कृष्ण जन्माष्टमी व्रत
कब करें जन्माष्टमी व्रत?
क्यों आवश्यक है जन्माष्टमी व्रत, इसका महत्व?
कृष्ण जन्माष्टमी और जयंती में क्या है अंतर?
क्या आपको पता है सनातन धर्म के ग्रंथों में ऐसी चार महारात्रियों का वर्णन आता है जो सभी प्रकार की सिद्धि, साधना, मंत्र जप, स्तोत्रपाठ, होम आदि पूजा के विभिन्न माध्यमों से सभी प्रकार की मनोकामना को सिद्ध करने वाली कही गयी है।
1-दीपावली- कालरात्रि
2-महाशिवरात्रि- महारात्रि
3-जन्माष्टमी- मोहरात्रि
4-होलिका दहन- दारुण रात्रि
वैसे तो अनेकों ग्रंथों में अलग अलग प्रकार से इनका वर्णन किया गया है पर यहां में तंत्रोक्त देवी सूक्त के सातवें श्लोक का संदर्भ दे रही हूँ।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।।7।।
अर्थ – तुम्हीं तीनो गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो. भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि सहित दारुण रात्रि भी तुम्हीं हो।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को अत्यंत फलदायी और पापनाशी कहा गया है।
कृष्णजन्माष्टमी पूर्वा प्रसिद्धा पापनाशिनी ।
क्रतुकोटिसमा ह्येषा तीर्थानामयुतैः समा ।
कर्ता गवां सहस्रं तु यो ददाति दिनेदिने ।
तत्फलं समवाप्नोति जयंत्यां समुपोषणे ।
श्री कृष्ण "जयंती और जन्माष्टमी" एक साथ होने का सुंदर संयोग भी है इस बार
कृष्णाष्टम्यां भवेद्यत्र कलैका रोहिणी यदि।
जयन्ती नाम सा प्रोक्ता उपोष्या सा प्रयत्नतः।।
केवल अष्टमी मात्र का विचार करने पर व्रत कृष्णाष्टमी कहलाता है, किन्तु रोहिणी नक्षत्र का विचार करते हुए यदि व्रत किया जाए, तो वह जयंती या जन्माष्टमी कहलाता है। इसलिए कई बार यह व्रत दो दिन मनाया जाता है।
यस्मिन् वर्षे जयन्त्याख्यो योगो जन्माष्टमी तदा।
अन्तर्भूता जयन्त्यां स्याद् ऋक्षयोगप्रशस्तितः।।
निर्णयसिन्धु
जयंती बुधवारे च रोहिण्या सहिता यदा।
भवेच्च मुनिशार्दूल किं कृतैर्व्रतकोटिभिः।।
उस पर भी सुंदर संयोग ये है कि यह बुधवार युक्त है जिसका फल करोड़ों व्रत के समान है
गंधपुष्पैश्च धूपैश्च घृतपूर्णप्रदीपकैः ।
पूजयेद्भक्तिभावैश्च दद्याद्विप्राय दक्षिणाम् ३९।
विधिनानेन यो विप्र जयंतीं प्रकरोति च ।
नरो वै तारयेद्भक्त्या पुरुषानेकविंशतिम् ४०।
न दौर्भाग्यं न वैधव्यं न भवेत्कलहो गृहे ।
संततेर्न विरोधं च न पश्यति धनक्षयम् ४१।
यान्यांश्चिकीर्षते कामान्जयंती समुपोषकः ।
तांस्तान्प्राप्नोति सकलान्विष्णुलोकं स गच्छति।।
गंधपुष्प, धूप घी के दीपक आदि से जो भी व्यक्ति इस व्रत को नियम पूर्वक करता है उसको सभी सुख प्राप्त होते हैं दुर्भाग्य, वैधव्य, ग्रह कलह, संतान और धन संबंधी समस्याओं को वह व्यक्ति कभी नही देखता और अंततः विष्णुलोक में स्थान पाता है।
व्रत फल-
महाजयार्थं कुरु तां जयन्तीं मुक्तयेनघ।
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च मुनिपुङ्गव।।
ददाति वाञ्छितानर्थान् ये चान्येप्यतिदुर्लभाः।
इस व्रत के करने से विजय की प्राप्ति होती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। दुर्लभ से दुर्लभतम मनोकामना की पूर्ति होती है।
समायोगे तु रोहिण्यां निशीथे राजसत्तम।
समजायत गोविन्दो बालरूपी चतुर्भुजः।।
तस्मात्तं पूजयेत्तत्र यथा वित्तानुरूपतः।।
मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र लगने पर ही बाल रूप में भगवान गोविन्द ने चतुर्भुजी स्वरूप में अवतार लिया था। इसलिए ही अपने वैभव-व्यवस्था के अनुसार उनकी पूजा की जानी चाहिए।
रोहिण्यामर्द्धरात्रे तु सदा कृष्णाष्टमी भवेत्।
तस्यामभ्यर्चनं शौरेर्हन्ति पापं त्रिजन्मजम्।।
कृष्णाष्टमी को रोहिणी नक्षत्र के अर्धरात्रि में होने पर ही मनानी चाहिए। इससे तीन जन्मों के पाप का नाश होता है।