बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

मंगलाचरण और जयघोष

 पूजा के बाद प्रतिदिन करें 


ये मंगलाचरण और जयघोष


अपने घर में सत्संग कीर्तन के लिए यह मंगलाचरण बहुत सुंदर भाव प्रकट करता है, साथ ही सरल भी है | हम सब को ये उद्घोष करना चाहिए और बच्चों को याद भी कराना हैं।


दुर्गति नाशिनी दुर्गा जय जय,

काल विनाशिनी काली जय जय,

उमा, रमा, ब्रह्माणी जय जय,

राधा, सीता रुक्मणी जय जय,

सांब सदाशिव, सांब सदाशिव,

सांब सदाशिव, सांब सदाशिव,

हर हर शंकर, दुखहर, सुखकर,

अघ-तमहर हर हर हर शंकर,

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,

जय जय दुर्गा, जय माँ तारा,

जय गणेश जय शुभ आगारा,

जयति सदाशिव जानकी राम,

गौरी शंकर सीता राम,

जय रघुनन्दन जय सिया राम,

व्रज गोपी प्रिय राधे श्याम,

रघुपति राघव राजा राम,

पतित-पावन सीता राम।।


धर्म की जय हो 

अधर्म का नाश हो 

प्राणियों में सद्भावना हो 

विश्व का कल्याण हो 

गौ माता की जय हो 

भारत अखंड हो 


हर हर हर महादेव 🚩

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

वत्स गोत्र का इतिहास और कुलदेवी

 

वत्स/वात्स्यायन गोत्र

देखिये कितनी वैज्ञानिक और सुगठित है गोत्र परंपरा।

"भ्रिगुं, पुलत्स्यं, पुलहं, क्रतुअंगिरिसं तथा
मरीचिं, दक्षमत्रिंच, वशिष्ठं चैव मानसान्”

                                   (विष्णु पुराण 5/7)

भ्रिगु, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वशिष्ठ – इन नौ मानस पुत्रों को ब्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति का कार्य भार सौंपा | कालान्तर में इनकी संख्या बढ़कर 26 तक हो गई और इसके बाद इनकी संख्या 56 हो गई। इन्हीं ऋषियों के नाम से गोत्र का प्रचलन हुआ और इनके वंशज अपने गोत्र ऋषि से संबद्ध हो गए।

हरेक गोत्र में प्रवर, गण और उनके वंशज (ब्राह्मण) हुए। कुछ गोत्रों में सुयोग्य गोत्रानुयायी ऋषियों को भी गोत्र वर्धन का अधिकार दिया गया|

इस क्रम में आज वत्स गोत्र की बात करते हैं।

भगवान ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु कुल में उत्पन्न हुए ऋषि हैं ऋषि वत्स/ वात्स्यायन जिन्हें वच्छ बत्स (वछलश) भी कहा जाता है।

महर्षि भृगु ऋग्वेद काल के भार्गव कुल प्रवर्तक महाऋषि हैं। भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि के सृजन एवं विकास की आकांक्षा से नौ मानस पुत्रों को अपने शरीर से उत्पन्न किया जिनमें से एक महाऋषि भृगु भी थे। महाऋषि भृगु को ब्रह्मा द्वारा किये गये यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न माना जाता है। भगवान वरूण ने महाऋषि भृगु को दत्तक पुत्र बनाया। अतएव इनका नाम भृगुवारणी भी कहा जाता है। महाऋषि भृगु की ही सन्तानें भार्गव भी कहलाई हैं।

च्यवन ऋषि ने भार्गव वंश की सर्वाधिक वृद्धि की।

महाऋषि भृगु के ऋषि च्यवन/च्यवान और ऋषि च्यवन/च्यवान के ऋषि आप्नुवान और ऋषि आप्नुवान के ऋषि और्व और ऋषि और्व के ऋषि ऋचिक और ऋषि ऋचिक के ऋषि जमदग्नि और ऋषि जमदग्नि के ऋषि परशुराम हुए हैं।

इसी वंश परंपरा का अभिन्न भाग है, ऋषि च्यवन/च्यवान और महाराजा शर्याति पुत्री सुकन्या के पुत्र महाऋषि दधीचि की दो भार्या हैं। एक का नाम सरस्वती और दूसरी का नाम अक्षमाला है। महाऋषि दधीचि और सरस्वती से उत्पन्न पुत्र का नाम सारस्वत हुआ। वहीं महाऋषि दधीचि और अक्षमाला से उत्पन्न पुत्र का नाम ऋषि वत्स हुआ। युगोपरांत कलयुग में वत्स वंश सम्भूत ऋषियों ने वात्स्यायन उपाधि भी स्वीकार करी।
वत्स ऋषि के पुत्र माधवानंद के द्वारा वत्स गोत्र का विस्तार किया गया।
वत्स गोत्री किसी और ब्राह्मण की पंक्ति में बैठकर भोजन नही करते थे, अपना भोजन स्वयं बनाते थे/स्वयं पाकी थे।
दान नही लेते थे, याचना नही करते थे।


मूल ऋषि भृगु
पांच प्रवर है-भार्गव, च्यवन, अप्रमाण, औरव, जमदग्नि
गण-भृगु
वेद-सामवेद
उपवेद-गंधर्व
सूत्र-गोविल्
शाखा-कौथुमी
शिखा और पाद-वाम है
प्रथम गोत्र कुल माधवानंद-तारिणी देवी
द्वितीय च्यवन -सिद्धादेवी
कुलदेवता-महादेव
उपास्य-विष्णु


मुख्य रूप से कुलदेवी सिद्धादेवी हैं इसलिए इन्हें ही माना जाता है।


ऐतरेय ब्राह्मण, अष्टाध्यायी में महर्षि पाणिनी द्वारा वत्स गोत्र का महात्म्य बताया गया है जिससे वत्स गोत्र का प्रमाण मिलता है।

ब्राह्मण कार्य छोड़कर जिन्होंने हल चलाने/खेती करने का निर्णय लिया वे भूमिहार कहलाये इस क्रम में ऋषि आश्रम से जुड़े अन्य वर्णों के लोग भी वत्स गोत्र के धारक हुए।

इनका प्रभाव जम्मू, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, आसाम , नेपाल, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में देखा गया।

वत्स गोत्र की उपाधियाँ/सरनेम-
तिवारी
चतुर्वेदी
पाण्डेय्
भागवत
भैरव
गार्गेकर
मलसे
नागेश
सोमानी
गादे
भट्ट
गोरे
हरे
जोशी
काले
सखदेव
दबोलकर
दांगर
होले
काकेतकर
शिनाय
थथेरी
दाहिल
दहल
कुँवर
खराल
कामत
गोवित्रकर
राय/बगोचिया
राणा
चौहान

बहुत से सरनेम मुझे पता नही है अगर उपाधि/सरनेम छूट गया है तो बताएं, मैं ब्लॉग में पूरी डिटेल्स डालने का प्रयास करूँगी।
आपको अगर वत्सगोत्र के विषय मे कोई जानकारी हो तो बताएं ताकि वत्स गोत्र की पूरी और सटीक जानकारी लोगों तक पहुंच सके।

इसके अलावा वैश्य समाज के 18 गोत्र पर भी मैं जल्दी ही ब्लॉग में शामिल करने का प्रयास करूँगी।

रविवार, 26 नवंबर 2023

काशी के शिवलिंग

 

काशी में इतने सारे शिवलिंग क्यों और कैसे हैं?
ग्यारह हजार शब्दमणियों से सुसज्जित इस लेख में काशी विश्वनाथ के 11000 स्वयंभू शिवलिंगों एवं शिव मंदिर में से १००८ खास शिवालय के नाम, स्थान के बारे में बताया जा रहा है।
बनारस विश्वनाथ की नगरी है। काशी शिवभक्त देवी-देवताओं और शिव साधक साधु-संतों की तपस्या स्थली है। यहां जिसने भी शिवसाधना की उन्हीं को भगवान भोलेनाथ ने दर्शन दिये और वे वहीं स्थापित हो गया।
काशी में ज्यादातर शिवलिंग स्वयंभू है। इनका उल्लेख लिंग पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा स्कंदपुराण में मिलता है।


 उनकी सूची निम्नलिखित है-
सिद्धेश्वर-हिरण्यकशिपु मंदिर के पश्चिम में पड़ता था और वह सर्वसिद्धिप्रदायक माना जाता था।
वृषभेश्वर-इस लिंग की स्थिति सिद्धेश्वर के समीप पूर्वाभिमुख तथा गोप्रेक्ष के दक्षिण-पश्चिम में थी।
दधीचेश्वर-गोप्रेक्ष के दक्षिण में सर्वकामफलद यह लिंग था। अत्रीश्वर-अत्रि द्वारा स्थापित यह लिंग दधीचेश्वर के पास दक्षिण में पड़ता था।
-मधुकैटभेश्वर-मधु तथा कैटभ द्वारा संस्थापित, अत्रीश्वर के दक्षिण में मधु का पश्चिमाभिमुख और केटभ का पश्चिमाभिमुख शिवलिंग था।
बालकेश्वर–गोप्रेक्ष के पूर्व में स्थित थ।
विवरेश्वर-बालकेश्वर के समीप। इसके दर्शन से ज्वर का तुरन्त नाश होता था।
देवेश्वर-विज्वरेश्वर के पूर्व में स्थित शिवलिंग।
वेदेश्वर-देवेश्वर के ईशानाभिमुख यह लिंग था तथा इसके अन्य मुख भी दिशाकोणों में थे। इसके दर्शन से ब्राह्मण को चारों वेदों का ज्ञान हो जाता था। ज्ञातव्य है कि सामान्यतः मुख लिंग चारों दिशाओं में होते हैं, कोणों में नहीं (कृ० क० त०, पृ० ४४)।
केशव-वेदेश्वर के उत्तर में स्वयं केशव का मंदिर था।
संगमेश्वर-इसकी स्थिति केशव के मंदिर के पास ही थी तथा इनके दर्शन से शिष्टों से समागम होने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार बरना और गंगा के संगम पर स्थित संगमेश्वर की स्थापना ब्रह्मा ने की थी। संगम पर स्नान करके लिंग का दर्शन करने से पुनर्जन्म नहीं होता।
प्रयागेश्वर-संगमेश्वर के पूर्व में ब्रह्मा द्वारा स्थापित लिंग जिसके दर्शन से ब्रह्मपद मिलता था।
गोप्रेक्ष-आदि महादेव के पूर्व इस देव मंदिर की स्थिति थी। इनके दर्शन से सब कल्मष नाश होते थे।
अनसूयेश्वर-अनसूया द्वारा स्थापित यह लिंग गोप्रेक्ष के उत्तर में था। इनके दर्शन से परागति मिलती थी। गणेश्वर-अनसूयेश्वर के आगे यह मंदिर पड़ता था।
हिरण्यकशिपु-यह लिंग गणेश्वर के पश्चिम में हिरण्यकशिपु द्वारा एक कूप के पास स्थापित किया।
शांकरीदेवी-प्रयागेश्वर के मंदिर में ब्रह्म वृक्ष (पाकड़) या बिल्व वृक्ष के नीचे शांकरीदेवी का आवास था जो सब तीर्थवासियों को शांति प्रदान करती थीं। इन्हीं का एक मन्दिर बेंगलुरु में भी है।
गंगावरणासंगम-श्रवण नक्षत्र युक्ता द्वादशी यदि बुधवार को पड़े तो संगम पर स्नान तथा श्राद्ध बड़ा ही फलदायक तथा श्राद्ध करनेवाले को विष्णुलोक देनेवाला था। मत्स्यपुराण ने वहाँ विधिपूर्वक अन्नदान को - श्रेयस्कर माना है।
- कुंभीश्वर–वरणा के पूर्वी तट पर स्थित शिवलिंग।
कालेश्वर-कुंभीश्वर के पूर्व में स्थित शिवलिंग।
कपिलह्रद शिवलिंग-आधुनिक कपिलधारा। इसकी स्थिति कालेश्वर के उत्तर में थी। इसमें स्नान वृषभध्वज के दर्शन से राजसूय यज्ञ का पुण्य मिलता था, नरक में पड़े पितरगण तर जाते थे तथा वहाँ श्राद्ध करना गया श्राद्ध से भी बढ़कर था
स्कंदेश्वर-महादेव के पश्चिम में स्कंद द्वारा स्थापित लिंग। वहीं पर शाख, विशाख और नैगमीयों स्थापित अनेक लिंग थे।
बलभद्रेश्वर–स्कंदेश्वर के उत्तर में बलभद्र द्वारा नंदीश्वर-स्कंदेश्वर के दक्षिण में नंदी द्वारा स्थापित लिंग।
शिलाक्षेश्वर-नंदीश्वर के पश्चिम में नंदी के पिता द्वारा स्थापित तथा वंदित लिग।
हिरण्याक्षेश्वर-शिलाक्षेश्वर के पास हिरण्याक्ष द्वारा स्थापित शिवलिंग। उसके पास ही देवों द्वारा पित हजारों लिंग थे।
अट्टहास-शिवालय हिरण्याक्षेश्वर के पश्चिम में अट्टहास का पश्चिमाभिमुख लिंग था जिसके दर्शन से ईशान लोक की प्राप्ति होती थी।
मित्रावरुणेश्वर-अट्टहास के पास ही पश्चिम में मित्रावरुण द्वारा स्थापित दो शिवलिंग के वाराणसी के पूर्व द्वार पर स्थित थे। वसिष्ठेश्वर-वहीं मित्रावरुणेश्वर के मंदिर में ही स्थापित लिंग।
याज्ञवल्क्येश्वर-शिवलिंग ….वहीं समीप में मित्रावरुणेश्वर के मंदिर में ही याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापित चतुर्मुख लिग!
मैत्रेयीश्वर शिवलिंग -याज्ञवल्क्येश्वर के पास ही मैत्रेयी द्वारा स्थापित शिवलिंग।
प्रह्लादेश्वर शिवलिंग-याज्ञवल्क्येश्वर के पश्चिम में पश्चिमाभिमुख लिंग।
स्वरलीनेश्वर शिवलिंग- प्रह्लादेश्वर के आगे। ज्ञान-विज्ञान में निष्ठ तथा परमानन्द के इच्छुकों को यह लिंग मुक्तिदायक था।
वैरोचनेश्वर-स्वर्लीनेश्वर के आगे वैरोचन द्वारा स्थापित लिंग।
बाणेश्वर शिवलिंग-वैरोचनेश्वर के उत्तर में शिवभक्त बलि द्वारा स्थापित लिंग, इसे बाणेश्वर भी कहते थे।
शालकटंकटेश्वर-बाणेश्वर के उत्तर में राक्षसी शालकटंकटा द्वारा स्थापित शिवलिंग।
हिरण्यगर्भ शिवलिंग-वहीं शालकटंकटेश्वर के मंदिर में एक शिवलिंग।
मोक्षेश्वर-वहीं शालकटंकटेश्वर के मंदिर में ही एक शिवलिंग।
स्वर्गेश्वर-वहीं शालकटंकटेश्वर के मंदिर में ही एक शिवलिंग।
वासुकीश्वर-मोक्षेश्वर तथा स्वर्गेश्वर के उत्तर में चतुर्मुख लिंग था!
वासुकीतीर्थ-वासुकीश्वर के पूर्व में एक तीर्थ था जिसमें स्नान करने से मनुष्य रोगरहित जाता था।
चन्द्रेश्वर-वासुकी तीर्थ के पास चन्द्र द्वारा स्थापित शिवलिंग।
विद्येश्वर–चन्द्रेश्वर के पूर्व में। इसके दर्शन से विद्याधर लोक मिलता था।
वीरेश्वर-क्षेत्र के उत्तर- -पूर्व में प्रह्लाद घाट के पास है। इसकी स्थापना के सम्बन्ध में एक कथा दी गयी है। कृत्यकल्पतरु में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
सगरेश्वर-वीरेश्वर के वायव्य कोण में भागीरथ के पूर्वज राजा सगर द्वारा स्थापित।
बालीश्वर-सगरेश्वर के आगे उसी जगह बालि द्वारा स्थापित चतुर्मुख लिंग।
सुग्रीवेश्वर-बालीश्वर के उत्तर में सुग्रीव द्वारा स्थापित।
हनुमदीश्वर-सुग्रीवेश्वर के पास हनुमान् द्वारा स्थापित लिंग। अश्विनीकुमारों द्वारा स्थापित शिवलिंग सगरेश्वर के उत्तर में था।
भद्रदोहतीर्थ शिवलिंग-अश्विनी मन्दिर के उत्तर पार्श्व में स्थित इस तीर्थ में पूर्वभाद्रपद पौर्णमासी को करने से हजार गोदान का पुण्य मिलता था।
भद्रेश्वर-भद्रदोह तीर्थ के पश्चिमी किनारे पर स्थित शिवलिंग।
उपशांतशिव शिवलिंग-भद्रेश्वर के नैऋत्य में स्थित शिवलिंग।
चक्रेश्वर-उपशांतशिव के उत्तर में स्थित पश्चिमाभिमुख शिवलिंग। उसके आगे पश्चिमाभिमुख हृद था जिसमें स्नान करने से शिवलोक की प्राप्ति होती थी।
शूलेश्वर–चक्रेश्वर के पश्चिम में । यहाँ शिव के शूल से उत्पन्न ह्रद में स्नान करने और शूलेश्वो दर्शन से रुद्रलोक की प्राप्ति होती थी।
नारदेश्वर शिवलिंग-शूलेश्वर के पूर्व में नारद द्वारा स्थापित शिवलिंग तथा कुंड।
धर्मेश्वर-नारदेश्वर के पूर्व में शिवलिंग तथा कुंड।
विनायक कुण्ड-धर्मेश्वर की वायव्य दिशा में स्थित इस कुंड में स्नान तथा विनायक का दर्शन करके यात्री सब विघ्नों से विमुक्त होकर, अविमुक्त क्षेत्र में बस सकता था। आजकल यह मुर्गाबी गड़ही कहलाती है।
अमरकह्रद शिवलिंग-विनायक से उत्तर की ओर सटा हुआ कुंड।
अमरकेश्वर-अमरक के दक्षिण में स्थित शिवलिंग। इसके दर्शन से भूल से भी किये गये दुष्कर्म का फल नष्ट हो जाता था। आजकल यह अगरिया ताल कहलाता है
वरणेश्वर-अमरकेश्वर के उत्तर में थोड़ी ही दूर वरणा के तट पर पश्चिमाभिमुख शिवलिंग। कहा गया है कि पाशुपत सिद्ध अश्वपाद को यहाँ शाश्वत सिद्धि मिली। इसके दर्शन से गंधर्वत्व मिलने की बात कही गयी है।
शैलेश्वर–वरणेश्वर के पश्चिम में स्थित शिवलिंग।
कोटीश्वर-शैलेश्वर के दक्षिण में स्थित शिवलिंग।
भीष्मचंडिका-कोटीश्वर के पास ही श्मशान में होने के कारण इसे बीभत्स तथा विकृत कहा गया है।
कोटितीर्थ-इसमें स्नान करने से एक करोड़ गोदान का पुण्य मिलता था। ऋषिसंघ द्वारा स्थापित शिवलिंग कोटीश्वर के पूर्व में था।
श्मशानस्तम्भ-कोटितीर्थ के दक्षिण-पूर्व में स्थित इस स्तम्भ में स्वयं शिव का निवास माना जाता था। उसकी पूजा करने से मनुष्यों की इस क्षेत्र में किये गये पापों से विनिर्मुक्ति होती थी। वाराणसी क्षेत्र में किये गये पापों का फल यहीं भोगना पड़ता था।
भैरवी यातना का यही स्थान था और यहाँ के भैरव दण्डपाणि के नाम से जाने जाते थे।
कपालमोचन-स्नान करते समय शिव के हाथ से लगा हुआ ब्रह्मा का एक सिर वहाँ गिर जाने से इसका नामकरण हुआ। यहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे पाप से छुटकारा मिलने की बात कही गयी है। कोयला बाजार में ओंकारेश्वर के टीले से मिला पश्चिम की ओर स्थित सूखा तालाब है।
कपालेश्वर-कपालमोचन पर स्थित भैरव का शिवलिंग। (भैरवेश्वर)
ऋणमोचनक तीर्थ-कपालेश्वर के उत्तर पार्श्व में स्थित एक तीर्थ जिसमें स्नान करने से तथा तीन शिवलिंगों के दर्शन से विविध ऋण का परिशोध हो जाता था।
अंगारेश्वर (मंगलेश्वर)-ऋणमोचनक तीर्थ के दक्षिण में कुंड के सामने पश्चिमाभिमुख शिवलिंग। चतुर्थी या अष्टमी को यदि मंगलवार पड़े तो वहाँ स्नान और दर्शन से रोग-विनिर्मुक्ति होती थी।
विश्वकर्मेश्वर-अंगारेश्वर के पास ही पश्चिमाभिमुख शिवलिंग।
बुधेश्वर-विश्वकर्मेश्वर के पास ही स्थित शिवलिंग। बद्व ग्रह से पीड़ित जातक को यहां रुद्राभिषेक करने से बहुत लाभ होता है।
महामुण्डेश्वर-बुधेश्वर के दक्षिण में महामुण्डेश्वर का शिवलिंग था। उसके सामने ही एक कूप था जिसमें स्नान करते समय शिव की मुण्डमाला उसमें गिर जाने से लिंग का नामकरण हुआ। अब यह स्कंद माता मंदिर के नीचे कोठरी में है। यहाँ महामुण्डी देवी भी हैं। आजकल यह जैतपुरा में वागीश्वरी देवी के मंदिर के नाम से जाना जाता है।
खट्वांगेश्वर-महामुण्डेश्वर के अहाते में ही एक शिवलिंग और कूप। कथा है कि शिव ने कूप में खट्वांग कूप में डाला था।
भुवनेश्वर-महामुण्डेश्वर के पास ही एक कुंड के दक्षिण तट पर उत्तराभिमुख लिंग।
विमलेश-भुवनेश्वर के दक्षिण में एक कुंड था। उसके पूर्व में विमलेश की स्थिति थी। यहीं से त्र्यंबक सशरीर रुद्रलोक पहुँचे।
भृग्वीश्वर शिवलिंग-अंगारक कुण्ड के दक्षिण में भृगु द्वारा स्थापित बड़ा शिवमंदिर।
नंदीशेश्वर (नादेश्वर ) शिवलिंग- भृग्वीश्वर के दक्षिण में नन्दीश्वर का शिवलिंग था जिसके दर्शनमात्र पाशुपत व्रत में सिद्धि मिल जाती थी। यहीं पर तपस्वी कपिल ने गुहावास करके शिव की एक हजार वर्ष तक पूजा की जिसके फलस्वरूप वे सांख्यवेत्ता हुए। वह महर्षि कपिल गुहा कपिलेश्वर के नीचे थी। यह स्थान वर्तमान कोयला बाजार में ओंकारेश्वर टीले के नीचे गुफा में है।
कपिलेश्वर शिवलिंग- माँ शक्ति द्वारा यह प्रश्न करने पर कि कपिलेश्वर का नाम ओंकारेश्वर कैसे पड़ा, शिव ने बताया कि ओंकार के अकार में पंचायतन विष्णु, उकार में ब्रह्मा और मकार में नंदीश्वर रूप में स्वयं शिव हैं।
मत्स्योदरी-मत्स्योदरी के उत्तर कूल पर उसी तरह नंदीश्वर का मन्दिर स्थित था जिस तरह ओंकार के उत्तर में मकार। इस जगह वामदेव, सावर्णि, अघोर और कपिल ने पाशुपत व्रत से सिद्धि पायी।
कभी-कभी गंगा इस देव के दर्शनार्थ मत्स्योदरी में आ मिलती थीं। कपिलेश्वर के पश्चिम में जब गंगा और मत्स्योदरी का संगम होता, तब वहाँ अष्टमी और चतुर्दशी को स्नान का विशेष महत्त्व था।
कपालमोचन तालाब के पास पाशुपतों का अड्डा था तथा यह मंदिर काफी बड़ा था।
उद्दालक महर्षि की कथा…उद्दालकेश्वर तथा दूसरे शिवलिंग कपिलेश्वर के आगे पश्चान्मुख लिंग थे। यहाँ उद्दालक ऋषि ने परम सिद्धि पायी। पास ही
उत्तर में एक दूसरे शिवलिंग से पराशर मुनि को सिद्धि मिली। उसी लिंग से सटे आयतन में पश्चान्मुख वाष्कलि मुनि रहते थे। उसी के पास पूर्वाभिमुख होकर पाशुपत भाव सिद्ध रहते थे और पश्चिम में एकमुख लिंग था जिसके सान्निध्य में आरुणि ने सिद्धि पायी।
आरुणीश के पश्चिम में एक शिवलिंग था जहाँ पाशुपताचार्य योगसिद्ध का निवास था। उसी के दक्षिण में एक शिवलिंग के सान्निध्य में कौस्तुभ नामक ऋषि को सिद्धि प्राप्त हुई तथा उसके दक्षिण में एक लिंग के पास सावर्णि नामक एक पाशुपत रहते थे। उसके आगे एक महद् लिंग था जिसमें ओंकार रूप में स्वयं शिव का निवास था। उसी के नीचे श्रीमुखी नामक एक गुहा (गुफा) थी जिसमें शिवार्चन में रत पाशुपत रहते थे। उसी महालिंग के द्वार पर इसी शरीर से अघोर मुनि रुद्रत्व को प्राप्त हुए और इसीलिए उसका नाम अघोरेश्वर पड़ा। वहाँ यात्री को त्रिरात्रि बिताने का आदेश था।
पंच-पंचायन की परंपरा…श्रीकंठ शिवलिंग-जान पड़ता है मत्स्योदरी के किनारे बहुत से स्वयभ शिवमंदिर थे, जिनमें शांत, दांत, जितक्रोध और ब्रह्मचारी पाशुपत पूजा करते थे।
कपिलेश्वर के दक्षिण में श्रीकंठ के मंदिर में पाशुपत ऋतुध्वज रहते थे। उसके आगे एक पूर्वमुख लिंग के सान्निध्य में महर्षि जाबाल को सिद्धि मिली। उसके दक्षिण में ओंकारेश्वर की। मूर्ति थी। उसके दक्षिण में दूसरे लिंग के पास कालिकवृक्षिय सिद्ध हुए। उस लिंग के भी दक्षिण में एक) पश्चान्मुख शिवलिंग के पास महरषि गार्ग्य सिद्ध हुए। इन पाँचों को पंचायतन कहते थे और इनके दर्शन का विशेष महत्त्व माना गया है। इस पंचायतन के समीप एक कूप था।
रुद्रवास-यह मंदिर श्रीकंठ के दक्षिण में स्थित था। उसके उत्तर पार्श्व में एक कुंड था जिसमें आना नक्षत्र संयुक्त चतुर्दशी को स्नान का महत्त्व था। वहीं स्थित रुद्रलिंग और उसके आसपास बहुत से लिंग थे।
रुद्रमहालय-रुद्र के नैऋत भाग में। वहाँ पार्वती की मूर्ति थी। अब यह आदिमहादेव मंदिर में है। उसके आगे एक कूप था जहाँ पितरों और देवों का निवास माना जाता था। वहाँ श्राद्ध और पिंडदान की विधि थी तथा पिंड कूप में डाल दिये जाते थे। वहीं पर वैतरणी नामक एक दीर्घिका थी जिसमें स्नान से नरक परित्राण मिलता था। रुद्रमहालय के उत्तर में बहुत से लिंग थे।
बृहस्पतीश्वर–रुद्रकुंड के पश्चिम में बृहस्पति द्वारा स्थापित लिंग।
पितरों द्वारा स्थापित लिंग-रुद्रकूप के दक्षिण भाग में था।
कामेश्वर–रुद्रवास के दक्षिण में। यहाँ काम के तपस्वरूप एक कुंड उत्पन्न हुआ। उसके उत्तर तट पर कामेश्वर लिंग था जिसकी पूजा से सभी मनचाही बातें मिलती थीं। कुंड में चैत्र शुक्ल १३ को स्नान करते थे
घासीटोला शिवालय-घासीटोले में गली के कोने पर और मूलस्थान पर भी मंदिर है।
पंचालकेश्वर शिवलिंग-कामेश्वर के पूर्व में इस लिंग की कुबेर के पुत्र ने आराधना की। इसकी पूजा से महा धन की प्राप्ति की बात मानी गयी है।
नलकूबरेश्वर -घासीटोले में स्थित है।
पंचकेश्वर-पंचालकेश्वर के समीप पूर्वमुख मुखलिंग। इसके आगे एक कूप यानि गहरा कुआ था।
अघोरेश शिवालय-कामेश्वर कूप के पास। यहाँ शिवभक्त किन्नरों अर्थात हिजड़ों द्वारा नौ शिवलिंग स्थापित किए थे। यहां कभी-कभा अघोरियों का जमावड़ा रहता है। महागौरी बाबा कीनाराम ने यहां बहुत तप किया था।
दिवाकर-निशाकर द्वारा स्थापित लिंग-पंचकेश्वर के पूर्व में।
अंधकेश्वर-पंचकेश्वर के दक्षिण में अंधक द्वारा स्थापित लिंग।
देवेश्वर-अंधकेश्वर के पश्चिम और काम कुंड के दक्षिण में, वहीं पर भीमेश्वर, सिद्धेश्वर, गंगेश्वर, यमुनेश्वर, मंडलेश्वर और उर्वशी आदि अनेकों शिवलिंग थे। अब कुछ ही शेष हैं।
शांतेश्वर-शांत द्वारा स्थापित मंडलेश्वर के पास शिवलिंग।
बालखिल्येश्वर-शांतेश्वर की वायव्य दिशा में द्रोणेश्वर के पास काम कुंड के पश्चिम में।
बाल्मीकेश्वर-बालखिल्येश्वर के आगे मुखलिंग।
च्यवनेश्वर-काम कुंड के तट पर च्यवन द्वारा स्थापित शिवलिंग।
वातेश्वर शिवलिंग-वायु द्वारा स्थापित इस शिवलिंग पर दही या घी द्वारा 7 शनिवार रुद्राभिषेक कराने से लकवा, थायराइड आदि अनेक खतरनाक असाध्य रोग जड़ से मिट जाते हैं।

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

दुर्गा जी के 108 चमत्कारिक नाम

 क्या होता है अर्चन?


108 दुर्गा नाम दुर्गासप्तशती के अनुसार


दुर्गा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का पाठ अत्यंत चमत्कारी और कामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है। नवरात्र में नवचण्डी पाठ साधारणत: सभी गृहस्थों के यहां किया जाता है। काम्यसाधना में चण्डी पाठ व मानस के पाठ मुख्य रूप से जाने जाते हैं। उपवास करना ऋतु सन्धि के दुष्प्रभाव को दूर करने का भी एक माध्यम है जो शरीर मे तामसिक और राजसिक गुणों को कम कर उसे सात्विक बना साधना आदि के लिए अनुकूल करता है।

अर्चन के लिए हम कोई भी फल मेवे, सुहाग सामग्री या श्रद्धा और क्षमतानुसार कुछ भी ले सकते हैं। अर्चन आप नवरात्र या उसके बाद भी अन्य स्तोत्र मंत्रों व देवताओं के लिए कर सकते हैं, इसमे आप बस दिए हर नाम के साथ एक एक करके 108 बार माता का नाम बोलकर संकल्पित सामग्री माता के चरणों मे चढ़ाते जाते हैं। जो सहस्त्रार्चन करना चाहे वे उतनी संख्या में सामग्री लें। अगर आप नवचण्डी या अन्य अनुष्ठान करवा रहें हैं तो ध्यान रखें किसी योग्य आचार्य का ही चयन करें जिसको संस्कृत व कर्मकाण्ड दोनों का ही ज्ञान हो, उच्चारण महत्वपूर्ण है उचित उच्चारण एक पासवर्ड के समान है अगर पासवर्ड गलत है तो आप इक्षित ऊर्जा को प्राप्त करने में कैसे सफल हो सकते हैं।

इस स्तोत्रपाठ से होने वाले लाभ नीचे फलश्रुति में कहे गए हैं।


फलश्रुति-

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।

 नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ।।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।

 चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ।।

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् ।

 पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ।।

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि ।

 राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ।। गोरोचनालक्तककुङ्कुमेवसिन्धूरकर्पूरमधुत्रयेण। 

विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः।।


१ सती 

२ साध्वी 

३ भवप्रीता 

४ भवानी 

५ भवमोचनी 

६ आर्या 

७ दुर्गा 

८ जया 

९ आद्या 

१० त्रिनेत्रा 

११ शूलधारिणी 

१२ पिनाकधारिणी 

१३ चित्रा 

१४ चन्द्रघण्टा 

१५ महातपा 

१६ मन : 

१७ बुद्धि 

१८ अहंकारा 

१९ चित्तरूपा 

२० चिता 

२१ चिति 

२२ सर्वमन्त्रमयी 

२३ सत्ता 

२४ सत्यानंद 

२५ अनंता 

२६ भाविनी 

२७ भाव्या 

२८ भव्या 

२९ अभव्या 

३० सदागति 

३१ शाम्भवी 

३२ देवमाता 

३३ चिंता स्वरुपिणी

३४ रत्नप्रिया 

३५ सर्वविद्या 

३६ दक्ष कन्या 

३७ दक्ष यज्ञ विनाशिनी 

३८ अर्पणा 

३९ अनेकवर्णा 

४० पाटला 

४१ पाटलावती 

४२ पट्टांबरपरिधाना

४३ कलमंजरीररंजिनि 

४४ अमेयविक्रमा 

४५ क्रूरा 

४६ सुंदरी 

४७ सुरसुन्दरी 

४८ वनदुर्गा 

४९ मातंगी 

५० मतङ्गमुनिपूजिता 

५१ ब्राही 

५२ माहेश्वरी 

५३एन्द्री 

५४ कौमारी 

५५ वैष्णवी 

५६ चामुंडा 

५७ वाराही 

५८ लक्ष्मी

५९ पुरषाकृति 

६० विमला 

६१ उत्कर्षिणी

६२ ज्ञाना 

६३ क्रिया 

६४ नित्या 

६५ बुद्धिदा 

६६ बहुला 

६७ बहुलप्रेमी

६८ सर्ववाहनवाहना 

६९ निशुंभशुम्भहन्नी 

७० महिषासुरमर्दिनि 

७१ मधुकैटभहन्त्री 

७२ चण्डमुंडविनाशनी 

७३ सर्व असुरविनाशा 

७४ सर्वदानवघातिनी 

७५ सत्या 

७६ सर्वाशस्त्रधारिणी 

७७ अनेकशस्त्रधारिणी 

७८ अनेकास्त्रधारिणी 

७९ कुमारी

८० एक कन्या 

८१ केशोरी 

८२ युवती 

८३ यति 

८४ अप्रौढ़ा 

८५ प्रोढ़ा 

८६ वृद्धमाता 

८७ बलप्रदा 

८८ महोदरी 

८९ मुक्तकेशी 

९० घोररूपा 

९१ महाबला 

९२ अग्निज्वाला 

९३ रौद्रमुखी 

९४ कालरात्रि 

९५ तपश्विनी 

९६ नारायणी 

९७ भद्रकाली 

९८ विष्णुमाया 

९९ जलोदरी 

१०० शिवदूती 

१०१ कराली

१०२ अनन्ता 

१०३ परमेश्वरी 

१०४ कात्यायनी 

१०५ सावित्री 

१०६ प्रत्यक्षा 

१०७ ब्रहावादिनी 

१०८ सर्वशास्त्रमयी।

इनमें आगे तथा नाम के बाद नमः लगाकर अर्चन करें।

 इस स्तोत्र के लिए कहा गया है कि अगर मंगळवारी अमावस्या में चंद्रमा रात्रि में शतभिषा नक्षत्र में हो तो इस स्तोत्र कालिख कर जो भी पाठ करता है वो सभी अत्यंत संपदाओं का पाता है। हालांकि ये मुहूर्त जब 2015 में पड़ा तो उस रात ग्रहण का सूतक काल लग गया था।


भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते ।

विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् संपदां पदम् ।।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

श्री राधा कृत विघ्नाशक गणपति स्तोत्र

 ब्रह्मवैवर्तपुराण में सभी प्रकार के विघ्नों के निवारण के लिए श्री राधा जी कृत विघ्ननाशक गणपति स्तोत्र का वर्णन आता है।

श्री राधिका जी कहती हैं

जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परम ईश्वर, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं; प्रधान-प्रधान सुर, असुर और सिद्ध जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमलके लिये सूर्य और मंगलोंके आश्रय स्थान हैं, उन परात्पर गणेश की मैं स्तुति करती हूँ । यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोकको हरनेवाला है। जो प्रातः काल उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नों से विमुक्त हो जाता है।


श्री राधिका उवाच 

परं धाम परं ब्रह्म परेशं परमीश्वरम् । 

विघ्ननिघ्नकरं शान्तं पुष्टं कान्तमनन्तकम् ॥

सुरासुरेन्द्रैः सिद्धेन्द्रैः स्तुतं स्तौमि परात्परम् । 

सुरपद्मदिनेशं च गणेशं मङ्गलायनम् ॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यं विघ्नशोकहरं परम् । 

यः पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वविघ्नात् प्रमुच्यते ॥