मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

Mahashivratri- why Fasting and Meditation is essential.

 Why Fasting and Meditation is necessary on Mahashivratri ❓❓❓


Fasting on Mahashivratri is not just a tradition....it is a way to cleanse the body. When the body is light and free from impurities, the mind becomes more focused, making meditation deeper. That is why fasting should be simple and mindful, taken as a means to aid meditation rather than just a ritual.


How to Make this Mahashivratri A Moment of Divine Experience❓


When the body is pure, and the mind is calm, meditation on this night can bring a blissful experience. If you sit in silence, you may feel a deep connection with the energy that sustains the entire universe.


Let this Mahashivratri be a night of transformation. Try to meditate, connect with the divine, and allow yourself to experience the depth of this sacred night.



4 Mahanisha / Maharathri  have been said.


Kalratri - Diwali night

Moharatri - Janmashtami night

Maharatri - Mahashivratri night

Daruna  - Holika Dahan night


 For which you can refer to Tantrokta Ratri Sukta (Durga Saptshathi, Gita press).

बुधवार, 18 दिसंबर 2024

How to overcome depression and Sucidial thoughts

 

I have been receiving a lot of messages about depression, sucidal thoughts, and hopelessness. It truly breaks my heart to see so many people struggling with such overwhelming emotions, especially at an age when life should be full of hope and possibilities.

Usually, I don’t respond to messages that focus on such negativity, and I won’t reply to each of you personally this time either. Fir  bhi I feel the need to share something that can genuinely help you overcome these feelings of despair.

This remedy is not just a suggestion •• it’s something I’ve seen work for many individuals who have tried it, along with certain astrological practices. It can bring about a positive change in your life, but only if you are willing to take the first step.

If you truly want to heal, follow this remedy with faith and commitment. I assure you, it can make a difference.

1. Take a notebook or diary and start writing down everything on your mind. Whatever is troubling you....your fears, guilt, pain, or anything you can’t share with anyone, just pour it out. Write every single day. Don’t worry about how it looks or sounds....this is just for you. Write at least two pages daily.

2. When your diary starts filling up, start reading it. Begin with a few pages...don’t rush.

Allow yourself to feel everything as you read....if you cry, let it out. If you feel angry, let yourself feel it. Keep reading and re-reading until the emotions lose their grip on you.

3. Keep this diary safe. Hide it safely in a cupboard, a drawer, or any place where no one else can access it. This is your safe space.

4. When you feel that the words no longer hurt you and seem like just ink on paper, it’s time to let go. Burn the diary. Tear the pages one by one and safely burn them. Let the flames take away all the pain and negativity.

5. Alongside this, start practicing meditation, Trataka (focused gazing), Yoga Nidra (deep relaxation), or any cleansing techniques from Ayurveda(षट्कर्म).

These will help calm your mind and bring balance to your emotions.

Remember, this is a journey, and it’s not always easy. Some days you won’t feel like writing or reading, but fight through it. Push yourself. You are stronger than you think. This is your battle, and you can win it.

When you’ve completed this process--written, read, and burned your diary, message me. That’s when I’ll reply to you personally. Healing is a step-by-step process, but trust me, you can come out of the darkness. Just take the first step.

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

विश्व का सबसे पहला मानचित्र/मैप

 

क्या आप जानते हैं, आज से हजारों साल पहले ही हमारे ग्रन्थों में पृथ्वी का मैप का वर्णन दिया गया था❓❓❓

महाभारत में वर्णित है कि धृतराष्ट्र के सारथी संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की गयी थी ताकि वह उन्हें  युद्ध की घटनाओं का वर्णन कर सके। लेकिन, युद्ध के सवाल शुरू होने से पहले ही, धृतराष्ट्र ने उनसे यह बताने के लिए कहा कि अंतरिक्ष से दुनिया कैसी दिखती है।

यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले।।
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।

अर्थ- जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख दिखता है, प्रकार यह द्वीप (पृथ्वी) चन्द्रमंडल में दिखाई देता है। इसके दो भागों में पिप्पल (पीपल के पत्ते) और दो भागों में महान शश (खरगोश) दिखाई देते हैं।

इस श्लोक के आधार पर संत रामानुजाचार्य ने मानचित्र बनाया, लेकिन कुछ पत्तियां और एक खरगोश देखकर दुनिया ने इसका मजाक उड़ाया। बहुत बाद में, जब चित्र को उल्टा किया गया, तो वास्तविकता सामने आई।

जय संहिता में भीष्म पर्व के छठे अध्याय के 12वें श्लोक से लेकर 13वें अध्याय के 37वें श्लोक में भूगोल का विस्तार से वर्णन किया गया है।

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं:

सुदर्शनं प्रवाक्ष्यामि द्वीपं ते कुरुनन्दन।
द्विरांशे पिप्पलस्तत्र द्विरांशे च शशो महान्



संजय कहते हैं कि पृथ्वी एक पहिये की तरह दिखती है।

इस घेरे के अंदर, इस पहिये के अंदर दो हिस्से हैं जो खरगोशों जैसे दिखते हैं और दो हिस्से ऐसे हैं जो पीपल के पेड़ के पत्तों जैसे दिखते हैं।

सोमवार, 20 मई 2024

सोम प्रदोष

 

प्रदोष व्रत

◆सोम प्रदोष ◆

प्रदोष एक पाक्षिक व्रत है अर्थात प्रत्येक महीने शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की प्रदोषकालीन त्रयोदशी तिथि को व्रत रखते हैं।

त्रयोदश्यां तिथौ सायं प्रदोषः परिकीर्त्तितः ।
तत्र पूज्यो महादेवो नान्यो देवः फलार्थिभिः ॥

प्रदोषपूजामाहात्म्यं को नु वर्णयितुं क्षमः ।
यत्र सर्वेऽपि विबुधास्तिष्ठति गिरिशांतिके ॥

प्रदोषसमये देवः कैलासे रजतालये ।
करोति नृत्यं विबुधैरभिष्टुतगुणोदयः ॥

अतः पूजा जपो होमस्तत्कथास्तद्गुणस्तवः ।
कर्त्तव्यो नियतं मत्र्यैश्चतुर्वर्गफला र्थिभिः ॥

दारिद्यतिमिरांधानां मर्त्यानां भवभीरुणाम् ।
भवसागरमग्नानां प्लवोऽयं पारदर्शनः ॥

दुःखशोकभयार्त्तानां क्लेशनिर्वाणमिच्छताम् ।
प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजनं मंगलायनम् ॥     
                                          स्कन्दपुराण

त्रयोदशी तिथि में सायंकाल को प्रदोष कहा गया है। प्रदोष के समय महादेवजी कैलाश पर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों को प्रदोष में नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा, होम, कथा और गुणगान करने चाहिए। दरिद्रता के तिमिर से अंधे और भक्तसागर में डूबे हुए संसार भय से भीरु मनुष्यों के लिए यह प्रदोषव्रत पार लगाने वाली नौका है। शिव-पार्वती की पूजा करने से मनुष्य दरिद्रता, मृत्यु-दुःख और पर्वत के समान भारी ऋण-भार को शीघ्र ही दूर करके सम्पत्तियों से पूजित होता है। प्रदोष व्रत भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय है। इसमें सभी दोषो का शमन करने की क्षमता है अतः इसको प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत का आरम्भ सोमप्रदोष से उत्तम होता है।

◆सोम प्रदोष का महत्व-

स्कन्दपुराण के अनुसार-

शिवपूजा सदा लोके हेतुः स्वर्गापवर्गयोः ।
सोमवारे विशेषेण प्रदोषादिगुणान्विते ॥

केवलेनापि ये कुर्युः सोमवारे शिवार्चनम् ।
न तेषां विद्यते किंचिदिहामुत्र च दुर्लभम् ॥

उपोषितः शुचिर्भूत्वा सोमवारे जितेंद्रियः ।
वैदिकैर्लोकिकैर्वापि विधिवत्पूजयेच्छिवम् ।।

• ब्रह्मचारी गृहस्थो वा कन्या वापि सभर्तृका ।
विभर्तृका वा संपूज्य लभते वरमीप्सितम् ॥

संसार में भगवान शिव की पूजा सदा ही स्वर्ग और मोक्ष का साधन है। यदि सोमप्रदोष के दिन यह पूजा की जाए तो उसका विशेष महात्म्य है। जो सोमवार को भगवान शंकर की पूजा करते हैं, उनके लिए इहलोक और परलोक में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं। सोमवार को उपवास करके इंद्रियों को वश में रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मंत्रों से विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान शिव की पूजा करके मनोवांछित वर पाता है।

सोमे मत्पूजा नक्तभोजनं

अर्थात सोमवार को शिव पूजा और नक्तम् (रात्रि केवल एक समय) भोजन करना चाहिए।

निशि यत्नेन कर्तव्यंभोजनं सोमवासरे।
उभयोः पक्षयोर्विष्णो सर्वस्मिञ्छिव तत्परैः ॥

शिवपुराण, कोटिरुद्रसंहिता यानी दोनों पक्षों में प्रत्येक सोमवार को प्रयत्न पूर्वक केवल नक्तम् भोजन (रात में ही भोजन) करना चाहिए। शिव के व्रत में तत्पर रहने वाले लोगों के लिए यह अनिवार्य नियम है।

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

बृहन्नीलतन्त्रान्तर्गतम् काली सहस्रनाम

  

श्रीदेव्युवाच 


पूर्वं हि सूचितं देव कालीनामसहस्रकम् ।

तद्वदस्व महादेव यदि स्नेहोऽस्ति मां प्रति ॥ १॥


श्रीभैरव उवाच ।


तन्त्रेऽस्मिन् परमेशानि कालीनामसहस्रकम् ।

श‍ृणुष्वैकमना देवि भक्तानां प्रीतिवर्द्धनम् ॥ २॥


ॐ अस्याः श्रीकालीदेव्याः मन्त्रसहस्रनामस्तोत्रस्य

महाकालभैरव ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीकाली देवता ।

क्रीं बीजम् । हूं शक्तिः । ह्रीं कीलकम् । धर्मार्थकाममोक्षार्थे विनियोगः ॥ 


कालिका कामदा कुल्ला भद्रकाली गणेश्वरी ।

भैरवी भैरवप्रीता भवानी भवमोचिनी ॥ ३॥


कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी ।

महाकालरता सूक्ष्मा कौलव्रतपरायणा ॥ ४॥


कोमलाङ्गी करालाङ्गी कमनीया वराङ्गना ।

गन्धचन्दनदिग्धाङ्गी सती साध्वी पतिव्रता ॥ ५॥


काकिनी वर्णरूपा च महाकालकुटुम्बिनी ।

कामहन्त्री कामकला कामविज्ञा महोदया ॥ ६॥


कान्तरूपा महालक्ष्मीर्महाकालस्वरूपिणी ।

कुलीना कुलसर्वस्वा कुलवर्त्मप्रदर्शिका ॥ ७॥


कुलरूपा चकोराक्षी श्रीदुर्गा दुर्गनाशिनी ।

कन्या कुमारी गौरी तु कृष्णदेहा महामनाः ॥ ८॥


कृष्णाङ्गी नीलदेहा च पिङ्गकेशी कृशोदरी ।

पिङ्गाक्षी कमलप्रीता काली कालपराक्रमा ॥ ९॥


कलानाथप्रिया देवी कुलकान्ताऽपराजिता ।

उग्रतारा महोग्रा च तथा चैकजटा शिवा ॥ १०॥


नीला घना बलाका च कालदात्री कलात्मिका ।

नारायणप्रिया सूक्ष्मा वरदा भक्तवत्सला ॥ ११॥


वरारोहा महाबाणा किशोरी युवती सती ।

दीर्घाङ्गी दीर्घकेशा च नृमुण्डधारिणी तथा ॥ १२॥


मालिनी नरमुण्डाली शवमुण्डास्थिधारिणी ।

रक्तनेत्रा विशालाक्षी सिन्दूरभूषणा मही ॥ १३॥


घोररात्रिर्महारात्रिर्घोरान्तकविनाशिनी ।

नारसिंही महारौद्री नीलरूपा वृषासना ॥ १४॥


विलोचना विरूपाक्षी रक्तोत्पलविलोचना ।

पूर्णेन्दुवदना भीमा प्रसन्नवदना तथा ॥ १५॥


पद्मनेत्रा विशालाक्षी शरज्ज्योत्स्नासमाकुला ।

प्रफुल्लपुण्डरीकाभलोचना भयनाशिनी ॥ १६॥


अट्टहासा महोच्छ्वासा महाविघ्नविनाशिनी ।

कोटराक्षी कृशग्रीवा कुलतीर्थप्रसाधिनी ॥ १७॥


कुलगर्तप्रसन्नास्या महती कुलभूषिका ।

बहुवाक्यामृतरसा चण्डरूपातिवेगिनी ॥ १८॥


वेगदर्पा विशालैन्द्री प्रचण्डचण्डिका तथा ।

चण्डिका कालवदना सुतीक्ष्णनासिका तथा ॥ १९॥


दीर्घकेशी सुकेशी च कपिलाङ्गी महारुणा ।

प्रेतभूषणसम्प्रीता प्रेतदोर्दण्डघण्टिका ॥ २०॥


शङ्खिनी शङ्खमुद्रा च शङ्खध्वनिनिनादिनी ।

श्मशानवासिनी पूर्णा पूर्णेन्दुवदना शिवा ॥ २१॥


शिवप्रीता शिवरता शिवासनसमाश्रया ।

पुण्यालया महापुण्या पुण्यदा पुण्यवल्लभा ॥ २२॥


नरमुण्डधरा भीमा भीमासुरविनाशिनी ।

दक्षिणा दक्षिणाप्रीता नागयज्ञोपवीतिनी ॥ २३॥


दिगम्बरी महाकाली शान्ता पीनोन्नतस्तनी ।

घोरासना घोररूपा सृक्प्रान्ते रक्तधारिका ॥ २४॥


महाध्वनिः शिवासक्ता महाशब्दा महोदरी ।

कामातुरा कामसक्ता प्रमत्ता शक्तभावना ॥ २५॥


समुद्रनिलया देवी महामत्तजनप्रिया ।

कर्षिता कर्षणप्रीता सर्वाकर्षणकारिणी ॥ २६॥


वाद्यप्रीता महागीतरक्ता प्रेतनिवासिनी ।

नरमुण्डसृजा गीता मालिनी माल्यभूषिता ॥ २७॥


चतुर्भुजा महारौद्री दशहस्ता प्रियातुरा ।

जगन्माता जगद्धात्री जगती मुक्तिदा परा ॥ २८॥


जगद्धात्री जगत्त्रात्री जगदानन्दकारिणी ।

जगज्जीवमयी हैमवती माया महाकचा ॥ २९॥


नागाङ्गी संहृताङ्गी च नागशय्यासमागता ।

कालरात्रिर्दारुणा च चन्द्रसूर्यप्रतापिनी ॥ ३०॥


नागेन्द्रनन्दिनी देवकन्या च श्रीमनोरमा ।

विद्याधरी वेदविद्या यक्षिणी शिवमोहिनी ॥ ३१॥


राक्षसी डाकिनी देवमयी सर्वजगज्जया ।

श्रुतिरूपा तथाग्नेयी महामुक्तिर्जनेश्वरी ॥ ३२॥


पतिव्रता पतिरता पतिभक्तिपरायणा ।

सिद्धिदा सिद्धिसंदात्री तथा सिद्धजनप्रिया ॥ ३३॥


कर्त्रिहस्ता शिवारूढा शिवरूपा शवासना ।

तमिस्रा तामसी विज्ञा महामेघस्वरूपिणी ॥ ३४॥


चारुचित्रा चारुवर्णा चारुकेशसमाकुला ।

चार्वङ्गी चञ्चला लोला चीनाचारपरायणा ॥ ३५॥


चीनाचारपरा लज्जावती जीवप्रदाऽनघा ।

सरस्वती तथा लक्ष्मीर्महानीलसरस्वती ॥ ३६॥


गरिष्ठा धर्मनिरता धर्माधर्मविनाशिनी ।

विशिष्टा महती मान्या तथा सौम्यजनप्रिया ॥ ३७॥


भयदात्री भयरता भयानकजनप्रिया ।

वाक्यरूपा छिन्नमस्ता छिन्नासुरप्रिया सदा ॥ ३८॥


ऋग्वेदरूपा सावित्री रागयुक्ता रजस्वला ।

रजःप्रीता रजोरक्ता रजःसंसर्गवर्द्धिनी ॥ ३९॥


रजःप्लुता रजःस्फीता रजःकुन्तलशोभिता ।

कुण्डली कुण्डलप्रीता तथा कुण्डलशोभिता ॥ ४०॥


रेवती रेवतप्रीता रेवा चैरावती शुभा ।

शक्तिनी चक्रिणी पद्मा महापद्मनिवासिनी ॥ ४१॥


पद्मालया महापद्मा पद्मिनी पद्मवल्लभा ।

पद्मप्रिया पद्मरता महापद्मसुशोभिता ॥ ४२॥


शूलहस्ता शूलरता शूलिनी शूलसङ्गिका ।

पिनाकधारिणी वीणा तथा वीणावती मघा ॥ ४३॥


रोहिणी बहुलप्रीता तथा वाहनवर्द्धिता ।

रणप्रीता रणरता रणासुरविनाशिनी ॥ ४४॥


रणाग्रवर्तिनी राणा रणाग्रा रणपण्डिता ।

जटायुक्ता जटापिङ्गा वज्रिणी शूलिनी तथा ॥ ४५॥


रतिप्रिया रतिरता रतिभक्ता रतातुरा ।

रतिभीता रतिगता महिषासुरनाशिनी ॥ ४६॥


रक्तपा रक्तसम्प्रीता रक्ताख्या रक्तशोभिता ।

रक्तरूपा रक्तगता रक्तखर्परधारिणी ॥ ४७॥


गलच्छोणितमुण्डाली कण्ठमालाविभूषिता ।

वृषासना वृषरता वृषासनकृताश्रया ॥ ४८॥


व्याघ्रचर्मावृता रौद्री व्याघ्रचर्मावली तथा ।

कामाङ्गी परमा प्रीता परासुरनिवासिनी ॥ ४९॥


तरुणा तरुणप्राणा तथा तरुणमर्दिनी ।

तरुणप्रेमदा वृद्धा तथा वृद्धप्रिया सती ॥ ५०॥


स्वप्नावती स्वप्नरता नारसिंही महालया ।

अमोघा रुन्धती रम्या तीक्ष्णा भोगवती सदा ॥ ५१॥


मन्दाकिनी मन्दरता महानन्दा वरप्रदा ।

मानदा मानिनी मान्या माननीया मदातुरा ॥ ५२॥


मदिरा मदिरोन्मादा मदिराक्षी मदालया ।

सुदीर्घा मध्यमा नन्दा विनतासुरनिर्गता ॥ ५३॥


जयप्रदा जयरता दुर्जयासुरनाशिनी ।

दुष्टदैत्यनिहन्त्री च दुष्टासुरविनाशिनी ॥ ५४॥


सुखदा मोक्षदा मोक्षा महामोक्षप्रदायिनी ।

कीर्तिर्यशस्विनी भूषा भूष्या भूतपतिप्रिया ॥ ५५॥


गुणातीता गुणप्रीता गुणरक्ता गुणात्मिका ।

सगुणा निर्गुणा सीता निष्ठा काष्ठा प्रतिष्ठिता ॥ ५६॥


धनिष्ठा धनदा धन्या वसुदा सुप्रकाशिनी ।

गुर्वी गुरुतरा धौम्या धौम्यासुरविनाशिनी ॥ ५७॥


निष्कामा धनदा कामा सकामा कामजीवना ।

चिन्तामणिः कल्पलता तथा शङ्करवाहिनी ॥ ५८॥


शङ्करी शङ्कररता तथा शङ्करमोहिनी ।

भवानी भवदा भव्या भवप्रीता भवालया ॥ ५९॥


महादेवप्रिया रम्या रमणी कामसुन्दरी ।

कदलीस्तम्भसंरामा निर्मलासनवासिनी ॥ ६०॥


माथुरी मथुरा माया तथा सुरभिवर्द्धिनी ।

व्यक्ताव्यक्तानेकरूपा सर्वतीर्थास्पदा शिवा ॥ ६१॥


तीर्थरूपा महारूपा तथागस्त्यवधूरपि ।

शिवानी शैवलप्रीता तथा शैवलवासिनी ॥ ६२॥


कुन्तला कुन्तलप्रीता तथा कुन्तलशोभिता ।

महाकचा महाबुद्धिर्महामाया महागदा ॥ ६३॥


महामेघस्वरूपा च तथा कङ्कणमोहिनी ।

देवपूज्या देवरता युवती सर्वमङ्गला ॥ ६४॥


सर्वप्रियङ्करी भोग्या भोगरूपा भगाकृतिः ।

भगप्रीता भगरता भगप्रेमरता सदा ॥ ६५॥


भगसंमर्दनप्रीता भगोपरिनिवेशिता ।

भगदक्षा भगाक्रान्ता भगसौभाग्यवर्द्धिनी ॥ ६६॥


दक्षकन्या महादक्षा सर्वदक्षा प्रचण्डिका ।

दण्डप्रिया दण्डरता दण्डताडनतत्परा ॥ ६७॥


दण्डभीता दण्डगता दण्डसंमर्दने रता ।

सुवेदिदण्डमध्यस्था भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ॥ ६८॥


आद्या दुर्गा जया सूक्ष्मा सूक्ष्मरूपा जयाकृतिः ।

क्षेमङ्करी महाघूर्णा घूर्णनासा वशङ्करी ॥ ६९॥


विशालावयवा मेघ्या त्रिवलीवलया शुभा ।

मदोन्मत्ता मदरता मत्तासुरविनाशिनी ॥ ७०॥


मधुकैटभसंहन्त्री निशुम्भासुरमर्दिनी ।

चण्डरूपा महाचण्डी चण्डिका चण्डनायिका ॥ ७१॥


चण्डोग्रा चण्डवर्णा प्रचण्डा चण्डावती शिवा ।

नीलाकारा नीलवर्णा नीलेन्दीवरलोचना ॥ ७२॥


खड्गहस्ता च मृद्वङ्गी तथा खर्परधारिणी ।

भीमा च भीमवदना महाभीमा भयानका ॥ ७३॥


कल्याणी मङ्गला शुद्धा तथा परमकौतुका ।

परमेष्ठी पररता परात्परतरा परा ॥ ७४॥


परानन्दस्वरूपा च नित्यानन्दस्वरूपिणी ।

नित्या नित्यप्रिया तन्द्री भवानी भवसुन्दरी ॥ ७५॥


त्रैलोक्यमोहिनी सिद्धा तथा सिद्धजनप्रिया ।

भैरवी भैरवप्रीता तथा भैरवमोहिनी ॥ ७६॥


मातङ्गी कमला लक्ष्मीः षोडशी विषयातुरा ।

विषमग्ना विषरता विषरक्षा जयद्रथा ॥ ७७॥


काकपक्षधरा नित्या सर्वविस्मयकारिणी ।

गदिनी कामिनी खड्गमुण्डमालाविभूषिता ॥ ७८॥


योगीश्वरी योगमाता योगानन्दस्वरूपिणी ।

आनन्दभैरवी नन्दा तथा नन्दजनप्रिया ॥ ७९॥


नलिनी ललना शुभ्रा शुभ्राननविभूषिता ।

ललज्जिह्वा नीलपदा तथा सुमखदक्षिणा ॥ ८०॥


बलिभक्ता बलिरता बलिभोग्या महारता ।

फलभोग्या फलरसा फलदा श्रीफलप्रिया ॥ ८१॥


फलिनी फलसंवज्रा फलाफलनिवारिणी ।

फलप्रीता फलगता फलसंदानसन्धिनी ॥ ८२॥


फलोन्मुखी सर्वसत्त्वा महासत्त्वा च सात्त्विकी ।

सर्वरूपा सर्वरता सर्वसत्त्वनिवासिनी ॥ ८३॥


महारूपा महाभागा महामेघस्वरूपिणी ।

भयनासा गणरता गणप्रीता महागतिः ॥ ८४॥


सद्गतिः सत्कृतिः स्वक्षा शवासनगता शुभा ।

त्रैलोक्यमोहिनी गङ्गा स्वर्गङ्गा स्वर्गवासिनी ॥ ८५॥


महानन्दा सदानन्दा नित्यानित्यस्वरूपिका ।

सत्यगन्धा सत्यगणा सत्यरूपा महाकृतिः ॥ ८६॥


श्मशानभैरवी काली तथा भयविमर्दिनी ।

त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुरसुन्दरी ॥ ८७॥


त्रिपुरेशी पञ्चदशी पञ्चमी पुरवासिनी ।

महासप्तदशी षष्ठी सप्तमी चाष्टमी तथा ॥ ८८॥


नवमी दशमी देवप्रिया चैकादशी शिवा ।

द्वादशी परमा दिव्या नीलरूपा त्रयोदशी ॥ ८९॥


चतुर्दशी पौर्णमासी राजराजेश्वरी तथा ।

त्रिपुरा त्रिपुरेशी च तथा त्रिपुरमर्दिनी ॥ ९०॥


सर्वाङ्गसुन्दरी रक्ता रक्तवस्त्रोपवीतिनी ।

चामरी चामरप्रीता चमरासुरमर्दिनी ॥ ९१॥


मनोज्ञा सुन्दरी रम्या हंसी च चारुहासिनी ।

नितम्बिनी नितम्बाढ्या नितम्बगुरुशोभिता ॥ ९२॥


पट्टवस्त्रपरिधाना पट्टवस्त्रधरा शुभा ।

कर्पूरचन्द्रवदना कुङ्कुमद्रवशोभिता ॥ ९३॥


पृथिवी पृथुरूपा सा पार्थिवेन्द्रविनाशिनी ।

रत्नवेदिः सुरेशा च सुरेशी सुरमोहिनी ॥ ९४॥


शिरोमणिर्मणिग्रीवा मणिरत्नविभूषिता ।

उर्वशी शमनी काली महाकालस्वरूपिणी ॥ ९५॥


सर्वरूपा महासत्त्वा रूपान्तरविलासिनी ।

शिवा शैवा च रुद्राणी तथा शिवनिनादिनी ॥ ९६॥


मातङ्गिनी भ्रामरी च तथैवाङ्गनमेखला ।

योगिनी डाकिनी चैव तथा महेश्वरी परा ॥ ९७॥


अलम्बुषा भवानी च महाविद्यौघसंभृता ।

गृध्ररूपा ब्रह्मयोनिर्महानन्दा महोदया ॥ ९८॥


विरूपाक्षा महानादा चण्डरूपा कृताकृतिः ।

वरारोहा महावल्ली महात्रिपुरसुन्दरी ॥ ९९॥


भगात्मिका भगाधाररूपिणी भगमालिनी ।

लिङ्गाभिधायिनी देवी महामाया महास्मृतिः ॥ १००॥


महामेधा महाशान्ता शान्तरूपा वरानना ।

लिङ्गमाला लिङ्गभूषा भगमालाविभूषणा ॥ १०१॥


भगलिङ्गामृतप्रीता भगलिङ्गामृतात्मिका ।

भगलिङ्गार्चनप्रीता भगलिङ्गस्वरूपिणी ॥ १०२॥


स्वयम्भूकुसुमप्रीता स्वयम्भूकुसुमासना ।

स्वयम्भूकुसुमरता लतालिङ्गनतत्परा ॥ १०३॥


सुराशना सुराप्रीता सुरासवविमर्दिता ।

सुरापानमहातीक्ष्णा सर्वागमविनिन्दिता ॥ १०४॥


कुण्डगोलसदाप्रीता गोलपुष्पसदारतिः ।

कुण्डगोलोद्भवप्रीता कुण्डगोलोद्भवात्मिका ॥ १०५॥


स्वयम्भवा शिवा धात्री पावनी लोकपावनी ।

महालक्ष्मीर्महेशानी महाविष्णुप्रभाविनी ॥ १०६॥


विष्णुप्रिया विष्णुरता विष्णुभक्तिपरायणा ।

विष्णोर्वक्षःस्थलस्था च विष्णुरूपा च वैष्णवी ॥ १०७॥


अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा ।

धृतिर्मेधा तथा तुष्टिः पुष्टिरूपा चिता चितिः ॥ १०८॥


चितिरूपा चित्स्वरूपा ज्ञानरूपा सनातनी ।

सर्वविज्ञजया गौरी गौरवर्णा शची शिवा ॥ १०९॥


भवरूपा भवपरा भवानी भवमोचिनी ।

पुनर्वसुस्तथा पुष्या तेजस्वी सिन्धुवासिनी ॥ ११०॥


शुक्राशना शुक्रभोगा शुक्रोत्सारणतत्परा ।

शुक्रपूज्या शुक्रवन्द्या शुक्रभोग्या पुलोमजा ॥ १११॥


शुक्रार्च्या शुक्रसंतुष्टा सर्वशुक्रविमुक्तिदा ।

शुक्रमूर्तिः शुक्रदेहा शुक्राङ्गी शुक्रमोहिनी ॥ ११२॥


देवपूज्या देवरता युवती सर्वमङ्गला ।

सर्वप्रियङ्करी भोग्या भोगरूपा भगाकृतिः ॥ ११३॥


भगप्रेता भगरता भगप्रेमपरा तथा ।

भगसंमर्दनप्रीता भगोपरि निवेशिता ॥ ११४॥


भगदक्षा भगाक्रान्ता भगसौभाग्यवर्द्धिनी ।

दक्षकन्या महादक्षा सर्वदक्षा प्रदन्तिका ॥ ११५॥


दण्डप्रिया दण्डरता दण्डताडनतत्परा ।

दण्डभीता दण्डगता दण्डसंमर्दने रता ॥ ११६॥


वेदिमण्डलमध्यस्था भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ।

आद्या दुर्गा जया सूक्ष्मा सूक्ष्मरूपा जयाकृतिः ॥ ११७॥


क्षेमङ्करी महाघूर्णा घूर्णनासा वशङ्करी ।

विशालावयवा मेध्या त्रिवलीवलया शुभा ॥ ११८॥


मद्योन्मत्ता मद्यरता मत्तासुरविलासिनी ।

मधुकैटभसंहन्त्री निशुम्भासुरमर्दिनी ॥ ११९॥


चण्डरूपा महाचण्डा चण्डिका चण्डनायिका ।

चण्डोग्रा च चतुर्वर्गा तथा चण्डावती शिवा ॥ १२०॥


नीलदेहा नीलवर्णा नीलेन्दीवरलोचना ।

नित्यानित्यप्रिया भद्रा भवानी भवसुन्दरी ॥ १२१॥


भैरवी भैरवप्रीता तथा भैरवमोहिनी ।

मातङ्गी कमला लक्ष्मीः षोडशी भीषणातुरा ॥ १२२॥


विषमग्ना विषरता विषभक्ष्या जया तथा ।

काकपक्षधरा नित्या सर्वविस्मयकारिणी ॥ १२३॥


गदिनी कामिनी खड्गा मुण्डमालाविभूषिता ।

योगेश्वरी योगरता योगानन्दस्वरूपिणी ॥ १२४॥


आनन्दभैरवी नन्दा तथानन्दजनप्रिया ।

नलिनी ललना शुभ्रा शुभाननविराजिता ॥ १२५॥


ललज्जिह्वा नीलपदा तथा संमुखदक्षिणा ।

बलिभक्ता बलिरता बलिभोग्या महारता ॥ १२६॥


फलभोग्या फलरसा फलदात्री फलप्रिया ।

फलिनी फलसंरक्ता फलाफलनिवारिणी ॥ १२७॥


फलप्रीता फलगता फलसन्धानसन्धिनी ।

फलोन्मुखी सर्वसत्त्वा महासत्त्वा च सात्त्विका ॥ १२८॥


सर्वरूपा सर्वरता सर्वसत्त्वनिवासिनी ।

महारूपा महाभागा महामेघस्वरूपिणी ॥ १२९॥


भयनाशा गणरता गणगीता महागतिः ।

सद्गतिः सत्कृतिः साक्षात् सदासनगता शुभा ॥ १३०॥


त्रैलोक्यमोहिनी गङ्गा स्वर्गङ्गा स्वर्गवासिनी ।

महानन्दा सदानन्दा नित्या सत्यस्वरूपिणी ॥ १३१॥


शुक्रस्नाता शुक्रकरी शुक्रसेव्यातिशुक्रिणी ।

महाशुक्रा शुक्ररता शुक्रसृष्टिविधायिनी ॥ १३२॥


सारदा साधकप्राणा साधकप्रेमवर्द्धिनी ।

साधकाभीष्टदा नित्यं साधकप्रेमसेविता ॥ १३३॥


साधकप्रेमसर्वस्वा साधकाभक्तरक्तपा ।

मल्लिका मालती जातिः सप्तवर्णा महाकचा ॥ १३४॥


सर्वमयी सर्वशुभ्रा गाणपत्यप्रदा तथा ।

गगना गगनप्रीता तथा गगनवासिनी ॥ १३५॥


गणनाथप्रिया भव्या भवार्चा सर्वमङ्गला ।

गुह्यकाली भद्रकाली शिवरूपा सतांगतिः ॥ १३६॥


सद्भक्ता सत्परा सेतुः सर्वाङ्गसुन्दरी मघा ।

क्षीणोदरी महावेगा वेगानन्दस्वरूपिणी ॥ १३७॥


रुधिरा रुधिरप्रीता रुधिरानन्दशोभना ।

पञ्चमी पञ्चमप्रीता तथा पञ्चमभूषणा ॥ १३८॥


पञ्चमीजपसम्पन्ना पञ्चमीयजने रता ।

ककारवर्णरूपा च ककाराक्षररूपिणी ॥ १३९॥


मकारपञ्चमप्रीता मकारपञ्चगोचरा ।

ऋवर्णरूपप्रभवा ऋवर्णा सर्वरूपिणी ॥ १४०॥


सर्वाणी सर्वनिलया सर्वसारसमुद्भवा ।

सर्वेश्वरी सर्वसारा सर्वेच्छा सर्वमोहिनी ॥ १४१॥


गणेशजननी दुर्गा महामाया महेश्वरी ।

महेशजननी मोहा विद्या विद्योतनी विभा ॥ १४२॥


स्थिरा च स्थिरचित्ता च सुस्थिरा धर्मरञ्जिनी ।

धर्मरूपा धर्मरता धर्माचरणतत्परा ॥ १४३॥


धर्मानुष्ठानसन्दर्भा सर्वसन्दर्भसुन्दरी ।

स्वधा स्वाहा वषट्कारा श्रौषट् वौषट् स्वधात्मिका ॥ १४४॥


ब्राह्मणी ब्रह्मसंबन्धा ब्रह्मस्थाननिवासिनी ।

पद्मयोनिः पद्मसंस्था चतुर्वर्गफलप्रदा ॥ १४५॥


चतुर्भुजा शिवयुता शिवलिङ्गप्रवेशिनी ।

महाभीमा चारुकेशी गन्धमादनसंस्थिता ॥ १४६॥


गन्धर्वपूजिता गन्धा सुगन्धा सुरपूजिता ।

गन्धर्वनिरता देवी सुरभी सुगन्धा तथा ॥ १४७॥


पद्मगन्धा महागन्धा गन्धामोदितदिङ्मुखा ।

कालदिग्धा कालरता महिषासुरमर्दिनी ॥ १४८॥


विद्या विद्यावती चैव विद्येशा विज्ञसंभवा ।

विद्याप्रदा महावाणी महाभैरवरूपिणी ॥ १४९॥


भैरवप्रेमनिरता महाकालरता शुभा ।

माहेश्वरी गजारूढा गजेन्द्रगमना तथा ॥ १५०॥


यज्ञेन्द्रललना चण्डी गजासनपराश्रया ।

गजेन्द्रमन्दगमना महाविद्या महोज्ज्वला ॥ १५१॥


बगला वाहिनी वृद्धा बाला च बालरूपिणी ।

बालक्रीडारता बाला बलासुरविनाशिनी ॥ १५२॥


बाल्यस्था यौवनस्था च महायौवनसंरता ।

विशिष्टयौवना काली कृष्णदुर्गा सरस्वती ॥ १५३॥


कात्यायनी च चामुण्डा चण्डासुरविघातिनी ।

चण्डमुण्डधरा देवी मधुकैटभनाशिनी ॥ १५४॥


ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री वाराही वैष्णवी तथा ।

रुद्रकाली विशालाक्षी भैरवी कालरूपिणी ॥ १५५॥


महामाया महोत्साहा महाचण्डविनाशिनी ।

कुलश्रीः कुलसंकीर्णा कुलगर्भनिवासिनी ॥ १५६॥


कुलाङ्गारा कुलयुता कुलकुन्तलसंयुता ।

कुलदर्भग्रहा चैव कुलगर्तप्रदायिनी ॥ १५७॥


कुलप्रेमयुता साध्वी शिवप्रीतिः शिवाबलिः ।

शिवसक्ता शिवप्राणा महादेवकृतालया ॥ १५८॥


महादेवप्रिया कान्ता महादेवमदातुरा ।

मत्तामत्तजनप्रेमधात्री विभववर्द्धिनी ॥ १५९॥


मदोन्मत्ता महाशुद्धा मत्तप्रेमविभूषिता ।

मत्तप्रमत्तवदना मत्तचुम्बनतत्परा ॥ १६०॥


मत्तक्रीडातुरा भैमी तथा हैमवती मतिः ।

मदातुरा मदगता विपरीतरतातुरा ॥ १६१॥


वित्तप्रदा वित्तरता वित्तवर्धनतत्परा ।

इति ते कथितं सर्वं कालीनामसहस्रकम् ॥ १६२॥


सारात्सारतरं दिव्यं महाविभववर्द्धनम् ।

गाणपत्यप्रदं राज्यप्रदं षट्कर्मसाधकम् ॥ १६३॥


यः पठेत् साधको नित्यं स भवेत् सम्पदां पदम् ।

यः पठेत् पाठयेद्वापि श‍ृणोति श्रावयेदथ ॥ १६४॥


न किञ्चिद् दुर्लभं लोके स्तवस्यास्य प्रसादतः ।

ब्रह्महत्या सुरापानं सुवर्णहरणं तथा ॥ १६५॥


गुरुदाराभिगमनं यच्चान्यद् दुष्कृतं कृतम् ।

सर्वमेतत्पुनात्येव सत्यं सुरगणार्चिते ॥ १६६॥


रजस्वलाभगं दृष्ट्वा पठेत् स्तोत्रमनन्यधीः ।

स शिवः सत्यवादी च भवत्येव न संशयः ॥ १६७॥


परदारयुतो भूत्वा पठेत् स्तोत्रं समाहितः ।

सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा महाराजत्वमाप्नुयात् ॥ १६८॥


परनिन्दां परद्रोहं परहिंसां न कारयेत् ।

शिवभक्ताय शान्ताय प्रियभक्ताय वा पुनः ॥ १६९॥


स्तवं च दर्शयेदेनमन्यथा मृत्युमाप्नुयात् ।

अस्मात् परतरं नास्ति तन्त्रमध्ये सुरेश्वरि ॥ १७०॥


महाकाली महादेवी तथा नीलसरस्वती ।

न भेदः परमेशानि भेदकृन्नरकं व्रजेत् ॥ १७१॥


इदं स्तोत्रं मया दिव्यं तव स्नेहात् प्रकथ्यते ।

उभयोरेवमेकत्वं भेदबुद्ध्या न तां भजेत् ।

स योगी परमेशानि समो मानापमानयोः ॥ १७२॥


॥ इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे भैरवपार्वतीसंवादे

कालीसहस्रनामनिरूपणं द्वाविंशः पटलः ॥ २२॥

पूर्वं हि सूचितं देव कालीनामसहस्रकम् ।

तद्वदस्व महादेव यदि स्नेहोऽस्ति मां प्रति ॥ १॥


श्रीभैरव उवाच ।


तन्त्रेऽस्मिन् परमेशानि कालीनामसहस्रकम् ।

श‍ृणुष्वैकमना देवि भक्तानां प्रीतिवर्द्धनम् ॥ २॥


ॐ अस्याः श्रीकालीदेव्याः मन्त्रसहस्रनामस्तोत्रस्य

महाकालभैरव ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीकाली देवता ।

क्रीं बीजम् । हूं शक्तिः । ह्रीं कीलकम् । धर्मार्थकाममोक्षार्थे विनियोगः ॥ 


कालिका कामदा कुल्ला भद्रकाली गणेश्वरी ।

भैरवी भैरवप्रीता भवानी भवमोचिनी ॥ ३॥


कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी ।

महाकालरता सूक्ष्मा कौलव्रतपरायणा ॥ ४॥


कोमलाङ्गी करालाङ्गी कमनीया वराङ्गना ।

गन्धचन्दनदिग्धाङ्गी सती साध्वी पतिव्रता ॥ ५॥


काकिनी वर्णरूपा च महाकालकुटुम्बिनी ।

कामहन्त्री कामकला कामविज्ञा महोदया ॥ ६॥


कान्तरूपा महालक्ष्मीर्महाकालस्वरूपिणी ।

कुलीना कुलसर्वस्वा कुलवर्त्मप्रदर्शिका ॥ ७॥


कुलरूपा चकोराक्षी श्रीदुर्गा दुर्गनाशिनी ।

कन्या कुमारी गौरी तु कृष्णदेहा महामनाः ॥ ८॥


कृष्णाङ्गी नीलदेहा च पिङ्गकेशी कृशोदरी ।

पिङ्गाक्षी कमलप्रीता काली कालपराक्रमा ॥ ९॥


कलानाथप्रिया देवी कुलकान्ताऽपराजिता ।

उग्रतारा महोग्रा च तथा चैकजटा शिवा ॥ १०॥


नीला घना बलाका च कालदात्री कलात्मिका ।

नारायणप्रिया सूक्ष्मा वरदा भक्तवत्सला ॥ ११॥


वरारोहा महाबाणा किशोरी युवती सती ।

दीर्घाङ्गी दीर्घकेशा च नृमुण्डधारिणी तथा ॥ १२॥


मालिनी नरमुण्डाली शवमुण्डास्थिधारिणी ।

रक्तनेत्रा विशालाक्षी सिन्दूरभूषणा मही ॥ १३॥


घोररात्रिर्महारात्रिर्घोरान्तकविनाशिनी ।

नारसिंही महारौद्री नीलरूपा वृषासना ॥ १४॥


विलोचना विरूपाक्षी रक्तोत्पलविलोचना ।

पूर्णेन्दुवदना भीमा प्रसन्नवदना तथा ॥ १५॥


पद्मनेत्रा विशालाक्षी शरज्ज्योत्स्नासमाकुला ।

प्रफुल्लपुण्डरीकाभलोचना भयनाशिनी ॥ १६॥


अट्टहासा महोच्छ्वासा महाविघ्नविनाशिनी ।

कोटराक्षी कृशग्रीवा कुलतीर्थप्रसाधिनी ॥ १७॥


कुलगर्तप्रसन्नास्या महती कुलभूषिका ।

बहुवाक्यामृतरसा चण्डरूपातिवेगिनी ॥ १८॥


वेगदर्पा विशालैन्द्री प्रचण्डचण्डिका तथा ।

चण्डिका कालवदना सुतीक्ष्णनासिका तथा ॥ १९॥


दीर्घकेशी सुकेशी च कपिलाङ्गी महारुणा ।

प्रेतभूषणसम्प्रीता प्रेतदोर्दण्डघण्टिका ॥ २०॥


शङ्खिनी शङ्खमुद्रा च शङ्खध्वनिनिनादिनी ।

श्मशानवासिनी पूर्णा पूर्णेन्दुवदना शिवा ॥ २१॥


शिवप्रीता शिवरता शिवासनसमाश्रया ।

पुण्यालया महापुण्या पुण्यदा पुण्यवल्लभा ॥ २२॥


नरमुण्डधरा भीमा भीमासुरविनाशिनी ।

दक्षिणा दक्षिणाप्रीता नागयज्ञोपवीतिनी ॥ २३॥


दिगम्बरी महाकाली शान्ता पीनोन्नतस्तनी ।

घोरासना घोररूपा सृक्प्रान्ते रक्तधारिका ॥ २४॥


महाध्वनिः शिवासक्ता महाशब्दा महोदरी ।

कामातुरा कामसक्ता प्रमत्ता शक्तभावना ॥ २५॥


समुद्रनिलया देवी महामत्तजनप्रिया ।

कर्षिता कर्षणप्रीता सर्वाकर्षणकारिणी ॥ २६॥


वाद्यप्रीता महागीतरक्ता प्रेतनिवासिनी ।

नरमुण्डसृजा गीता मालिनी माल्यभूषिता ॥ २७॥


चतुर्भुजा महारौद्री दशहस्ता प्रियातुरा ।

जगन्माता जगद्धात्री जगती मुक्तिदा परा ॥ २८॥


जगद्धात्री जगत्त्रात्री जगदानन्दकारिणी ।

जगज्जीवमयी हैमवती माया महाकचा ॥ २९॥


नागाङ्गी संहृताङ्गी च नागशय्यासमागता ।

कालरात्रिर्दारुणा च चन्द्रसूर्यप्रतापिनी ॥ ३०॥


नागेन्द्रनन्दिनी देवकन्या च श्रीमनोरमा ।

विद्याधरी वेदविद्या यक्षिणी शिवमोहिनी ॥ ३१॥


राक्षसी डाकिनी देवमयी सर्वजगज्जया ।

श्रुतिरूपा तथाग्नेयी महामुक्तिर्जनेश्वरी ॥ ३२॥


पतिव्रता पतिरता पतिभक्तिपरायणा ।

सिद्धिदा सिद्धिसंदात्री तथा सिद्धजनप्रिया ॥ ३३॥


कर्त्रिहस्ता शिवारूढा शिवरूपा शवासना ।

तमिस्रा तामसी विज्ञा महामेघस्वरूपिणी ॥ ३४॥


चारुचित्रा चारुवर्णा चारुकेशसमाकुला ।

चार्वङ्गी चञ्चला लोला चीनाचारपरायणा ॥ ३५॥


चीनाचारपरा लज्जावती जीवप्रदाऽनघा ।

सरस्वती तथा लक्ष्मीर्महानीलसरस्वती ॥ ३६॥


गरिष्ठा धर्मनिरता धर्माधर्मविनाशिनी ।

विशिष्टा महती मान्या तथा सौम्यजनप्रिया ॥ ३७॥


भयदात्री भयरता भयानकजनप्रिया ।

वाक्यरूपा छिन्नमस्ता छिन्नासुरप्रिया सदा ॥ ३८॥


ऋग्वेदरूपा सावित्री रागयुक्ता रजस्वला ।

रजःप्रीता रजोरक्ता रजःसंसर्गवर्द्धिनी ॥ ३९॥


रजःप्लुता रजःस्फीता रजःकुन्तलशोभिता ।

कुण्डली कुण्डलप्रीता तथा कुण्डलशोभिता ॥ ४०॥


रेवती रेवतप्रीता रेवा चैरावती शुभा ।

शक्तिनी चक्रिणी पद्मा महापद्मनिवासिनी ॥ ४१॥


पद्मालया महापद्मा पद्मिनी पद्मवल्लभा ।

पद्मप्रिया पद्मरता महापद्मसुशोभिता ॥ ४२॥


शूलहस्ता शूलरता शूलिनी शूलसङ्गिका ।

पिनाकधारिणी वीणा तथा वीणावती मघा ॥ ४३॥


रोहिणी बहुलप्रीता तथा वाहनवर्द्धिता ।

रणप्रीता रणरता रणासुरविनाशिनी ॥ ४४॥


रणाग्रवर्तिनी राणा रणाग्रा रणपण्डिता ।

जटायुक्ता जटापिङ्गा वज्रिणी शूलिनी तथा ॥ ४५॥


रतिप्रिया रतिरता रतिभक्ता रतातुरा ।

रतिभीता रतिगता महिषासुरनाशिनी ॥ ४६॥


रक्तपा रक्तसम्प्रीता रक्ताख्या रक्तशोभिता ।

रक्तरूपा रक्तगता रक्तखर्परधारिणी ॥ ४७॥


गलच्छोणितमुण्डाली कण्ठमालाविभूषिता ।

वृषासना वृषरता वृषासनकृताश्रया ॥ ४८॥


व्याघ्रचर्मावृता रौद्री व्याघ्रचर्मावली तथा ।

कामाङ्गी परमा प्रीता परासुरनिवासिनी ॥ ४९॥


तरुणा तरुणप्राणा तथा तरुणमर्दिनी ।

तरुणप्रेमदा वृद्धा तथा वृद्धप्रिया सती ॥ ५०॥


स्वप्नावती स्वप्नरता नारसिंही महालया ।

अमोघा रुन्धती रम्या तीक्ष्णा भोगवती सदा ॥ ५१॥


मन्दाकिनी मन्दरता महानन्दा वरप्रदा ।

मानदा मानिनी मान्या माननीया मदातुरा ॥ ५२॥


मदिरा मदिरोन्मादा मदिराक्षी मदालया ।

सुदीर्घा मध्यमा नन्दा विनतासुरनिर्गता ॥ ५३॥


जयप्रदा जयरता दुर्जयासुरनाशिनी ।

दुष्टदैत्यनिहन्त्री च दुष्टासुरविनाशिनी ॥ ५४॥


सुखदा मोक्षदा मोक्षा महामोक्षप्रदायिनी ।

कीर्तिर्यशस्विनी भूषा भूष्या भूतपतिप्रिया ॥ ५५॥


गुणातीता गुणप्रीता गुणरक्ता गुणात्मिका ।

सगुणा निर्गुणा सीता निष्ठा काष्ठा प्रतिष्ठिता ॥ ५६॥


धनिष्ठा धनदा धन्या वसुदा सुप्रकाशिनी ।

गुर्वी गुरुतरा धौम्या धौम्यासुरविनाशिनी ॥ ५७॥


निष्कामा धनदा कामा सकामा कामजीवना ।

चिन्तामणिः कल्पलता तथा शङ्करवाहिनी ॥ ५८॥


शङ्करी शङ्कररता तथा शङ्करमोहिनी ।

भवानी भवदा भव्या भवप्रीता भवालया ॥ ५९॥


महादेवप्रिया रम्या रमणी कामसुन्दरी ।

कदलीस्तम्भसंरामा निर्मलासनवासिनी ॥ ६०॥


माथुरी मथुरा माया तथा सुरभिवर्द्धिनी ।

व्यक्ताव्यक्तानेकरूपा सर्वतीर्थास्पदा शिवा ॥ ६१॥


तीर्थरूपा महारूपा तथागस्त्यवधूरपि ।

शिवानी शैवलप्रीता तथा शैवलवासिनी ॥ ६२॥


कुन्तला कुन्तलप्रीता तथा कुन्तलशोभिता ।

महाकचा महाबुद्धिर्महामाया महागदा ॥ ६३॥


महामेघस्वरूपा च तथा कङ्कणमोहिनी ।

देवपूज्या देवरता युवती सर्वमङ्गला ॥ ६४॥


सर्वप्रियङ्करी भोग्या भोगरूपा भगाकृतिः ।

भगप्रीता भगरता भगप्रेमरता सदा ॥ ६५॥


भगसंमर्दनप्रीता भगोपरिनिवेशिता ।

भगदक्षा भगाक्रान्ता भगसौभाग्यवर्द्धिनी ॥ ६६॥


दक्षकन्या महादक्षा सर्वदक्षा प्रचण्डिका ।

दण्डप्रिया दण्डरता दण्डताडनतत्परा ॥ ६७॥


दण्डभीता दण्डगता दण्डसंमर्दने रता ।

सुवेदिदण्डमध्यस्था भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ॥ ६८॥


आद्या दुर्गा जया सूक्ष्मा सूक्ष्मरूपा जयाकृतिः ।

क्षेमङ्करी महाघूर्णा घूर्णनासा वशङ्करी ॥ ६९॥


विशालावयवा मेघ्या त्रिवलीवलया शुभा ।

मदोन्मत्ता मदरता मत्तासुरविनाशिनी ॥ ७०॥


मधुकैटभसंहन्त्री निशुम्भासुरमर्दिनी ।

चण्डरूपा महाचण्डी चण्डिका चण्डनायिका ॥ ७१॥


चण्डोग्रा चण्डवर्णा प्रचण्डा चण्डावती शिवा ।

नीलाकारा नीलवर्णा नीलेन्दीवरलोचना ॥ ७२॥


खड्गहस्ता च मृद्वङ्गी तथा खर्परधारिणी ।

भीमा च भीमवदना महाभीमा भयानका ॥ ७३॥


कल्याणी मङ्गला शुद्धा तथा परमकौतुका ।

परमेष्ठी पररता परात्परतरा परा ॥ ७४॥


परानन्दस्वरूपा च नित्यानन्दस्वरूपिणी ।

नित्या नित्यप्रिया तन्द्री भवानी भवसुन्दरी ॥ ७५॥


त्रैलोक्यमोहिनी सिद्धा तथा सिद्धजनप्रिया ।

भैरवी भैरवप्रीता तथा भैरवमोहिनी ॥ ७६॥


मातङ्गी कमला लक्ष्मीः षोडशी विषयातुरा ।

विषमग्ना विषरता विषरक्षा जयद्रथा ॥ ७७॥


काकपक्षधरा नित्या सर्वविस्मयकारिणी ।

गदिनी कामिनी खड्गमुण्डमालाविभूषिता ॥ ७८॥


योगीश्वरी योगमाता योगानन्दस्वरूपिणी ।

आनन्दभैरवी नन्दा तथा नन्दजनप्रिया ॥ ७९॥


नलिनी ललना शुभ्रा शुभ्राननविभूषिता ।

ललज्जिह्वा नीलपदा तथा सुमखदक्षिणा ॥ ८०॥


बलिभक्ता बलिरता बलिभोग्या महारता ।

फलभोग्या फलरसा फलदा श्रीफलप्रिया ॥ ८१॥


फलिनी फलसंवज्रा फलाफलनिवारिणी ।

फलप्रीता फलगता फलसंदानसन्धिनी ॥ ८२॥


फलोन्मुखी सर्वसत्त्वा महासत्त्वा च सात्त्विकी ।

सर्वरूपा सर्वरता सर्वसत्त्वनिवासिनी ॥ ८३॥


महारूपा महाभागा महामेघस्वरूपिणी ।

भयनासा गणरता गणप्रीता महागतिः ॥ ८४॥


सद्गतिः सत्कृतिः स्वक्षा शवासनगता शुभा ।

त्रैलोक्यमोहिनी गङ्गा स्वर्गङ्गा स्वर्गवासिनी ॥ ८५॥


महानन्दा सदानन्दा नित्यानित्यस्वरूपिका ।

सत्यगन्धा सत्यगणा सत्यरूपा महाकृतिः ॥ ८६॥


श्मशानभैरवी काली तथा भयविमर्दिनी ।

त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुरसुन्दरी ॥ ८७॥


त्रिपुरेशी पञ्चदशी पञ्चमी पुरवासिनी ।

महासप्तदशी षष्ठी सप्तमी चाष्टमी तथा ॥ ८८॥


नवमी दशमी देवप्रिया चैकादशी शिवा ।

द्वादशी परमा दिव्या नीलरूपा त्रयोदशी ॥ ८९॥


चतुर्दशी पौर्णमासी राजराजेश्वरी तथा ।

त्रिपुरा त्रिपुरेशी च तथा त्रिपुरमर्दिनी ॥ ९०॥


सर्वाङ्गसुन्दरी रक्ता रक्तवस्त्रोपवीतिनी ।

चामरी चामरप्रीता चमरासुरमर्दिनी ॥ ९१॥


मनोज्ञा सुन्दरी रम्या हंसी च चारुहासिनी ।

नितम्बिनी नितम्बाढ्या नितम्बगुरुशोभिता ॥ ९२॥


पट्टवस्त्रपरिधाना पट्टवस्त्रधरा शुभा ।

कर्पूरचन्द्रवदना कुङ्कुमद्रवशोभिता ॥ ९३॥


पृथिवी पृथुरूपा सा पार्थिवेन्द्रविनाशिनी ।

रत्नवेदिः सुरेशा च सुरेशी सुरमोहिनी ॥ ९४॥


शिरोमणिर्मणिग्रीवा मणिरत्नविभूषिता ।

उर्वशी शमनी काली महाकालस्वरूपिणी ॥ ९५॥


सर्वरूपा महासत्त्वा रूपान्तरविलासिनी ।

शिवा शैवा च रुद्राणी तथा शिवनिनादिनी ॥ ९६॥


मातङ्गिनी भ्रामरी च तथैवाङ्गनमेखला ।

योगिनी डाकिनी चैव तथा महेश्वरी परा ॥ ९७॥


अलम्बुषा भवानी च महाविद्यौघसंभृता ।

गृध्ररूपा ब्रह्मयोनिर्महानन्दा महोदया ॥ ९८॥


विरूपाक्षा महानादा चण्डरूपा कृताकृतिः ।

वरारोहा महावल्ली महात्रिपुरसुन्दरी ॥ ९९॥


भगात्मिका भगाधाररूपिणी भगमालिनी ।

लिङ्गाभिधायिनी देवी महामाया महास्मृतिः ॥ १००॥


महामेधा महाशान्ता शान्तरूपा वरानना ।

लिङ्गमाला लिङ्गभूषा भगमालाविभूषणा ॥ १०१॥


भगलिङ्गामृतप्रीता भगलिङ्गामृतात्मिका ।

भगलिङ्गार्चनप्रीता भगलिङ्गस्वरूपिणी ॥ १०२॥


स्वयम्भूकुसुमप्रीता स्वयम्भूकुसुमासना ।

स्वयम्भूकुसुमरता लतालिङ्गनतत्परा ॥ १०३॥


सुराशना सुराप्रीता सुरासवविमर्दिता ।

सुरापानमहातीक्ष्णा सर्वागमविनिन्दिता ॥ १०४॥


कुण्डगोलसदाप्रीता गोलपुष्पसदारतिः ।

कुण्डगोलोद्भवप्रीता कुण्डगोलोद्भवात्मिका ॥ १०५॥


स्वयम्भवा शिवा धात्री पावनी लोकपावनी ।

महालक्ष्मीर्महेशानी महाविष्णुप्रभाविनी ॥ १०६॥


विष्णुप्रिया विष्णुरता विष्णुभक्तिपरायणा ।

विष्णोर्वक्षःस्थलस्था च विष्णुरूपा च वैष्णवी ॥ १०७॥


अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा ।

धृतिर्मेधा तथा तुष्टिः पुष्टिरूपा चिता चितिः ॥ १०८॥


चितिरूपा चित्स्वरूपा ज्ञानरूपा सनातनी ।

सर्वविज्ञजया गौरी गौरवर्णा शची शिवा ॥ १०९॥


भवरूपा भवपरा भवानी भवमोचिनी ।

पुनर्वसुस्तथा पुष्या तेजस्वी सिन्धुवासिनी ॥ ११०॥


शुक्राशना शुक्रभोगा शुक्रोत्सारणतत्परा ।

शुक्रपूज्या शुक्रवन्द्या शुक्रभोग्या पुलोमजा ॥ १११॥


शुक्रार्च्या शुक्रसंतुष्टा सर्वशुक्रविमुक्तिदा ।

शुक्रमूर्तिः शुक्रदेहा शुक्राङ्गी शुक्रमोहिनी ॥ ११२॥


देवपूज्या देवरता युवती सर्वमङ्गला ।

सर्वप्रियङ्करी भोग्या भोगरूपा भगाकृतिः ॥ ११३॥


भगप्रेता भगरता भगप्रेमपरा तथा ।

भगसंमर्दनप्रीता भगोपरि निवेशिता ॥ ११४॥


भगदक्षा भगाक्रान्ता भगसौभाग्यवर्द्धिनी ।

दक्षकन्या महादक्षा सर्वदक्षा प्रदन्तिका ॥ ११५॥


दण्डप्रिया दण्डरता दण्डताडनतत्परा ।

दण्डभीता दण्डगता दण्डसंमर्दने रता ॥ ११६॥


वेदिमण्डलमध्यस्था भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ।

आद्या दुर्गा जया सूक्ष्मा सूक्ष्मरूपा जयाकृतिः ॥ ११७॥


क्षेमङ्करी महाघूर्णा घूर्णनासा वशङ्करी ।

विशालावयवा मेध्या त्रिवलीवलया शुभा ॥ ११८॥


मद्योन्मत्ता मद्यरता मत्तासुरविलासिनी ।

मधुकैटभसंहन्त्री निशुम्भासुरमर्दिनी ॥ ११९॥


चण्डरूपा महाचण्डा चण्डिका चण्डनायिका ।

चण्डोग्रा च चतुर्वर्गा तथा चण्डावती शिवा ॥ १२०॥


नीलदेहा नीलवर्णा नीलेन्दीवरलोचना ।

नित्यानित्यप्रिया भद्रा भवानी भवसुन्दरी ॥ १२१॥


भैरवी भैरवप्रीता तथा भैरवमोहिनी ।

मातङ्गी कमला लक्ष्मीः षोडशी भीषणातुरा ॥ १२२॥


विषमग्ना विषरता विषभक्ष्या जया तथा ।

काकपक्षधरा नित्या सर्वविस्मयकारिणी ॥ १२३॥


गदिनी कामिनी खड्गा मुण्डमालाविभूषिता ।

योगेश्वरी योगरता योगानन्दस्वरूपिणी ॥ १२४॥


आनन्दभैरवी नन्दा तथानन्दजनप्रिया ।

नलिनी ललना शुभ्रा शुभाननविराजिता ॥ १२५॥


ललज्जिह्वा नीलपदा तथा संमुखदक्षिणा ।

बलिभक्ता बलिरता बलिभोग्या महारता ॥ १२६॥


फलभोग्या फलरसा फलदात्री फलप्रिया ।

फलिनी फलसंरक्ता फलाफलनिवारिणी ॥ १२७॥


फलप्रीता फलगता फलसन्धानसन्धिनी ।

फलोन्मुखी सर्वसत्त्वा महासत्त्वा च सात्त्विका ॥ १२८॥


सर्वरूपा सर्वरता सर्वसत्त्वनिवासिनी ।

महारूपा महाभागा महामेघस्वरूपिणी ॥ १२९॥


भयनाशा गणरता गणगीता महागतिः ।

सद्गतिः सत्कृतिः साक्षात् सदासनगता शुभा ॥ १३०॥


त्रैलोक्यमोहिनी गङ्गा स्वर्गङ्गा स्वर्गवासिनी ।

महानन्दा सदानन्दा नित्या सत्यस्वरूपिणी ॥ १३१॥


शुक्रस्नाता शुक्रकरी शुक्रसेव्यातिशुक्रिणी ।

महाशुक्रा शुक्ररता शुक्रसृष्टिविधायिनी ॥ १३२॥


सारदा साधकप्राणा साधकप्रेमवर्द्धिनी ।

साधकाभीष्टदा नित्यं साधकप्रेमसेविता ॥ १३३॥


साधकप्रेमसर्वस्वा साधकाभक्तरक्तपा ।

मल्लिका मालती जातिः सप्तवर्णा महाकचा ॥ १३४॥


सर्वमयी सर्वशुभ्रा गाणपत्यप्रदा तथा ।

गगना गगनप्रीता तथा गगनवासिनी ॥ १३५॥


गणनाथप्रिया भव्या भवार्चा सर्वमङ्गला ।

गुह्यकाली भद्रकाली शिवरूपा सतांगतिः ॥ १३६॥


सद्भक्ता सत्परा सेतुः सर्वाङ्गसुन्दरी मघा ।

क्षीणोदरी महावेगा वेगानन्दस्वरूपिणी ॥ १३७॥


रुधिरा रुधिरप्रीता रुधिरानन्दशोभना ।

पञ्चमी पञ्चमप्रीता तथा पञ्चमभूषणा ॥ १३८॥


पञ्चमीजपसम्पन्ना पञ्चमीयजने रता ।

ककारवर्णरूपा च ककाराक्षररूपिणी ॥ १३९॥


मकारपञ्चमप्रीता मकारपञ्चगोचरा ।

ऋवर्णरूपप्रभवा ऋवर्णा सर्वरूपिणी ॥ १४०॥


सर्वाणी सर्वनिलया सर्वसारसमुद्भवा ।

सर्वेश्वरी सर्वसारा सर्वेच्छा सर्वमोहिनी ॥ १४१॥


गणेशजननी दुर्गा महामाया महेश्वरी ।

महेशजननी मोहा विद्या विद्योतनी विभा ॥ १४२॥


स्थिरा च स्थिरचित्ता च सुस्थिरा धर्मरञ्जिनी ।

धर्मरूपा धर्मरता धर्माचरणतत्परा ॥ १४३॥


धर्मानुष्ठानसन्दर्भा सर्वसन्दर्भसुन्दरी ।

स्वधा स्वाहा वषट्कारा श्रौषट् वौषट् स्वधात्मिका ॥ १४४॥


ब्राह्मणी ब्रह्मसंबन्धा ब्रह्मस्थाननिवासिनी ।

पद्मयोनिः पद्मसंस्था चतुर्वर्गफलप्रदा ॥ १४५॥


चतुर्भुजा शिवयुता शिवलिङ्गप्रवेशिनी ।

महाभीमा चारुकेशी गन्धमादनसंस्थिता ॥ १४६॥


गन्धर्वपूजिता गन्धा सुगन्धा सुरपूजिता ।

गन्धर्वनिरता देवी सुरभी सुगन्धा तथा ॥ १४७॥


पद्मगन्धा महागन्धा गन्धामोदितदिङ्मुखा ।

कालदिग्धा कालरता महिषासुरमर्दिनी ॥ १४८॥


विद्या विद्यावती चैव विद्येशा विज्ञसंभवा ।

विद्याप्रदा महावाणी महाभैरवरूपिणी ॥ १४९॥


भैरवप्रेमनिरता महाकालरता शुभा ।

माहेश्वरी गजारूढा गजेन्द्रगमना तथा ॥ १५०॥


यज्ञेन्द्रललना चण्डी गजासनपराश्रया ।

गजेन्द्रमन्दगमना महाविद्या महोज्ज्वला ॥ १५१॥


बगला वाहिनी वृद्धा बाला च बालरूपिणी ।

बालक्रीडारता बाला बलासुरविनाशिनी ॥ १५२॥


बाल्यस्था यौवनस्था च महायौवनसंरता ।

विशिष्टयौवना काली कृष्णदुर्गा सरस्वती ॥ १५३॥


कात्यायनी च चामुण्डा चण्डासुरविघातिनी ।

चण्डमुण्डधरा देवी मधुकैटभनाशिनी ॥ १५४॥


ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री वाराही वैष्णवी तथा ।

रुद्रकाली विशालाक्षी भैरवी कालरूपिणी ॥ १५५॥


महामाया महोत्साहा महाचण्डविनाशिनी ।

कुलश्रीः कुलसंकीर्णा कुलगर्भनिवासिनी ॥ १५६॥


कुलाङ्गारा कुलयुता कुलकुन्तलसंयुता ।

कुलदर्भग्रहा चैव कुलगर्तप्रदायिनी ॥ १५७॥


कुलप्रेमयुता साध्वी शिवप्रीतिः शिवाबलिः ।

शिवसक्ता शिवप्राणा महादेवकृतालया ॥ १५८॥


महादेवप्रिया कान्ता महादेवमदातुरा ।

मत्तामत्तजनप्रेमधात्री विभववर्द्धिनी ॥ १५९॥


मदोन्मत्ता महाशुद्धा मत्तप्रेमविभूषिता ।

मत्तप्रमत्तवदना मत्तचुम्बनतत्परा ॥ १६०॥


मत्तक्रीडातुरा भैमी तथा हैमवती मतिः ।

मदातुरा मदगता विपरीतरतातुरा ॥ १६१॥


वित्तप्रदा वित्तरता वित्तवर्धनतत्परा ।

इति ते कथितं सर्वं कालीनामसहस्रकम् ॥ १६२॥


सारात्सारतरं दिव्यं महाविभववर्द्धनम् ।

गाणपत्यप्रदं राज्यप्रदं षट्कर्मसाधकम् ॥ १६३॥


यः पठेत् साधको नित्यं स भवेत् सम्पदां पदम् ।

यः पठेत् पाठयेद्वापि श‍ृणोति श्रावयेदथ ॥ १६४॥


न किञ्चिद् दुर्लभं लोके स्तवस्यास्य प्रसादतः ।

ब्रह्महत्या सुरापानं सुवर्णहरणं तथा ॥ १६५॥


गुरुदाराभिगमनं यच्चान्यद् दुष्कृतं कृतम् ।

सर्वमेतत्पुनात्येव सत्यं सुरगणार्चिते ॥ १६६॥


रजस्वलाभगं दृष्ट्वा पठेत् स्तोत्रमनन्यधीः ।

स शिवः सत्यवादी च भवत्येव न संशयः ॥ १६७॥


परदारयुतो भूत्वा पठेत् स्तोत्रं समाहितः ।

सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा महाराजत्वमाप्नुयात् ॥ १६८॥


परनिन्दां परद्रोहं परहिंसां न कारयेत् ।

शिवभक्ताय शान्ताय प्रियभक्ताय वा पुनः ॥ १६९॥


स्तवं च दर्शयेदेनमन्यथा मृत्युमाप्नुयात् ।

अस्मात् परतरं नास्ति तन्त्रमध्ये सुरेश्वरि ॥ १७०॥


महाकाली महादेवी तथा नीलसरस्वती ।

न भेदः परमेशानि भेदकृन्नरकं व्रजेत् ॥ १७१॥


इदं स्तोत्रं मया दिव्यं तव स्नेहात् प्रकथ्यते ।

उभयोरेवमेकत्वं भेदबुद्ध्या न तां भजेत् ।

स योगी परमेशानि समो मानापमानयोः ॥ १७२॥


॥ इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे भैरवपार्वतीसंवादे

कालीसहस्रनामनिरूपणं द्वाविंशः पटलः ॥ २२॥

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

मंगलाचरण और जयघोष

 पूजा के बाद प्रतिदिन करें 


ये मंगलाचरण और जयघोष


अपने घर में सत्संग कीर्तन के लिए यह मंगलाचरण बहुत सुंदर भाव प्रकट करता है, साथ ही सरल भी है | हम सब को ये उद्घोष करना चाहिए और बच्चों को याद भी कराना हैं।


दुर्गति नाशिनी दुर्गा जय जय,

काल विनाशिनी काली जय जय,

उमा, रमा, ब्रह्माणी जय जय,

राधा, सीता रुक्मणी जय जय,

सांब सदाशिव, सांब सदाशिव,

सांब सदाशिव, सांब सदाशिव,

हर हर शंकर, दुखहर, सुखकर,

अघ-तमहर हर हर हर शंकर,

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,

जय जय दुर्गा, जय माँ तारा,

जय गणेश जय शुभ आगारा,

जयति सदाशिव जानकी राम,

गौरी शंकर सीता राम,

जय रघुनन्दन जय सिया राम,

व्रज गोपी प्रिय राधे श्याम,

रघुपति राघव राजा राम,

पतित-पावन सीता राम।।


धर्म की जय हो 

अधर्म का नाश हो 

प्राणियों में सद्भावना हो 

विश्व का कल्याण हो 

गौ माता की जय हो 

भारत अखंड हो 


हर हर हर महादेव 🚩

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

वत्स गोत्र का इतिहास और कुलदेवी

 

वत्स/वात्स्यायन गोत्र

देखिये कितनी वैज्ञानिक और सुगठित है गोत्र परंपरा।

"भ्रिगुं, पुलत्स्यं, पुलहं, क्रतुअंगिरिसं तथा
मरीचिं, दक्षमत्रिंच, वशिष्ठं चैव मानसान्”

                                   (विष्णु पुराण 5/7)

भ्रिगु, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वशिष्ठ – इन नौ मानस पुत्रों को ब्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति का कार्य भार सौंपा | कालान्तर में इनकी संख्या बढ़कर 26 तक हो गई और इसके बाद इनकी संख्या 56 हो गई। इन्हीं ऋषियों के नाम से गोत्र का प्रचलन हुआ और इनके वंशज अपने गोत्र ऋषि से संबद्ध हो गए।

हरेक गोत्र में प्रवर, गण और उनके वंशज (ब्राह्मण) हुए। कुछ गोत्रों में सुयोग्य गोत्रानुयायी ऋषियों को भी गोत्र वर्धन का अधिकार दिया गया|

इस क्रम में आज वत्स गोत्र की बात करते हैं।

भगवान ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु कुल में उत्पन्न हुए ऋषि हैं ऋषि वत्स/ वात्स्यायन जिन्हें वच्छ बत्स (वछलश) भी कहा जाता है।

महर्षि भृगु ऋग्वेद काल के भार्गव कुल प्रवर्तक महाऋषि हैं। भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि के सृजन एवं विकास की आकांक्षा से नौ मानस पुत्रों को अपने शरीर से उत्पन्न किया जिनमें से एक महाऋषि भृगु भी थे। महाऋषि भृगु को ब्रह्मा द्वारा किये गये यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न माना जाता है। भगवान वरूण ने महाऋषि भृगु को दत्तक पुत्र बनाया। अतएव इनका नाम भृगुवारणी भी कहा जाता है। महाऋषि भृगु की ही सन्तानें भार्गव भी कहलाई हैं।

च्यवन ऋषि ने भार्गव वंश की सर्वाधिक वृद्धि की।

महाऋषि भृगु के ऋषि च्यवन/च्यवान और ऋषि च्यवन/च्यवान के ऋषि आप्नुवान और ऋषि आप्नुवान के ऋषि और्व और ऋषि और्व के ऋषि ऋचिक और ऋषि ऋचिक के ऋषि जमदग्नि और ऋषि जमदग्नि के ऋषि परशुराम हुए हैं।

इसी वंश परंपरा का अभिन्न भाग है, ऋषि च्यवन/च्यवान और महाराजा शर्याति पुत्री सुकन्या के पुत्र महाऋषि दधीचि की दो भार्या हैं। एक का नाम सरस्वती और दूसरी का नाम अक्षमाला है। महाऋषि दधीचि और सरस्वती से उत्पन्न पुत्र का नाम सारस्वत हुआ। वहीं महाऋषि दधीचि और अक्षमाला से उत्पन्न पुत्र का नाम ऋषि वत्स हुआ। युगोपरांत कलयुग में वत्स वंश सम्भूत ऋषियों ने वात्स्यायन उपाधि भी स्वीकार करी।
वत्स ऋषि के पुत्र माधवानंद के द्वारा वत्स गोत्र का विस्तार किया गया।
वत्स गोत्री किसी और ब्राह्मण की पंक्ति में बैठकर भोजन नही करते थे, अपना भोजन स्वयं बनाते थे/स्वयं पाकी थे।
दान नही लेते थे, याचना नही करते थे।


मूल ऋषि भृगु
पांच प्रवर है-भार्गव, च्यवन, अप्रमाण, औरव, जमदग्नि
गण-भृगु
वेद-सामवेद
उपवेद-गंधर्व
सूत्र-गोविल्
शाखा-कौथुमी
शिखा और पाद-वाम है
प्रथम गोत्र कुल माधवानंद-तारिणी देवी
द्वितीय च्यवन -सिद्धादेवी
कुलदेवता-महादेव
उपास्य-विष्णु


मुख्य रूप से कुलदेवी सिद्धादेवी हैं इसलिए इन्हें ही माना जाता है।


ऐतरेय ब्राह्मण, अष्टाध्यायी में महर्षि पाणिनी द्वारा वत्स गोत्र का महात्म्य बताया गया है जिससे वत्स गोत्र का प्रमाण मिलता है।

ब्राह्मण कार्य छोड़कर जिन्होंने हल चलाने/खेती करने का निर्णय लिया वे भूमिहार कहलाये इस क्रम में ऋषि आश्रम से जुड़े अन्य वर्णों के लोग भी वत्स गोत्र के धारक हुए।

इनका प्रभाव जम्मू, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, आसाम , नेपाल, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में देखा गया।

वत्स गोत्र की उपाधियाँ/सरनेम-
तिवारी
चतुर्वेदी
पाण्डेय्
भागवत
भैरव
गार्गेकर
मलसे
नागेश
सोमानी
गादे
भट्ट
गोरे
हरे
जोशी
काले
सखदेव
दबोलकर
दांगर
होले
काकेतकर
शिनाय
थथेरी
दाहिल
दहल
कुँवर
खराल
कामत
गोवित्रकर
राय/बगोचिया
राणा
चौहान

बहुत से सरनेम मुझे पता नही है अगर उपाधि/सरनेम छूट गया है तो बताएं, मैं ब्लॉग में पूरी डिटेल्स डालने का प्रयास करूँगी।
आपको अगर वत्सगोत्र के विषय मे कोई जानकारी हो तो बताएं ताकि वत्स गोत्र की पूरी और सटीक जानकारी लोगों तक पहुंच सके।

इसके अलावा वैश्य समाज के 18 गोत्र पर भी मैं जल्दी ही ब्लॉग में शामिल करने का प्रयास करूँगी।

रविवार, 26 नवंबर 2023

काशी के शिवलिंग

 

काशी में इतने सारे शिवलिंग क्यों और कैसे हैं?
ग्यारह हजार शब्दमणियों से सुसज्जित इस लेख में काशी विश्वनाथ के 11000 स्वयंभू शिवलिंगों एवं शिव मंदिर में से १००८ खास शिवालय के नाम, स्थान के बारे में बताया जा रहा है।
बनारस विश्वनाथ की नगरी है। काशी शिवभक्त देवी-देवताओं और शिव साधक साधु-संतों की तपस्या स्थली है। यहां जिसने भी शिवसाधना की उन्हीं को भगवान भोलेनाथ ने दर्शन दिये और वे वहीं स्थापित हो गया।
काशी में ज्यादातर शिवलिंग स्वयंभू है। इनका उल्लेख लिंग पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा स्कंदपुराण में मिलता है।


 उनकी सूची निम्नलिखित है-
सिद्धेश्वर-हिरण्यकशिपु मंदिर के पश्चिम में पड़ता था और वह सर्वसिद्धिप्रदायक माना जाता था।
वृषभेश्वर-इस लिंग की स्थिति सिद्धेश्वर के समीप पूर्वाभिमुख तथा गोप्रेक्ष के दक्षिण-पश्चिम में थी।
दधीचेश्वर-गोप्रेक्ष के दक्षिण में सर्वकामफलद यह लिंग था। अत्रीश्वर-अत्रि द्वारा स्थापित यह लिंग दधीचेश्वर के पास दक्षिण में पड़ता था।
-मधुकैटभेश्वर-मधु तथा कैटभ द्वारा संस्थापित, अत्रीश्वर के दक्षिण में मधु का पश्चिमाभिमुख और केटभ का पश्चिमाभिमुख शिवलिंग था।
बालकेश्वर–गोप्रेक्ष के पूर्व में स्थित थ।
विवरेश्वर-बालकेश्वर के समीप। इसके दर्शन से ज्वर का तुरन्त नाश होता था।
देवेश्वर-विज्वरेश्वर के पूर्व में स्थित शिवलिंग।
वेदेश्वर-देवेश्वर के ईशानाभिमुख यह लिंग था तथा इसके अन्य मुख भी दिशाकोणों में थे। इसके दर्शन से ब्राह्मण को चारों वेदों का ज्ञान हो जाता था। ज्ञातव्य है कि सामान्यतः मुख लिंग चारों दिशाओं में होते हैं, कोणों में नहीं (कृ० क० त०, पृ० ४४)।
केशव-वेदेश्वर के उत्तर में स्वयं केशव का मंदिर था।
संगमेश्वर-इसकी स्थिति केशव के मंदिर के पास ही थी तथा इनके दर्शन से शिष्टों से समागम होने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार बरना और गंगा के संगम पर स्थित संगमेश्वर की स्थापना ब्रह्मा ने की थी। संगम पर स्नान करके लिंग का दर्शन करने से पुनर्जन्म नहीं होता।
प्रयागेश्वर-संगमेश्वर के पूर्व में ब्रह्मा द्वारा स्थापित लिंग जिसके दर्शन से ब्रह्मपद मिलता था।
गोप्रेक्ष-आदि महादेव के पूर्व इस देव मंदिर की स्थिति थी। इनके दर्शन से सब कल्मष नाश होते थे।
अनसूयेश्वर-अनसूया द्वारा स्थापित यह लिंग गोप्रेक्ष के उत्तर में था। इनके दर्शन से परागति मिलती थी। गणेश्वर-अनसूयेश्वर के आगे यह मंदिर पड़ता था।
हिरण्यकशिपु-यह लिंग गणेश्वर के पश्चिम में हिरण्यकशिपु द्वारा एक कूप के पास स्थापित किया।
शांकरीदेवी-प्रयागेश्वर के मंदिर में ब्रह्म वृक्ष (पाकड़) या बिल्व वृक्ष के नीचे शांकरीदेवी का आवास था जो सब तीर्थवासियों को शांति प्रदान करती थीं। इन्हीं का एक मन्दिर बेंगलुरु में भी है।
गंगावरणासंगम-श्रवण नक्षत्र युक्ता द्वादशी यदि बुधवार को पड़े तो संगम पर स्नान तथा श्राद्ध बड़ा ही फलदायक तथा श्राद्ध करनेवाले को विष्णुलोक देनेवाला था। मत्स्यपुराण ने वहाँ विधिपूर्वक अन्नदान को - श्रेयस्कर माना है।
- कुंभीश्वर–वरणा के पूर्वी तट पर स्थित शिवलिंग।
कालेश्वर-कुंभीश्वर के पूर्व में स्थित शिवलिंग।
कपिलह्रद शिवलिंग-आधुनिक कपिलधारा। इसकी स्थिति कालेश्वर के उत्तर में थी। इसमें स्नान वृषभध्वज के दर्शन से राजसूय यज्ञ का पुण्य मिलता था, नरक में पड़े पितरगण तर जाते थे तथा वहाँ श्राद्ध करना गया श्राद्ध से भी बढ़कर था
स्कंदेश्वर-महादेव के पश्चिम में स्कंद द्वारा स्थापित लिंग। वहीं पर शाख, विशाख और नैगमीयों स्थापित अनेक लिंग थे।
बलभद्रेश्वर–स्कंदेश्वर के उत्तर में बलभद्र द्वारा नंदीश्वर-स्कंदेश्वर के दक्षिण में नंदी द्वारा स्थापित लिंग।
शिलाक्षेश्वर-नंदीश्वर के पश्चिम में नंदी के पिता द्वारा स्थापित तथा वंदित लिग।
हिरण्याक्षेश्वर-शिलाक्षेश्वर के पास हिरण्याक्ष द्वारा स्थापित शिवलिंग। उसके पास ही देवों द्वारा पित हजारों लिंग थे।
अट्टहास-शिवालय हिरण्याक्षेश्वर के पश्चिम में अट्टहास का पश्चिमाभिमुख लिंग था जिसके दर्शन से ईशान लोक की प्राप्ति होती थी।
मित्रावरुणेश्वर-अट्टहास के पास ही पश्चिम में मित्रावरुण द्वारा स्थापित दो शिवलिंग के वाराणसी के पूर्व द्वार पर स्थित थे। वसिष्ठेश्वर-वहीं मित्रावरुणेश्वर के मंदिर में ही स्थापित लिंग।
याज्ञवल्क्येश्वर-शिवलिंग ….वहीं समीप में मित्रावरुणेश्वर के मंदिर में ही याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापित चतुर्मुख लिग!
मैत्रेयीश्वर शिवलिंग -याज्ञवल्क्येश्वर के पास ही मैत्रेयी द्वारा स्थापित शिवलिंग।
प्रह्लादेश्वर शिवलिंग-याज्ञवल्क्येश्वर के पश्चिम में पश्चिमाभिमुख लिंग।
स्वरलीनेश्वर शिवलिंग- प्रह्लादेश्वर के आगे। ज्ञान-विज्ञान में निष्ठ तथा परमानन्द के इच्छुकों को यह लिंग मुक्तिदायक था।
वैरोचनेश्वर-स्वर्लीनेश्वर के आगे वैरोचन द्वारा स्थापित लिंग।
बाणेश्वर शिवलिंग-वैरोचनेश्वर के उत्तर में शिवभक्त बलि द्वारा स्थापित लिंग, इसे बाणेश्वर भी कहते थे।
शालकटंकटेश्वर-बाणेश्वर के उत्तर में राक्षसी शालकटंकटा द्वारा स्थापित शिवलिंग।
हिरण्यगर्भ शिवलिंग-वहीं शालकटंकटेश्वर के मंदिर में एक शिवलिंग।
मोक्षेश्वर-वहीं शालकटंकटेश्वर के मंदिर में ही एक शिवलिंग।
स्वर्गेश्वर-वहीं शालकटंकटेश्वर के मंदिर में ही एक शिवलिंग।
वासुकीश्वर-मोक्षेश्वर तथा स्वर्गेश्वर के उत्तर में चतुर्मुख लिंग था!
वासुकीतीर्थ-वासुकीश्वर के पूर्व में एक तीर्थ था जिसमें स्नान करने से मनुष्य रोगरहित जाता था।
चन्द्रेश्वर-वासुकी तीर्थ के पास चन्द्र द्वारा स्थापित शिवलिंग।
विद्येश्वर–चन्द्रेश्वर के पूर्व में। इसके दर्शन से विद्याधर लोक मिलता था।
वीरेश्वर-क्षेत्र के उत्तर- -पूर्व में प्रह्लाद घाट के पास है। इसकी स्थापना के सम्बन्ध में एक कथा दी गयी है। कृत्यकल्पतरु में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
सगरेश्वर-वीरेश्वर के वायव्य कोण में भागीरथ के पूर्वज राजा सगर द्वारा स्थापित।
बालीश्वर-सगरेश्वर के आगे उसी जगह बालि द्वारा स्थापित चतुर्मुख लिंग।
सुग्रीवेश्वर-बालीश्वर के उत्तर में सुग्रीव द्वारा स्थापित।
हनुमदीश्वर-सुग्रीवेश्वर के पास हनुमान् द्वारा स्थापित लिंग। अश्विनीकुमारों द्वारा स्थापित शिवलिंग सगरेश्वर के उत्तर में था।
भद्रदोहतीर्थ शिवलिंग-अश्विनी मन्दिर के उत्तर पार्श्व में स्थित इस तीर्थ में पूर्वभाद्रपद पौर्णमासी को करने से हजार गोदान का पुण्य मिलता था।
भद्रेश्वर-भद्रदोह तीर्थ के पश्चिमी किनारे पर स्थित शिवलिंग।
उपशांतशिव शिवलिंग-भद्रेश्वर के नैऋत्य में स्थित शिवलिंग।
चक्रेश्वर-उपशांतशिव के उत्तर में स्थित पश्चिमाभिमुख शिवलिंग। उसके आगे पश्चिमाभिमुख हृद था जिसमें स्नान करने से शिवलोक की प्राप्ति होती थी।
शूलेश्वर–चक्रेश्वर के पश्चिम में । यहाँ शिव के शूल से उत्पन्न ह्रद में स्नान करने और शूलेश्वो दर्शन से रुद्रलोक की प्राप्ति होती थी।
नारदेश्वर शिवलिंग-शूलेश्वर के पूर्व में नारद द्वारा स्थापित शिवलिंग तथा कुंड।
धर्मेश्वर-नारदेश्वर के पूर्व में शिवलिंग तथा कुंड।
विनायक कुण्ड-धर्मेश्वर की वायव्य दिशा में स्थित इस कुंड में स्नान तथा विनायक का दर्शन करके यात्री सब विघ्नों से विमुक्त होकर, अविमुक्त क्षेत्र में बस सकता था। आजकल यह मुर्गाबी गड़ही कहलाती है।
अमरकह्रद शिवलिंग-विनायक से उत्तर की ओर सटा हुआ कुंड।
अमरकेश्वर-अमरक के दक्षिण में स्थित शिवलिंग। इसके दर्शन से भूल से भी किये गये दुष्कर्म का फल नष्ट हो जाता था। आजकल यह अगरिया ताल कहलाता है
वरणेश्वर-अमरकेश्वर के उत्तर में थोड़ी ही दूर वरणा के तट पर पश्चिमाभिमुख शिवलिंग। कहा गया है कि पाशुपत सिद्ध अश्वपाद को यहाँ शाश्वत सिद्धि मिली। इसके दर्शन से गंधर्वत्व मिलने की बात कही गयी है।
शैलेश्वर–वरणेश्वर के पश्चिम में स्थित शिवलिंग।
कोटीश्वर-शैलेश्वर के दक्षिण में स्थित शिवलिंग।
भीष्मचंडिका-कोटीश्वर के पास ही श्मशान में होने के कारण इसे बीभत्स तथा विकृत कहा गया है।
कोटितीर्थ-इसमें स्नान करने से एक करोड़ गोदान का पुण्य मिलता था। ऋषिसंघ द्वारा स्थापित शिवलिंग कोटीश्वर के पूर्व में था।
श्मशानस्तम्भ-कोटितीर्थ के दक्षिण-पूर्व में स्थित इस स्तम्भ में स्वयं शिव का निवास माना जाता था। उसकी पूजा करने से मनुष्यों की इस क्षेत्र में किये गये पापों से विनिर्मुक्ति होती थी। वाराणसी क्षेत्र में किये गये पापों का फल यहीं भोगना पड़ता था।
भैरवी यातना का यही स्थान था और यहाँ के भैरव दण्डपाणि के नाम से जाने जाते थे।
कपालमोचन-स्नान करते समय शिव के हाथ से लगा हुआ ब्रह्मा का एक सिर वहाँ गिर जाने से इसका नामकरण हुआ। यहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे पाप से छुटकारा मिलने की बात कही गयी है। कोयला बाजार में ओंकारेश्वर के टीले से मिला पश्चिम की ओर स्थित सूखा तालाब है।
कपालेश्वर-कपालमोचन पर स्थित भैरव का शिवलिंग। (भैरवेश्वर)
ऋणमोचनक तीर्थ-कपालेश्वर के उत्तर पार्श्व में स्थित एक तीर्थ जिसमें स्नान करने से तथा तीन शिवलिंगों के दर्शन से विविध ऋण का परिशोध हो जाता था।
अंगारेश्वर (मंगलेश्वर)-ऋणमोचनक तीर्थ के दक्षिण में कुंड के सामने पश्चिमाभिमुख शिवलिंग। चतुर्थी या अष्टमी को यदि मंगलवार पड़े तो वहाँ स्नान और दर्शन से रोग-विनिर्मुक्ति होती थी।
विश्वकर्मेश्वर-अंगारेश्वर के पास ही पश्चिमाभिमुख शिवलिंग।
बुधेश्वर-विश्वकर्मेश्वर के पास ही स्थित शिवलिंग। बद्व ग्रह से पीड़ित जातक को यहां रुद्राभिषेक करने से बहुत लाभ होता है।
महामुण्डेश्वर-बुधेश्वर के दक्षिण में महामुण्डेश्वर का शिवलिंग था। उसके सामने ही एक कूप था जिसमें स्नान करते समय शिव की मुण्डमाला उसमें गिर जाने से लिंग का नामकरण हुआ। अब यह स्कंद माता मंदिर के नीचे कोठरी में है। यहाँ महामुण्डी देवी भी हैं। आजकल यह जैतपुरा में वागीश्वरी देवी के मंदिर के नाम से जाना जाता है।
खट्वांगेश्वर-महामुण्डेश्वर के अहाते में ही एक शिवलिंग और कूप। कथा है कि शिव ने कूप में खट्वांग कूप में डाला था।
भुवनेश्वर-महामुण्डेश्वर के पास ही एक कुंड के दक्षिण तट पर उत्तराभिमुख लिंग।
विमलेश-भुवनेश्वर के दक्षिण में एक कुंड था। उसके पूर्व में विमलेश की स्थिति थी। यहीं से त्र्यंबक सशरीर रुद्रलोक पहुँचे।
भृग्वीश्वर शिवलिंग-अंगारक कुण्ड के दक्षिण में भृगु द्वारा स्थापित बड़ा शिवमंदिर।
नंदीशेश्वर (नादेश्वर ) शिवलिंग- भृग्वीश्वर के दक्षिण में नन्दीश्वर का शिवलिंग था जिसके दर्शनमात्र पाशुपत व्रत में सिद्धि मिल जाती थी। यहीं पर तपस्वी कपिल ने गुहावास करके शिव की एक हजार वर्ष तक पूजा की जिसके फलस्वरूप वे सांख्यवेत्ता हुए। वह महर्षि कपिल गुहा कपिलेश्वर के नीचे थी। यह स्थान वर्तमान कोयला बाजार में ओंकारेश्वर टीले के नीचे गुफा में है।
कपिलेश्वर शिवलिंग- माँ शक्ति द्वारा यह प्रश्न करने पर कि कपिलेश्वर का नाम ओंकारेश्वर कैसे पड़ा, शिव ने बताया कि ओंकार के अकार में पंचायतन विष्णु, उकार में ब्रह्मा और मकार में नंदीश्वर रूप में स्वयं शिव हैं।
मत्स्योदरी-मत्स्योदरी के उत्तर कूल पर उसी तरह नंदीश्वर का मन्दिर स्थित था जिस तरह ओंकार के उत्तर में मकार। इस जगह वामदेव, सावर्णि, अघोर और कपिल ने पाशुपत व्रत से सिद्धि पायी।
कभी-कभी गंगा इस देव के दर्शनार्थ मत्स्योदरी में आ मिलती थीं। कपिलेश्वर के पश्चिम में जब गंगा और मत्स्योदरी का संगम होता, तब वहाँ अष्टमी और चतुर्दशी को स्नान का विशेष महत्त्व था।
कपालमोचन तालाब के पास पाशुपतों का अड्डा था तथा यह मंदिर काफी बड़ा था।
उद्दालक महर्षि की कथा…उद्दालकेश्वर तथा दूसरे शिवलिंग कपिलेश्वर के आगे पश्चान्मुख लिंग थे। यहाँ उद्दालक ऋषि ने परम सिद्धि पायी। पास ही
उत्तर में एक दूसरे शिवलिंग से पराशर मुनि को सिद्धि मिली। उसी लिंग से सटे आयतन में पश्चान्मुख वाष्कलि मुनि रहते थे। उसी के पास पूर्वाभिमुख होकर पाशुपत भाव सिद्ध रहते थे और पश्चिम में एकमुख लिंग था जिसके सान्निध्य में आरुणि ने सिद्धि पायी।
आरुणीश के पश्चिम में एक शिवलिंग था जहाँ पाशुपताचार्य योगसिद्ध का निवास था। उसी के दक्षिण में एक शिवलिंग के सान्निध्य में कौस्तुभ नामक ऋषि को सिद्धि प्राप्त हुई तथा उसके दक्षिण में एक लिंग के पास सावर्णि नामक एक पाशुपत रहते थे। उसके आगे एक महद् लिंग था जिसमें ओंकार रूप में स्वयं शिव का निवास था। उसी के नीचे श्रीमुखी नामक एक गुहा (गुफा) थी जिसमें शिवार्चन में रत पाशुपत रहते थे। उसी महालिंग के द्वार पर इसी शरीर से अघोर मुनि रुद्रत्व को प्राप्त हुए और इसीलिए उसका नाम अघोरेश्वर पड़ा। वहाँ यात्री को त्रिरात्रि बिताने का आदेश था।
पंच-पंचायन की परंपरा…श्रीकंठ शिवलिंग-जान पड़ता है मत्स्योदरी के किनारे बहुत से स्वयभ शिवमंदिर थे, जिनमें शांत, दांत, जितक्रोध और ब्रह्मचारी पाशुपत पूजा करते थे।
कपिलेश्वर के दक्षिण में श्रीकंठ के मंदिर में पाशुपत ऋतुध्वज रहते थे। उसके आगे एक पूर्वमुख लिंग के सान्निध्य में महर्षि जाबाल को सिद्धि मिली। उसके दक्षिण में ओंकारेश्वर की। मूर्ति थी। उसके दक्षिण में दूसरे लिंग के पास कालिकवृक्षिय सिद्ध हुए। उस लिंग के भी दक्षिण में एक) पश्चान्मुख शिवलिंग के पास महरषि गार्ग्य सिद्ध हुए। इन पाँचों को पंचायतन कहते थे और इनके दर्शन का विशेष महत्त्व माना गया है। इस पंचायतन के समीप एक कूप था।
रुद्रवास-यह मंदिर श्रीकंठ के दक्षिण में स्थित था। उसके उत्तर पार्श्व में एक कुंड था जिसमें आना नक्षत्र संयुक्त चतुर्दशी को स्नान का महत्त्व था। वहीं स्थित रुद्रलिंग और उसके आसपास बहुत से लिंग थे।
रुद्रमहालय-रुद्र के नैऋत भाग में। वहाँ पार्वती की मूर्ति थी। अब यह आदिमहादेव मंदिर में है। उसके आगे एक कूप था जहाँ पितरों और देवों का निवास माना जाता था। वहाँ श्राद्ध और पिंडदान की विधि थी तथा पिंड कूप में डाल दिये जाते थे। वहीं पर वैतरणी नामक एक दीर्घिका थी जिसमें स्नान से नरक परित्राण मिलता था। रुद्रमहालय के उत्तर में बहुत से लिंग थे।
बृहस्पतीश्वर–रुद्रकुंड के पश्चिम में बृहस्पति द्वारा स्थापित लिंग।
पितरों द्वारा स्थापित लिंग-रुद्रकूप के दक्षिण भाग में था।
कामेश्वर–रुद्रवास के दक्षिण में। यहाँ काम के तपस्वरूप एक कुंड उत्पन्न हुआ। उसके उत्तर तट पर कामेश्वर लिंग था जिसकी पूजा से सभी मनचाही बातें मिलती थीं। कुंड में चैत्र शुक्ल १३ को स्नान करते थे
घासीटोला शिवालय-घासीटोले में गली के कोने पर और मूलस्थान पर भी मंदिर है।
पंचालकेश्वर शिवलिंग-कामेश्वर के पूर्व में इस लिंग की कुबेर के पुत्र ने आराधना की। इसकी पूजा से महा धन की प्राप्ति की बात मानी गयी है।
नलकूबरेश्वर -घासीटोले में स्थित है।
पंचकेश्वर-पंचालकेश्वर के समीप पूर्वमुख मुखलिंग। इसके आगे एक कूप यानि गहरा कुआ था।
अघोरेश शिवालय-कामेश्वर कूप के पास। यहाँ शिवभक्त किन्नरों अर्थात हिजड़ों द्वारा नौ शिवलिंग स्थापित किए थे। यहां कभी-कभा अघोरियों का जमावड़ा रहता है। महागौरी बाबा कीनाराम ने यहां बहुत तप किया था।
दिवाकर-निशाकर द्वारा स्थापित लिंग-पंचकेश्वर के पूर्व में।
अंधकेश्वर-पंचकेश्वर के दक्षिण में अंधक द्वारा स्थापित लिंग।
देवेश्वर-अंधकेश्वर के पश्चिम और काम कुंड के दक्षिण में, वहीं पर भीमेश्वर, सिद्धेश्वर, गंगेश्वर, यमुनेश्वर, मंडलेश्वर और उर्वशी आदि अनेकों शिवलिंग थे। अब कुछ ही शेष हैं।
शांतेश्वर-शांत द्वारा स्थापित मंडलेश्वर के पास शिवलिंग।
बालखिल्येश्वर-शांतेश्वर की वायव्य दिशा में द्रोणेश्वर के पास काम कुंड के पश्चिम में।
बाल्मीकेश्वर-बालखिल्येश्वर के आगे मुखलिंग।
च्यवनेश्वर-काम कुंड के तट पर च्यवन द्वारा स्थापित शिवलिंग।
वातेश्वर शिवलिंग-वायु द्वारा स्थापित इस शिवलिंग पर दही या घी द्वारा 7 शनिवार रुद्राभिषेक कराने से लकवा, थायराइड आदि अनेक खतरनाक असाध्य रोग जड़ से मिट जाते हैं।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

दुर्गा जी के 108 चमत्कारिक नाम

 क्या होता है अर्चन?


108 दुर्गा नाम दुर्गासप्तशती के अनुसार


दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का पाठ अत्यंत चमत्कारी और कामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है। नवरात्र में नवचण्डी पाठ साधारणत: सभी गृहस्थों के यहां किया जाता है। काम्यसाधना में चण्डी पाठ व मानस के पाठ मुख्य रूप से जाने जाते हैं। उपवास करना ऋतु सन्धि के दुष्प्रभाव को दूर करने का भी एक माध्यम है जो शरीर मे तामसिक और राजसिक गुणों को कम कर उसे सात्विक बना साधना आदि के लिए अनुकूल करता है।

अर्चन के लिए हम कोई भी फल मेवे, सुहाग सामग्री या श्रद्धा और क्षमतानुसार कुछ भी ले सकते हैं। अर्चन आप नवरात्र या उसके बाद भी अन्य स्तोत्र मंत्रों व देवताओं के लिए कर सकते हैं, इसमे आप बस दिए हर नाम के साथ एक एक करके 108 बार माता का नाम बोलकर संकल्पित सामग्री माता के चरणों मे चढ़ाते जाते हैं। जो सहस्त्रार्चन करना चाहे वे उतनी संख्या में सामग्री लें। अगर आप नवचण्डी या अन्य अनुष्ठान करवा रहें हैं तो ध्यान रखें किसी योग्य आचार्य का ही चयन करें जिसको संस्कृत व कर्मकाण्ड दोनों का ही ज्ञान हो, उच्चारण महत्वपूर्ण है उचित उच्चारण एक पासवर्ड के समान है अगर पासवर्ड गलत है तो आप इक्षित ऊर्जा को प्राप्त करने में कैसे सफल हो सकते हैं।

इस स्तोत्रपाठ से होने वाले लाभ नीचे फलश्रुति में कहे गए हैं।


फलश्रुति-

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।

 नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ।।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।

 चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ।।

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् ।

 पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ।।

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि ।

 राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ।। गोरोचनालक्तककुङ्कुमेवसिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण। 

विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।


१ सती 

२ साध्वी 

३ भवप्रीता 

४ भवानी 

५ भवमोचनी 

६ आर्या 

७ दुर्गा 

८ जया 

९ आद्या 

१० त्रिनेत्रा 

११ शूलधारिणी 

१२ पिनाकधारिणी 

१३ चित्रा 

१४ चन्द्रघण्टा 

१५ महातपा 

१६ मन : 

१७ बुद्धि 

१८ अहंकारा 

१९ चित्तरूपा 

२० चिता 

२१ चिति 

२२ सर्वमन्त्रमयी 

२३ सत्ता 

२४ सत्यानंद 

२५ अनंता 

२६ भाविनी 

२७ भाव्या 

२८ भव्या 

२९ अभव्या 

३० सदागति 

३१ शाम्भवी 

३२ देवमाता 

३३ चिंता स्वरुपिणी

३४ रत्नप्रिया 

३५ सर्वविद्या 

३६ दक्ष कन्या 

३७ दक्ष यज्ञ विनाशिनी 

३८ अर्पणा 

३९ अनेकवर्णा 

४० पाटला 

४१ पाटलावती 

४२ पट्टांबरपरिधाना

४३ कलमंजरीररंजिनि 

४४ अमेयविक्रमा 

४५ क्रूरा 

४६ सुंदरी 

४७ सुरसुन्दरी 

४८ वनदुर्गा 

४९ मातंगी 

५० मतङ्गमुनिपूजिता 

५१ ब्राही 

५२ माहेश्वरी 

५३एन्द्री 

५४ कौमारी 

५५ वैष्णवी 

५६ चामुंडा 

५७ वाराही 

५८ लक्ष्मी

५९ पुरषाकृति 

६० विमला 

६१ उत्कर्षिणी

६२ ज्ञाना 

६३ क्रिया 

६४ नित्या 

६५ बुद्धिदा 

६६ बहुला 

६७ बहुलप्रेमी

६८ सर्ववाहनवाहना 

६९ निशुंभशुम्भहन्नी 

७० महिषासुरमर्दिनि 

७१ मधुकैटभहन्त्री 

७२ चण्डमुंडविनाशनी 

७३ सर्व असुरविनाशा 

७४ सर्वदानवघातिनी 

७५ सत्या 

७६ सर्वाशस्त्रधारिणी 

७७ अनेकशस्त्रधारिणी 

७८ अनेकास्त्रधारिणी 

७९ कुमारी

८० एक कन्या 

८१ केशोरी 

८२ युवती 

८३ यति 

८४ अप्रौढ़ा 

८५ प्रोढ़ा 

८६ वृद्धमाता 

८७ बलप्रदा 

८८ महोदरी 

८९ मुक्तकेशी 

९० घोररूपा 

९१ महाबला 

९२ अग्निज्वाला 

९३ रौद्रमुखी 

९४ कालरात्रि 

९५ तपश्विनी 

९६ नारायणी 

९७ भद्रकाली 

९८ विष्णुमाया 

९९ जलोदरी 

१०० शिवदूती 

१०१ कराली

१०२ अनन्ता 

१०३ परमेश्वरी 

१०४ कात्यायनी 

१०५ सावित्री 

१०६ प्रत्यक्षा 

१०७ ब्रहावादिनी 

१०८ सर्वशास्त्रमयी।

इनमें आगे तथा नाम के बाद नमः लगाकर अर्चन करें।

 इस स्तोत्र के लिए कहा गया है कि अगर मंगळवारी अमावस्या में चंद्रमा रात्रि में शतभिषा नक्षत्र में हो तो इस स्तोत्र कालिख कर जो भी पाठ करता है वो सभी अत्यंत संपदाओं का पाता है। हालांकि ये मुहूर्त जब 2015 में पड़ा तो उस रात ग्रहण का सूतक काल लग गया था।


भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते ।

विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम् ।।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

श्री राधा कृत विघ्नाशक गणपति स्तोत्र

 ब्रह्मवैवर्तपुराण में सभी प्रकार के विघ्नों के निवारण के लिए श्री राधा जी कृत विघ्ननाशक गणपति स्तोत्र का वर्णन आता है।

श्री राधिका जी कहती हैं

जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परम ईश्वर, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं; प्रधान-प्रधान सुर, असुर और सिद्ध जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमलके लिये सूर्य और मंगलोंके आश्रय स्थान हैं, उन परात्पर गणेश की मैं स्तुति करती हूँ । यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोकको हरनेवाला है। जो प्रातः काल उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नों से विमुक्त हो जाता है।


श्री राधिका उवाच 

परं धाम परं ब्रह्म परेशं परमीश्वरम् । 

विघ्ननिघ्नकरं शान्तं पुष्टं कान्तमनन्तकम् ॥

सुरासुरेन्द्रैः सिद्धेन्द्रैः स्तुतं स्तौमि परात्परम् । 

सुरपद्मदिनेशं च गणेशं मङ्गलायनम् ॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यं विघ्नशोकहरं परम् । 

यः पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वविघ्नात् प्रमुच्यते ॥


मंगलवार, 5 सितंबर 2023

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत

 कृष्ण जन्माष्टमी व्रत


कब करें जन्माष्टमी व्रत?

क्यों आवश्यक है जन्माष्टमी व्रत, इसका महत्व?

कृष्ण जन्माष्टमी और जयंती में क्या है अंतर?


क्या आपको पता है सनातन धर्म के ग्रंथों में ऐसी चार महारात्रियों का वर्णन आता है जो सभी प्रकार की सिद्धि, साधना, मंत्र जप, स्तोत्रपाठ, होम आदि पूजा के विभिन्न माध्यमों से सभी प्रकार की मनोकामना को सिद्ध करने वाली कही गयी है।


1-दीपावली- कालरात्रि

2-महाशिवरात्रि- महारात्रि

3-जन्माष्टमी- मोहरात्रि

4-होलिका दहन- दारुण रात्रि


वैसे तो अनेकों ग्रंथों में अलग अलग प्रकार से इनका वर्णन किया गया है पर यहां में तंत्रोक्त देवी सूक्त के सातवें श्लोक का संदर्भ दे रही हूँ।


प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।।7।।


अर्थ – तुम्हीं तीनो गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो. भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि सहित दारुण रात्रि भी तुम्हीं हो।


श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को अत्यंत फलदायी और पापनाशी कहा गया है।


कृष्णजन्माष्टमी पूर्वा प्रसिद्धा पापनाशिनी ।

क्रतुकोटिसमा ह्येषा तीर्थानामयुतैः समा ।

कर्ता गवां सहस्रं तु यो ददाति दिनेदिने ।

तत्फलं समवाप्नोति जयंत्यां समुपोषणे ।


श्री कृष्ण "जयंती और जन्माष्टमी"  एक साथ होने का सुंदर संयोग भी है इस बार


कृष्णाष्टम्यां भवेद्यत्र कलैका रोहिणी यदि। 

जयन्ती नाम सा प्रोक्ता उपोष्या सा प्रयत्नतः।। 


केवल अष्टमी मात्र का विचार करने पर व्रत कृष्णाष्टमी कहलाता है, किन्तु रोहिणी नक्षत्र का विचार करते हुए यदि व्रत किया जाए, तो वह जयंती या जन्माष्टमी कहलाता है। इसलिए कई बार यह व्रत दो दिन मनाया जाता है।


यस्मिन् वर्षे जयन्त्याख्यो योगो जन्माष्टमी तदा।

अन्तर्भूता जयन्त्यां स्याद् ऋक्षयोगप्रशस्तितः।।

                                                निर्णयसिन्धु


जयंती बुधवारे च रोहिण्या सहिता यदा।

भवेच्च मुनिशार्दूल किं कृतैर्व्रतकोटिभिः।।


उस पर भी सुंदर संयोग ये है कि यह बुधवार युक्त है जिसका फल करोड़ों व्रत के समान है 


गंधपुष्पैश्च धूपैश्च घृतपूर्णप्रदीपकैः ।

पूजयेद्भक्तिभावैश्च दद्याद्विप्राय दक्षिणाम् ३९।

विधिनानेन यो विप्र जयंतीं प्रकरोति च ।

नरो वै तारयेद्भक्त्या पुरुषानेकविंशतिम् ४०।

न दौर्भाग्यं न वैधव्यं न भवेत्कलहो गृहे ।

संततेर्न विरोधं च न पश्यति धनक्षयम् ४१।

यान्यांश्चिकीर्षते कामान्जयंती समुपोषकः ।

तांस्तान्प्राप्नोति सकलान्विष्णुलोकं स गच्छति।।


गंधपुष्प, धूप घी के दीपक आदि से जो भी व्यक्ति इस व्रत को नियम पूर्वक करता है उसको सभी सुख प्राप्त होते हैं दुर्भाग्य, वैधव्य, ग्रह कलह, संतान  और धन संबंधी समस्याओं को वह व्यक्ति कभी नही देखता और अंततः विष्णुलोक में स्थान पाता है।


व्रत फल-


महाजयार्थं कुरु तां जयन्तीं मुक्तयेनघ। 

धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च मुनिपुङ्गव।। 

ददाति वाञ्छितानर्थान् ये चान्येप्यतिदुर्लभाः।


 इस व्रत के करने से विजय की प्राप्ति होती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। दुर्लभ से दुर्लभतम मनोकामना की पूर्ति होती है।


समायोगे तु रोहिण्यां निशीथे राजसत्तम। 

समजायत गोविन्दो बालरूपी चतुर्भुजः।। 

तस्मात्तं पूजयेत्तत्र यथा वित्तानुरूपतः।। 


मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र लगने पर ही बाल रूप में भगवान गोविन्द ने चतुर्भुजी स्वरूप में अवतार लिया था। इसलिए ही अपने वैभव-व्यवस्था के अनुसार उनकी पूजा की जानी चाहिए। 


रोहिण्यामर्द्धरात्रे तु सदा कृष्णाष्टमी भवेत्। 

तस्यामभ्यर्चनं शौरेर्हन्ति पापं त्रिजन्मजम्।।


कृष्णाष्टमी को रोहिणी नक्षत्र के अर्धरात्रि में होने पर ही मनानी चाहिए। इससे तीन जन्मों के पाप का नाश होता है।

सोमवार, 28 अगस्त 2023

महत्वपूर्ण सरल ज्योतिष उपाय

 कुछ पर महत्वपूर्ण सरल ज्योतिष उपाय


ऐसा नहीं है कि ज्योतिष उपायों में कठिन और गहन उपाय ही काम करते हैं छोटे छोटे पर लगातार करने पर ये उपाय भी बहुत प्रभावशाली बन जाते हैं।


मैंने पहले भी कहा है जो व्यक्ति परिवार और समाज के लिए अपने कर्तव्यों को सही से निभाता है अनायास ही उसे ग्रहों के शुभ परिणाम मिलने शुरू हो जाते हैं।

पहले घरों में सबके नाम की रोटी निकालने की रीत थी जो आस पास के पशु पक्षियों को दी जाती थी।  ये जीव भी अलग अलग ग्रहों के कारक हैं।


अब न घर के आसपास इन पशुओं/पक्षियों की उपलब्धता है नहीं पहले जैसे नियमों को लोग निभा पाते हैं। 

 पर कभी कभी समय मिलने पर ये उपाय करने का प्रयास करें...... और इनके लाभ स्वयं महसूस करें।


1- गाय जो हरा चारा दें - मंदिरों गौशालाओं या सड़क पर घूमने वाले इन जीवों को हरा चारा, भीगी मूँग, घी रोटी और गुड़, अंकुरित जवारे(गेहूं) और चना खिलाएँ गाय सनातन धर्म मे पूज्यनीय है इन उपायों से आप अपने बुध, शुक्र, सूर्य और गुरु के अनुकूल परिणाम पा सकेंगे।


पक्षियों को दाना- पक्षियों को सात तरह के अनाज मिक्स (सतनाजा)करके खिलाएँ।

गेहूं

चावल

बाजरा

ज्वार

चने

मक्का

काली उड़द

ध्यान दें अनाज कभी भी छत के ऊपर न खिलाएँ बल्कि कच्ची मिट्टी वाली जगह पर खिलाएँ। सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि और राहु केतु लगभग सब की अनुकूलता के लिये है।


मछली को दाना-

मछली को आटे की गोलियां जब कभी मौका मिले खिलाइये मन मस्तिष्क का कारक चंद्र और राहु/केतु की अनुकूलता के लिए अचूक उपाय है।


कुत्ते को रोटी- 

ये जीव जंतु हम पर आश्रित हैं अगर घर के बाहर दिखाईं दें तो रोटी में तेल लगाकर खिलाएँ कर्म कारक शनि और राहु/केतु की अनुकूलता पाएं।


चींटी को पंजीरी/शक़्कर-

चींटियों को घर से बाहर ही पंजीरी, शक़्कर, भुना बेसन डालें। अनायास ही मंगल राहु सूर्य शनि और शुक्र के लाभ मिलेंगे। सूखे नारियल में बूरा तिल और घी भरके बढ़/पीपल की जड़ पर दबाकर रखवाते हैं इसका कारण है कि इन पुराने वृक्षों की जड़ों में चीटियां रहती है। जैसे जैसे नारियल और अन्य सामग्रियों को वो खाती जाती वैसे वैसे आपको लाभ मिलता जाता है।


अगले थ्रेड पर कुछ आसानी से उपलब्ध पर ग्रहों के कारक होने से चमत्कारिक प्रभाव वाले पौधों पर लिखूँगी जिनके स्वास्थ्य लाभ किसी भी अंग्रेज़ी दवाई से पहले बल्कि तुरंत लाभ दिखने लगते हैं।

ज्योतिष उपायों में "अर्चन" का महत्व

 ज्योतिष उपायों में "अर्चन" का महत्व


मैं ज्योतिष उपायों में अक्सर पूजा और अर्चना के विषय मे लिखती हूँ। जिसको समझने में लोग कंफ्यूज हो जाते हैं, विशेषकर "अर्चन" को लेकर।

"पूजा" का अर्थ है जब आप किसी स्तोत्र, मंत्र और पाठ आदि से भगवान का ध्यान और आराधना करें।

"अर्चना" मतलब किसी भेंट या सामाग्री से देवता का क्रमबद्ध पूजन जो कि अधिकतर सकाम मतलब "कामना की पूर्ति" के लिए किया जाता है।

अर्चना में आवश्यकता और मनोकामना के अनुसार ही अर्चन सामग्री का चयन किया जाता है।

गुम हुई वस्तु, प्रतिष्ठा को पाने का मंत्र

 गुम हुई वस्तु, प्रतिष्ठा को पाने का अचूक उपाय



गुम हुई वस्तु, धन, प्रतिष्ठा को वापस पाने के लिए  मंत्र।


रामचरितमानस के कुछ मंत्र स्वसिद्ध सौम्य शाबर मंत्र की श्रेणी में आते हैं जिनके प्रयोग में दो धारी तलवार के समान नुकसान देने वाली तीव्रता नही होती।

महादेव और अम्बिका के आशीर्वाद से ऐसे मंत्र/चौपाई/सोरठे, मैं आगे इस श्रृंखला में लिखती रहूँगी।


कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। 

साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥

अनमिल आखर अरथ न जापू। 

प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ।।

                    रामचरितमानस, बालकाण्ड


शिव-पार्वती ने कलियुग को देखकर, जगत् के हित के लिए, शाबर मन्त्र समूह की रचना की, जिन मंत्रों के अक्षर बेमेल हैं, जिनका न कोई ठीक अर्थ होता है और न जप ही होता है, तथापि श्री शिवजी के प्रताप से जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष है।


अगर आपने मंत्र विज्ञान के बारे में जाना है तो आपको पता होगा कि शाबर मंत्रों को तुरंत फल देने वाला माना जाता है, पर इनकी शक्ति इतनी तीव्र होती है कि गलत प्रयोग से व्यक्ति स्वयम का भी नुकसान कर सकता है इसलिए इन्हें गुरु सानिध्य में ही करना चाहिए।  मानस के ये मंत्र महादेव के आशीर्वाद से बिना गुरु से प्राप्त किये भी प्रयोग किये जा सकते हैं।


तो खोई हुई वस्तु पाने का छोटा और सरल दिखने वाला पर अचूक मंत्र/चौपाई लिखते हैं इसका प्रयोग विभिन्न विधियों से आवश्यकता अनुसार व समस्या की स्थिति देख कर किया जाता है। 

आप सामान्यतः इसकी 11/21/27....... माला जप कर सकते हैं।

कुछ भी चोरी होने, गुम होने पर, कही पैसे फस जाने, किसी के घर छोड़कर जाने पर, प्रतिष्ठा हानि होने पर उन्हें वापस पाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।


गई बहोर ग़रीब नेवाजू। 

सरल सबल साहिब रघुराजू॥


प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले, ग़रीब नवाज (दीनबन्धु), सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं।

शनिवार, 12 अगस्त 2023

बिच्छू के ज़हर का अचूक उपाय

 Remedy for Scorpion Sting


    ~बिच्छू के ज़हर का अचूक उपाय~


पिछले तीन दिन में बिच्छू द्वारा काटे जाने पर मेरे पास दो फ़ोन आये, बारिश का मौसम, खासकर गांव देहात में ही नही शहरों  में भी बिच्छू आदि का डर आजकल बना रहता है।

तो ईश्वर का नाम लेकर इसकी एक अचूक दवा मैं आज आप लोगों को बताऊंगी। 

इमली का बीज लेकर उसे बीच से फोड़कर दो भागों में बांट ले, अब सफेद भाग यानी उस टुकड़े के अंदरुनी भाग को, थोड़ा सा पानी डालकर एक साफ पत्थर पर घिसें, पिसे हुए काजू की तरह की लुगदी सी बन जाएगी, बस अब इसे पोछे बिना ऐसे ही बिच्छू के कटे हुए स्थान पर चिपका दें।

अब अगर वो व्यक्ति मैराथन भी दौड़ लेगा न, तो ये बीज तब तक नही छूटेगा, जब तक कि पूरा विष नही खींच लेगा।

जलन में तुरंत आराम मिलेगा ही और कुछ घंटों में ज़हर खींच कर यर बीज भी खुद ही गिर जाएगा।

मैने इसे स्वयं प्रयोग करके देखा तभी लिख रही हूं, अधिकतर मेरे बताए हुए उपाय मानकर चलिए अनुभूत ही होते हैं।


विष के प्रकार या वर्गीकरण पर मुझे जानकारी नही है थोड़ा जानने का प्रयास किया तो था जिससे लगता है कि ये बीज का उपाय शायद न्यूरोटॉक्सिक विष पर  कार्य करता है, मैंने इसका प्रयोग केवल बिच्छू के डंक पर ही सफलतापूर्वक किया है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

मंगल की महादशा में विभिन्न ग्रहों की अंतर दशाओं के दुष्प्रभावों का शिव पूजा/ अनुष्ठान से निवारण।

 

मंगल

मंगल की महादशा में विभिन्न ग्रहों की अंतर 

दशाओं के दुष्प्रभावों का शिव पूजा/ अनुष्ठान 

से निवारण।

◆मंगल की महादशा में, मंगल की अन्तर्दशा में 

रुद्र-जप तथा वृषभदान करना चाहिये।

◆राहु की अन्तर्दशा होने पर नाग का दान, ब्राह्मण 

भोजन तथा मृत्युंजय मन्त्र जप कराने से आयु एवं 

आरोग्य की प्राप्ति होती है।

नागदानं प्रकुर्वीत देवब्राह्मणभोजनम् ।
मृत्युंजयजपं कुर्यादायुरारोग्यमादिशेत् ॥


मंगल में बृहस्पति की खराब अन्तर्दशा होने पर
शिवसहस्रनामावली का जप करना चाहिये।

'तद्दोष-परिहारार्थं शिवसाहस्त्रकं जपेत् ।'

इसी प्रकार शनि की दोषयुक्त अन्तर्दशा में मृत्युंजय 

मन्त्र के जप का विधान है।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

सोमवती अमावस्या- पितृदोष व कालसर्प दोष से सम्बंधित उपाय करें

 


               सोमवती अमावस्या 

पितृदोष व कालसर्प दोष से सम्बंधित उपाय करें


सोमवती अमावस्या को सूर्यग्रहण के समान फलदायी कहा गया है, इस दिन किया गया स्नान, दान, जप, तर्पण आदि अनंत गुणा फल देता है।


अमावास्या तु सोमेन सप्तमी भानुना सह।

चतुर्थी भूमिपुत्रेण सोमपुत्रेण चाष्टमी।।

चतस्रस्तिथयो स्त्वेताः सूर्यग्रहण सन्निभाः।

स्नानं दानं तथा श्राद्धं सर्वं तत्राक्षयं भवेत्।।


सोमवारी अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी एवं बुधवारी अष्टमी तिथीयां सूर्यग्रहण के समान फल देने वाली कही गयी हैं। इन तिथियों में किया गया स्नान, दान, जप, तर्पण आदि अनंतकोटि फलदायी कहा गया है।

इस दिन पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान करना विशेष शुभ कहा गया है।


वे जो पितृदोष से पीड़ित है आज पीपल 108 परिक्रमा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र के साथ करें, अर्घ्य जनेऊ अर्पित करें।


वे जो पितृ कर्म के कर्तव्य में बंधे हैं प्रत्येक अमावस्या को अवश्य  तर्पण आदि नियमों का पालन करें, आज तो परम पुण्यकारी सोमवती अमावस्या है आप स्वयं नही कर पा रहें है तो ब्राह्मण को बुलाकर विधि विधान से कर्तव्य का निर्वहन करें। याद रहे देव पूजा भाव प्रधान है पर पितृसत्ता के निमित्त किया जाने वाला कारक नियमपूर्वक व विधि विधान से किया जाना चाहिये। केवल इस कार्य से आप देखेंगे कि आप की बहुत सारी समस्याओं का स्वतः ही समाधान हो जाएगा। समय के साथ साथ अंतर महसूस होगा आपको।


आज सौभाग्वती स्त्रियों के द्वारा तुलसी/पीपल की परिक्रमा कर सौभाग्यकारक शिव-पार्वती पूजा का विधान भी किया जाता है। जिसमे 108 परिक्रमा किन्ही 108 वस्तुओं फल, मेवे, सौभाग्य सामाग्री इत्यादि से पूर्ण कर, पूजा आदि कर, सभी वस्तुएँ सौभाग्यशाली स्त्री/ ब्राह्मणी को दे दी जाती हैं।


श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र

 श्री शिव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र


इस स्तोत्र का केवल एक पाठ शतरुद्री के तीन पाठों के समान फल देने वाला कहा गया है।


पार्वत्युवाच

शरीरार्धमहं शम्भोर्येन प्राप्स्यामि केशव ।

तदिदानीं समाचक्ष्व स्तोत्रं शीघ्रफलप्रदम् ॥


नारायण उवाच

अस्ति गुह्यतमं गौरि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।

शम्भोरहं प्रवक्ष्यामि पठतां शीघ्रकामदम् ॥


विनियोग – 

'ॐ अस्य श्रीशिवाष्टोत्तरशतदिव्यनामामृत-स्तोत्रमालामन्त्रस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थे जपे विनयोगः ।'


शिवसंकल्प इति हृदयम् । 

पुरुषसूक्तमिति शिरः ।

उत्तरनारायणेति शिखा ॥ 

अप्रतिरथेति कवचम् ।

विभ्राडिति नेत्रम् । 

शतरुद्रियमित्यस्त्रम् । 

आत्मानं रुद्ररूपं ध्यायेत् । 


(इन सूक्तों का पाठ करते हुए न्यास करे।)


ध्यान-

धवलवपुषमिन्दोर्मण्डले संनिविष्टं 

भुजगवलयहारं भस्मदिग्धाङ्गमीशम् ।

चारुचन्द्रार्धमौलिं हरिणपरशुपाणिं

हृदयकमलमध्ये संततं चिन्तयामि ॥

'चन्द्रमण्डल में श्री शिवजी विराजमान हैं, उनका गौर शरीर है, सर्प का ही कंगन तथा सर्प का ही हार पहने हुए हैं तथा शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं, उनके हाथों में मृगी मुद्रा एवं परशु है और अर्धचन्द्र सिर पर विराजमान है। मैं उन भगवान् शंकर का हृदय में निरंतर चिन्तन करता हूँ।'


शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः ।

वामदेवो विरूपाक्षः कपर्दी नीललोहितः ॥

शंकरः शूलपाणिश्च खट्वाङ्गी विष्णुवल्लभः ।

शिपिविष्टोऽम्बिकानाथः श्रीकण्ठो भक्तवत्सलः॥

भवः शर्वस्त्रिलोकेश: शितिकण्ठः शिवाप्रियः ।

उग्रः कपालिः कामारिरन्धका सुरसूदनः ॥

गङ्गाधरो ललाटाक्षः कालकालः कृपानिधिः ।

भीमः परशुहस्तश्च मृगपाणिर्जटाधरः ॥

कैलासवासी कवची कठोरस्त्रिपुरान्तकः ।

वृषाङ्को वृषभारूढो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

सामप्रियः स्वरमयस्त्रयीमूर्तिरनीश्वरः ।

सर्वज्ञः परमात्मा च सोमसूर्याग्निलोचनः ॥

हविर्यज्ञमयः सोमः पञ्चवक्त्रः सदाशिवः ।

विश्वेश्वरो वीरभद्रो गणनाथः प्रजापतिः ॥

हिरण्यरेता दुर्धर्षो गिरीशो गिरिशोऽनघः |

भुजङ्गभूषणो भर्गो गिरिधन्वा गिरिप्रियः ॥

कृत्तिवासा पुरारातिर्भगवान् प्रमथाधिपः ।

मृत्युंजयः सूक्ष्मतनुर्जगद्व्यापी जगद्गुरुः ॥

व्योमकेशो महासेनजनकश्चारुविक्रमः ।

रुद्रो भूतपतिः स्थाणुरहिर्बुध्न्यो दिगम्बरः ॥

अष्टमूर्तिरनेकात्मा सात्त्विकः शुद्धविग्रहः ।

शाश्वतः खण्डपरशुरजपाशविमोचकः ॥

मृडः पशुपतिर्देवो महादेवोऽव्ययः प्रभुः ।

पूषदन्तभिदव्यग्रो दक्षाध्वरहरो हरः ॥

भगनेत्रभिदव्यक्तः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ।

अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारकः परमेश्वरः ॥

एतदष्टोत्तरशतनाम्नामाम्नायेन सम्मितम् ।

विष्णुना कथितं पूर्वं पार्वत्या इष्टसिद्धये ॥

शंकरस्य प्रिया गौरी जपित्वा त्रैकालमन्वहम् ।

नोदिता पद्मनाभेन वर्षमेकं प्रयत्नतः ॥

अवाप सा शरीरार्धं प्रसादाच्छूलधारिणः ।

यस्त्रिसंध्यं पठेच्छम्भोर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥

शतरुद्रित्रिरावृत्त्या यत्फलं प्राप्यते नरैः ।

तत्फलं प्राप्नुयादेतदेकवृत्त्या जपन्नरः ॥

बिल्वपत्रैः प्रशस्तैर्वा पुष्पैश्च तुलसीदलैः ।

तिलाक्षतैर्यजेद् यस्तु जीवन्मुक्तो न संशयः ॥

नाम्नामेषां पशुपतेरेकमेवापवर्गदम् ।

अन्येषां चावशिष्टानां फलं वक्तुं न शक्यते ॥


।।इति श्री शिवरहस्ये गौरीनारायण संवादे शिवाष्टोत्तरशत दिव्यनामामृत स्तोत्रं सम्पूर्णम्।।


इस प्रकार १०८ नाम, जो वेद के तुल्य हैं, श्री विष्णु ने पहले इष्ट-सिद्धि-हेतु माता पार्वती को बताये थे । शंकरप्रिया भगवती गौरी ने भगवान् पद्मनाभ की प्रेरणा से एक वर्ष तक प्रतिदिन त्रिकाल इस का जप किया। महादेव की कृपा से उन्होंने उनका शरीरार्ध प्राप्त किया। शतरुद्री के तीन बार पाठ करने से जो फल मनुष्य को प्राप्त होता है, वह फल इस स्तोत्र मात्र एक बार के पाठ करने से प्राप्त हो जाता है। 

बेलपत्र, फूल, तुलसीदल से, तिल तथा अक्षत से जो महादेव का यजन करते हैं, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं । भगवान् शंकर के इन शतनामों में से केवल एक नाम ही मोक्ष देनेववाला है तो शतनाम का महत्त्व (फल) वर्णन ही नही किया जा सकता है।


शनिवार, 15 जुलाई 2023

शनि प्रदोष व्रत पूर्ण शास्त्रोक्त विधान

 


                शनि प्रदोष 


यदा त्रयोदशी कृष्णा सोमवारेण संयुता ।

यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ॥

तदातीव फलं प्राप्तं धनपुत्रादिकं लभेत् ।

                                           "हेमाद्रि"


हेमाद्रि के अनुसार अगर त्रयोदशी तिथी कृष्ण पक्ष में सोमवार के दिन हो अथवा शुक्लपक्ष के मंद अर्थात शनिवार को हो, तो इस दिन किये गए व्रत पूजा आदि से धन सम्पदा और संतान सुख (कुलवृद्धि) की प्राप्ति होती है।


यदा त्रयोदशी शुक्ला मन्दवारेण संयुता ।

आरब्धव्यं व्रतं तत्र संतानफलसिद्धये ॥

                                        "मदनरत्न"


मदनरत्न में भी वर्णित है कि शुक्लपक्ष में शनिवार को पढ़ने वाला प्रदोष व्रत संतान सुख की प्राप्ति कराता है।


प्रदोषव्रत को अलग अलग दिन में आने से इसका महत्व और अधिक हो जाता है केवल प्रदोष व्रत करके भी ग्रह जनित पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है। 

प्रदोष काल मे शिव परिवार( महादेव, अम्बिका, षडानन, गणपति, नंदी और कीर्तिमुख) का पूजन करें, मिट्टी के अभाव में हल्दी/रोली से बनाकर यथाशक्ति पंच/दश/षोडशोपचार पूजा करें, उसके बाद किसी तालाब या क्यारी में इनका विसर्जन कर दें।


शिवालय में इस दिन 108 घी के दीपक लगाए, प्रयास करें मिट्टी के दिये हों अन्यथा आटे से दिए बनाकर, शिवलिंग के समक्ष दिए लगाए, परिक्रमा करें।


सौभाग्वती स्त्रियाँ गौरी जी को श्रृंगार चढ़ाकर किसी भी सौभाग्यवती स्त्री (पुजारी परिवार/मान पक्ष) को दे सकती हैं।


शनि साढ़ेसाती से प्रभावित व्यक्ति भी कल पूजा करें, शिवालय में शनि ग्रहजनित पीड़ा के निवारण के लिए दीपदान करें, कुंडली में कुपित (अगर योगकारक नही है) शनि के लिए कल शनि ग्रह की कारक सामग्री का दान करें। क्योंकि शनिवार व त्रयोदशी के साथ साथ अनुराधा नक्षत्र भी है।

मंगल - सावन में करें ग्रहों के अनुसार ज्योतिष उपाय



    सावन में करें ग्रहों के अनुसार उपाय


                       ~मङ्गल~


वैदिक ज्योतिष में मंगल को सेनापति की संज्ञा दी गयी अर्थात आक्रामकता, वीरता, कर्म को वरीयता, ये जितना सृदृण रक्षक है उतना ही प्रबल मारक भी, शरीर मे रक्त का कारक विशेषकर लाल रक्त कणिकाओं की मात्रा का निर्धारण करने वाला। 


जल्दबाजी, बहुत ज्यादा भावनात्मक, मंगल को भुमि पुत्र अर्थात "भौम" भी कहा जाता है, अगर किसी भी स्थिति में कुंडली मे बली है तो माता से विशेष भावनात्मक लगाव होता ही है।


ज्योतिष में विशेषकर मेडिकल एस्ट्रोलॉजी में जातक को सर्जरी की आवश्यकता, माइनर या मेजर सर्जरी का होना, रक्तविकार, चोट लगना, कर्ज़/ऋण भी मंगल के प्रभाव से देखा जाता है, जमीन से संबंधित लाभ और विवाद आदि में मंगल का विशेष प्रभाव देखा जाता है।


मंगल भाई व मित्र व उनके साथ आपके संबंधों, उनसे होने वाले लाभ-हानि आदि को भी दिखता है।


सावन में कैसे करें मंगल के उपाय-


मंगलवार का व्रत करें, नारसिंह स्तोत्र, मङ्गल कवच, हनुमान चालीसा का अनुष्ठानात्मक प्रयोग करें।


अगर ऋण से पीड़ित हैं तो ऋणमोचक मंगल/ नारसिंह स्तोत्र का पाठ करें।


अगर बार बार चोट लग रही है, गाड़ी और शरीर में स्क्रेच लगते ही रहते हैं तो भी मंगल का उपाय करें, मंगल व्रत, हनुमान साधना करें।


ऐसे लोग विशेषकर यात्रा में निकलते समय हनुमानद्वादशनाम का पाठ करके ही निकलें।


जमीन संबंधित मामलों में लाभ और हानि का कारक भी मंगल ही है, ऐसे में अगर आपको नाकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है जमीनी विवाद, बार बार जमीन आदि से जुड़े कामों में अड़चन, भाइयों और मित्रों की तरफ से तनाव व भय आदि दे रहा है तो मंगल और तृतीय/चतुर्थ भाव से सम्बंधित उपाय करें।


अगर लाभकारी होकर आपको जमीन, कंस्ट्रक्शन, माइनिंग या किसी भी तरह से मिट्टी से जुड़े लाभ मिल रहे हैं तो इसे व्रत उपाय आदि से और बली करें।


इमोशन्स पर कंट्रोल बहुत जरूरी है ऐसे लोग प्रायः भावनात्मक रूप से या तो बहुत कठोर अथवा बहूत कमज़ोर होते हैं, कठोर नारियल के अंदर नरम गिरी की तरह, तो जो इन्हें समझ लेता है उन्हें पता होता है कि इनसे कैसे काम निकलना है, तो मेडिटेशन करें, स्वयं  खुद फोकस और स्वयं ही कंट्रोल करें।


इस श्रावण भर शिवालय में प्रतिदिन तांबे के बने दिए पर घी का दीपक लगाए।


रक्त चंदन को अपने हाथों से घिसकर महाद्रव का श्रृंगार करें।


तांबे के लोटे में गुड़, रक्तचंदन मिलाकर महादेव का अभिषेक करें।


रक्तचंदन से बेलपत्र पर लिख कर  "ॐ साम्बसदाशिवाय नमः"  मंत्र के साथ महादेव का 27/108/1008 यथासम्भव संख्या में अर्चन करें।


मसूर की दाल/ मलका से महादेब का अर्चन करें।


अगर मंगल नाकारात्मक है व हाई ब्लड प्रेशर आदि दे रहा है तो मसूर की दाल का खाने में बिल्कुल प्रयोग न करें।


अगर शुभ भावों का स्वामी नहीं है मंगल तो मंगल की दान समाग्री आदि का ब्राह्मण/ क्षत्रिय को दान करें,  शुभ भाव का स्वामी होने पर ये समाग्री किसी को दान न देकर केवल शिवलिंग पर अर्पित कर दें।


मंगलवार और मंगल के नक्षत्रों 


मृगशिरा

चित्रा

धनिष्ठा,  


में ये उपाय अवश्य करें।


कुंडली मे अच्छा मंगल पुलिस, आर्मी पैरा फोर्सेस में भी स्थिति अनुसार व्यक्ति को कार्यरत होने का अवसर देता है, इन संस्थानों में हायर पोस्ट पर अधिकतर मंगल से विशेष रूप से प्रभावित व्यक्ति कार्यरत देखे जाते हैं, तो अगर आप आर्मी, पैरा फोर्सेस, या IPS/ज्यूडिशियल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो अपनी कुंडली को प्रबल करें। क्योंकि ग्रहों में सेनापति मंगल ही है।


वैसे तो हर कुंडली अलग है और हर कुंडली पर करने वाले उपाय भी अलग अलग ही होते हैं पर यहां मैने कुछ ऐसे उपाय दिए हैं जोकि लगभग सभी कर सकते हैं, तो इस सावन इन उपायों से लाभ उठायें।