गुरुवार, 29 जून 2023

शिव मानस-पूजा

 

शिव मानस-पूजा ॐ साम्बसदाशिवाय नमः ~श्रावण/सावन विशेष~ शास्त्रों में मानस पूजा को बहुत महत्व दिया गया है बाह्य पूजा में पूजन सामाग्री आदि के लिए व्यक्ति भले ही भौगोलिक या आर्थिक निर्भरता रखे, पर मानसिक पूजा में हम हर उस सर्वश्रेष्ठ वस्तु, सामाग्री, पत्र, पुष्प, फल आदि का अर्चन अभिषेक करते है जो अप्राप्य/अप्राप्त या केवल कहे सुने गए हैं। मनकल्पित एक फूल करोड़ों फ़ूलों के समान है। अपने मन मे महादेव अम्बिका सुन्दर स्वरूप का ध्यान करके, आँखे बंद किये किये ही कल्पना करिए कि आप गौमुख से प्राप्त जल से अभिषेक कर रहे हैं, सुन्दर नील कमलों से भगवान का अर्चन कर रहे हैं। स्वर्ण पात्रों का प्रयोग कर रत्नजड़ित आसन में भगवान को आसन दे रहे हैं मतलब कल्पना का कोई अंत नहीं.... आप अपने आराध्य का मनचाहा पूजन करने के लिए स्वतंत्र हैं। ये मेरे मन की कल्पना मात्र नादि बल्कि शास्त्रों में वर्णित विधी है जिसे "शिव मानस पूजा" कहा गया है। इसकी एक संक्षिप्त विधि भी पुराणों में वर्णित है। १- ॐ "लं" पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि । (प्रभो ! मैं पृथिवीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ।) २-ॐ "हं" आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि । (प्रभो ! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ।) ३-ॐ "यं" वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि । (प्रभो ! मैं वायुदेवके रूपमें धूप आपको प्रदान करता हूँ।) ४-ॐ "रं" वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि । (प्रभो ! मैं अग्निदेवके रूपमें दीपक आपको प्रदान करता हूँ।) ५-ॐ "वं" अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि । (प्रभो ! मैं अमृतके समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ।) ६-ॐ "सौं" सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि । (प्रभो ! मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।) इन मन्त्रोंसे भावनापूर्वक मानस-पूजा की जा सकती है। मानस-पूजासे चित्त एकाग्र और सरस हो जाता है, इससे बाह्य पूजामें भी रस मिलने लगता है। यद्यपि इसका प्रचार कम है, तथापि शास्त्रोक्त ओर अत्यंत प्रभावी होने के कारण इसे अवश्य अपनाना चाहिये। मानसिक पूजा स्तोत्र श्रीमन शंकराचार्य जी की एक और अनुपम कृति है यहाँ अर्थ सहित उस स्तोत्र को दे रही हूँ अर्थ समझ कर, भाव पूर्ण पाठ करेंगे तो मनोवांछित फल प्राप्त होगा इसमें कोई संशय नही है। ये मैं अपने अनुभव से भी कह रही हूँ वो लोग जो बाहर विदेशों में दिया जलाने या विधि पूर्वक पूजा करने में असमर्थ होकर भी,अभाव में ही भावपूर्ण मानस पूजा कर,वे अनेकों अनुष्ठान से अधिक जल्दी फल प्राप्त कर लेते हैं।
 
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