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सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

दुर्गा जी के 108 चमत्कारिक नाम

 क्या होता है अर्चन?


108 दुर्गा नाम दुर्गासप्तशती के अनुसार


दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का पाठ अत्यंत चमत्कारी और कामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है। नवरात्र में नवचण्डी पाठ साधारणत: सभी गृहस्थों के यहां किया जाता है। काम्यसाधना में चण्डी पाठ व मानस के पाठ मुख्य रूप से जाने जाते हैं। उपवास करना ऋतु सन्धि के दुष्प्रभाव को दूर करने का भी एक माध्यम है जो शरीर मे तामसिक और राजसिक गुणों को कम कर उसे सात्विक बना साधना आदि के लिए अनुकूल करता है।

अर्चन के लिए हम कोई भी फल मेवे, सुहाग सामग्री या श्रद्धा और क्षमतानुसार कुछ भी ले सकते हैं। अर्चन आप नवरात्र या उसके बाद भी अन्य स्तोत्र मंत्रों व देवताओं के लिए कर सकते हैं, इसमे आप बस दिए हर नाम के साथ एक एक करके 108 बार माता का नाम बोलकर संकल्पित सामग्री माता के चरणों मे चढ़ाते जाते हैं। जो सहस्त्रार्चन करना चाहे वे उतनी संख्या में सामग्री लें। अगर आप नवचण्डी या अन्य अनुष्ठान करवा रहें हैं तो ध्यान रखें किसी योग्य आचार्य का ही चयन करें जिसको संस्कृत व कर्मकाण्ड दोनों का ही ज्ञान हो, उच्चारण महत्वपूर्ण है उचित उच्चारण एक पासवर्ड के समान है अगर पासवर्ड गलत है तो आप इक्षित ऊर्जा को प्राप्त करने में कैसे सफल हो सकते हैं।

इस स्तोत्रपाठ से होने वाले लाभ नीचे फलश्रुति में कहे गए हैं।


फलश्रुति-

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।

 नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ।।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।

 चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ।।

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् ।

 पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ।।

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि ।

 राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ।। गोरोचनालक्तककुङ्कुमेवसिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण। 

विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।


१ सती 

२ साध्वी 

३ भवप्रीता 

४ भवानी 

५ भवमोचनी 

६ आर्या 

७ दुर्गा 

८ जया 

९ आद्या 

१० त्रिनेत्रा 

११ शूलधारिणी 

१२ पिनाकधारिणी 

१३ चित्रा 

१४ चन्द्रघण्टा 

१५ महातपा 

१६ मन : 

१७ बुद्धि 

१८ अहंकारा 

१९ चित्तरूपा 

२० चिता 

२१ चिति 

२२ सर्वमन्त्रमयी 

२३ सत्ता 

२४ सत्यानंद 

२५ अनंता 

२६ भाविनी 

२७ भाव्या 

२८ भव्या 

२९ अभव्या 

३० सदागति 

३१ शाम्भवी 

३२ देवमाता 

३३ चिंता स्वरुपिणी

३४ रत्नप्रिया 

३५ सर्वविद्या 

३६ दक्ष कन्या 

३७ दक्ष यज्ञ विनाशिनी 

३८ अर्पणा 

३९ अनेकवर्णा 

४० पाटला 

४१ पाटलावती 

४२ पट्टांबरपरिधाना

४३ कलमंजरीररंजिनि 

४४ अमेयविक्रमा 

४५ क्रूरा 

४६ सुंदरी 

४७ सुरसुन्दरी 

४८ वनदुर्गा 

४९ मातंगी 

५० मतङ्गमुनिपूजिता 

५१ ब्राही 

५२ माहेश्वरी 

५३एन्द्री 

५४ कौमारी 

५५ वैष्णवी 

५६ चामुंडा 

५७ वाराही 

५८ लक्ष्मी

५९ पुरषाकृति 

६० विमला 

६१ उत्कर्षिणी

६२ ज्ञाना 

६३ क्रिया 

६४ नित्या 

६५ बुद्धिदा 

६६ बहुला 

६७ बहुलप्रेमी

६८ सर्ववाहनवाहना 

६९ निशुंभशुम्भहन्नी 

७० महिषासुरमर्दिनि 

७१ मधुकैटभहन्त्री 

७२ चण्डमुंडविनाशनी 

७३ सर्व असुरविनाशा 

७४ सर्वदानवघातिनी 

७५ सत्या 

७६ सर्वाशस्त्रधारिणी 

७७ अनेकशस्त्रधारिणी 

७८ अनेकास्त्रधारिणी 

७९ कुमारी

८० एक कन्या 

८१ केशोरी 

८२ युवती 

८३ यति 

८४ अप्रौढ़ा 

८५ प्रोढ़ा 

८६ वृद्धमाता 

८७ बलप्रदा 

८८ महोदरी 

८९ मुक्तकेशी 

९० घोररूपा 

९१ महाबला 

९२ अग्निज्वाला 

९३ रौद्रमुखी 

९४ कालरात्रि 

९५ तपश्विनी 

९६ नारायणी 

९७ भद्रकाली 

९८ विष्णुमाया 

९९ जलोदरी 

१०० शिवदूती 

१०१ कराली

१०२ अनन्ता 

१०३ परमेश्वरी 

१०४ कात्यायनी 

१०५ सावित्री 

१०६ प्रत्यक्षा 

१०७ ब्रहावादिनी 

१०८ सर्वशास्त्रमयी।

इनमें आगे तथा नाम के बाद नमः लगाकर अर्चन करें।

 इस स्तोत्र के लिए कहा गया है कि अगर मंगळवारी अमावस्या में चंद्रमा रात्रि में शतभिषा नक्षत्र में हो तो इस स्तोत्र कालिख कर जो भी पाठ करता है वो सभी अत्यंत संपदाओं का पाता है। हालांकि ये मुहूर्त जब 2015 में पड़ा तो उस रात ग्रहण का सूतक काल लग गया था।


भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते ।

विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम् ।।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र

 श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र


इस स्तोत्र का केवल एक पाठ शतरुद्री के तीन पाठों के समान फल देने वाला कहा गया है।


पार्वत्युवाच

शरीरार्धमहं शम्भोर्येन प्राप्स्यामि केशव ।

तदिदानीं समाचक्ष्व स्तोत्रं शीघ्रफलप्रदम् ॥


नारायण उवाच

अस्ति गुह्यतमं गौरि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।

शम्भोरहं प्रवक्ष्यामि पठतां शीघ्रकामदम् ॥


विनियोग – 

'ॐ अस्य श्रीशिवाष्टोत्तरशतदिव्यनामामृत-स्तोत्रमालामन्त्रस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनयोगः ।'


शिवसंकल्प इति हृदयम् । 

पुरुषसूक्तमिति शिरः ।

उत्तरनारायणेति शिखा ॥ 

अप्रतिरथेति कवचम् ।

विभ्राडिति नेत्रम् । 

शतरुद्रियमित्यस्त्रम् । 

आत्मानं रुद्ररूपं ध्यायेत् । 


(इन सूक्तों का पाठ करते हुए न्यास करे।)


ध्यान-

धवलवपुषमिन्दोर्मण्डले संनिविष्टं 

भुजगवलयहारं भस्मदिग्धाङ्गमीशम् ।

चारुचन्द्रार्धमौलिं हरिणपरशुपाणिं

हृदयकमलमध्ये संततं चिन्तयामि ॥

'चन्द्रमण्डल में श्री शिवजी विराजमान हैं, उनका गौर शरीर है, सर्प का ही कंगन तथा सर्प का ही हार पहने हुए हैं तथा शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं, उनके हाथों में मृगी मुद्रा एवं परशु है और अर्धचन्द्र सिर पर विराजमान है। मैं उन भगवान् शंकर का हृदय में निरंतर चिन्तन करता हूँ।'


शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः ।

वामदेवो विरूपाक्षः कपर्दी नीललोहितः ॥

शंकरः शूलपाणिश्च खट्वाङ्गी विष्णुवल्लभः ।

शिपिविष्टोऽम्बिकानाथः श्रीकण्ठो भक्तवत्सलः॥

भवः शर्वस्त्रिलोकेश: शितिकण्ठः शिवाप्रियः ।

उग्रः कपालिः कामारिरन्धका सुरसूदनः ॥

गङ्गाधरो ललाटाक्षः कालकालः कृपानिधिः ।

भीमः परशुहस्तश्च मृगपाणिर्जटाधरः ॥

कैलासवासी कवची कठोरस्त्रिपुरान्तकः ।

वृषाङ्को वृषभारूढो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

सामप्रियः स्वरमयस्त्रयीमूर्तिरनीश्वरः ।

सर्वज्ञः परमात्मा च सोमसूर्याग्निलोचनः ॥

हविर्यज्ञमयः सोमः पञ्चवक्त्रः सदाशिवः ।

विश्वेश्वरो वीरभद्रो गणनाथः प्रजापतिः ॥

हिरण्यरेता दुर्धर्षो गिरीशो गिरिशोऽनघः |

भुजङ्गभूषणो भर्गो गिरिधन्वा गिरिप्रियः ॥

कृत्तिवासा पुरारातिर्भगवान् प्रमथाधिपः ।

मृत्युंजयः सूक्ष्मतनुर्जगद्व्यापी जगद्गुरुः ॥

व्योमकेशो महासेनजनकश्चारुविक्रमः ।

रुद्रो भूतपतिः स्थाणुरहिर्बुध्न्यो दिगम्बरः ॥

अष्टमूर्तिरनेकात्मा सात्त्विकः शुद्धविग्रहः ।

शाश्वतः खण्डपरशुरजपाशविमोचकः ॥

मृडः पशुपतिर्देवो महादेवोऽव्ययः प्रभुः ।

पूषदन्तभिदव्यग्रो दक्षाध्वरहरो हरः ॥

भगनेत्रभिदव्यक्तः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ।

अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारकः परमेश्वरः ॥

एतदष्टोत्तरशतनाम्नामाम्नायेन सम्मितम् ।

विष्णुना कथितं पूर्वं पार्वत्या इष्टसिद्धये ॥

शंकरस्य प्रिया गौरी जपित्वा त्रैकालमन्वहम् ।

नोदिता पद्मनाभेन वर्षमेकं प्रयत्नतः ॥

अवाप सा शरीरार्धं प्रसादाच्छूलधारिणः ।

यस्त्रिसंध्यं पठेच्छम्भोर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥

शतरुद्रित्रिरावृत्त्या यत्फलं प्राप्यते नरैः ।

तत्फलं प्राप्नुयादेतदेकवृत्त्या जपन्नरः ॥

बिल्वपत्रैः प्रशस्तैर्वा पुष्पैश्च तुलसीदलैः ।

तिलाक्षतैर्यजेद् यस्तु जीवन्मुक्तो न संशयः ॥

नाम्नामेषां पशुपतेरेकमेवापवर्गदम् ।

अन्येषां चावशिष्टानां फलं वक्तुं न शक्यते ॥


।।इति श्री शिवरहस्ये गौरीनारायण संवादे शिवाष्टोत्तरशत दिव्यनामामृत स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।


इस प्रकार १०८ नाम, जो वेद के तुल्य हैं, श्री विष्णु ने पहले इष्ट-सिद्धि-हेतु माता पार्वती को बताये थे । शंकरप्रिया भगवती गौरी ने भगवान् पद्मनाभ की प्रेरणा से एक वर्ष तक प्रतिदिन त्रिकाल इस का जप किया। महादेव की कृपा से उन्होंने उनका शरीरार्ध प्राप्त किया। शतरुद्री के तीन बार पाठ करने से जो फल मनुष्य को प्राप्त होता है, वह फल इस स्तोत्र मात्र एक बार के पाठ करने से प्राप्त हो जाता है। 

बेलपत्र, फूल, तुलसीदल से, तिल तथा अक्षत से जो महादेव का यजन करते हैं, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं । भगवान् शंकर के इन शतनामों में से केवल एक नाम ही मोक्ष देनेववाला है तो शतनाम का महत्त्व (फल) वर्णन ही नही किया जा सकता है।