेने की क्षमता में कमी, बहुत ज्यादा कंफ्यूज़न, रात में नीद न आना, आदि कुछ लक्षण हैं। स्क्रीन/सोशल मीडिया में जरूरत से ज्यादा समय देना भी राहु को और खराब करता है, ये आप पर निर्भर करता है कि आप सोशल-मीडिया या फ़ोन पर ज्ञानवर्धक चीज़े या किताबें/pdf पढ़ेंगे या फालतू रील्स देखने में वक्त बर्बाद करेंगे। 

मतलब मस्तिष्क और सोच को स्वच्छ रखिये, मेडिटेशन करिए, एक्सरसाइज करिए, स्तोत्र मंत्रो का पाठ करिए, मंत्रों का पाठ भी मानसिक और भावनात्मक बल देता है।

एक बात और पानी की बर्बादी का कारण मत बनिये, पानी ज्योतिष में चंद्रमा अर्थात मन का कारक कहा गया है, इसलिए राहु का दुष्प्रभाव होने पर अक्सर घर मे पानी के स्तोत्र से पानी बहना शुरू हो जाता है। बार बार सही करने के बाद भी नल टपकते रहते हैं। मतलब चंद्रमा/मन यानी शुद्ध पानी, राहु अर्थात अशुद्ध स्थान में बहकर पहुंच रहा है। जैसे जैसे ये बढ़ेगा वैसे वैसे चंद्रमा कमज़ोर होगा और राहु का कंफ्यूज़न भी बढ़ता जाएगा जातक पर।

अगर कुंडली मे राहु के दुष्प्रभाव हैं और आप महादशा, गोचर से निकल रहे हैं तो बार बार एक सी गलतियां होना, एक लूप सा बन जाता है जिसमे व्यक्ति गोल गोल घूमता रहता है। वहीं शुभ प्रभाव में राहु अनायास यश,कीर्ति, धन, पद की प्राप्ति का कारण बनता है। कलयुग शुक्र व राहु प्रधान कहा गया है, जहाँ दिखावा/प्रपञ्च/स्वार्थ सन्यासियों को भी नही छोड़ रहा तो हम लोग तो सामान्य लोग हैं। इसलिए मन को मजबूत रखें राहु यानी भ्रम का मात्र एक ही उपाय है ज्ञान, सरस्वती साधना शिक्षा, गीतसंगीत, वाद्ययंत्रों का प्रयोग करें। जरूरी नही धार्मिक पर मीनिंगफुल किताबें पढ़ें, सस्ते साहित्य और वीडिओज़ से दूरी बनाएं



जयतु सनातन🚩